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...तो शिक्षामित्रों, बेरोजगार युवाओं ने यूपी उपचुनाव में डुबो दी बीजेपी की नैया?

...तो शिक्षामित्रों, बेरोजगार युवाओं ने यूपी उपचुनाव में डुबो दी बीजेपी की नैया?

पीएम मोदी और सीएम योगी. (फाइल फोटो)

पीएम मोदी और सीएम योगी. (फाइल फोटो)

शिक्षामित्रों ने बहुत भरोसे के साथ सरकार बनाने में सहयोग दिया था. लेकिन सुप्रीम कोर्ट के फैसले के बाद शिक्षामित्रों को सरकार से उम्मीद थी और वो भरोसा पूरी तरह से टूटता नजर आया.

    लगातार सुशासन का दावा करने वाली योगी सरकार को जनता ने गोरखपुर और फूलपुर लोकसभा उपचुनाव में झटका दे दिया है. दोनों महत्वपूर्ण सीटें थीं जो सीएम और डिप्टी सीएम के इस्तीफे से खाली हुई थी. इस हार के लिए बीजेपी कतई तैयार नहीं थी. जातीय समीकरणों में समाजवादी पार्टी और बहुजन समाज पार्टी के एक मंच पर आ जाना तो सरकार और पार्टी के लिए भारी पड़ा ही. साथ ही साथ सरकार के कई फैसलों ने भी लोगों को नाराज किया. जिसमें से शिक्षामित्रों की नाराजगी भी एक है. शिक्षामित्रों ने बहुत भरोसे के साथ सरकार बनाने में सहयोग दिया था. लेकिन सुप्रीम कोर्ट के फैसले के बाद शिक्षामित्रों को सरकार से उम्मीद थी और वो भरोसा पूरी तरह से टूटता नजर आया. इसके साथ ही शिक्षकों की नियुक्ति हो या किसी और विभागों में बेरोजगारों को रोजगार देने का मामला. करीब एक साल के कार्यकाल में  योगी सरकार ने कहीं भी गंभीरता नहीं दिखाई. इसका कारण चाहे यूपी लोक सेवा आयोग या अधीनस्थ सेवा चयन आयोग के अध्यक्ष की  नियुक्ति में देरी की गई हो या फिर कुछ और. बेरोजगार युवा सरकार से नाराज नजर आए.

    समाजवादी पार्टी के प्रवक्ता और एमएलसी सुनील सिंह साजन कहते हैं कि जिस तरह से इस सरकार ने शिक्षामित्रों, बेरोजगारों, आशा बहनों और किसानों के साथ अत्याचार किया, उनपर लाठियां बरसाईं, उसका गुस्सा उपचुनाव में देखने को मिला है. उन्होंने कहा कि इस सरकार ने बेरोजगार युवाओं, शिक्षामित्रों, आशा बहनों से किए एक भी वादों को नहीं निभाया. अब युवा इन्हें सबक सिखा रहा है.

    ईटीवी के एग्जीक्यूटिव एडिटर अमिताभ अग्निहोत्री भी कहते हैं कि सरकार बीजेपी की थी. उनके कार्यकर्ताओं को बेरोजगार युवाओं और शिक्षामित्रों के साथ खड़े रहना चाहिए था. उन्हें भरोसा दिलाना चाहिए था कि सरकार उनकी है वे पैरवी करेंगे. लेकिन ऐसा हुआ नहीं.

    इसके अलावा गोरखपुर में पिछले साल अगस्त में हुए बच्चों की मौत को भी विपक्षियों ने भुनाया. ‘सबका साथ, सबका विकास’ की बात करने वाले मुख्यमंत्री अल्पसंख्यकों से दूरी बनाए रहे, लेकिन दलितों का भी इनसे मोह भंग हुआ. प्रदेश में दलित उत्पीड़न की घटनाओं पर रोक नहीं लगा पाना भी हार की एक बड़ी वजह बनी. अब अंतिम और प्रमुख कारण एक ये भी है कि केंद्र सरकार के साढ़े तीन साल के कार्यकाल से लोगों का भरोसा टूटा. वहीं राज्य सरकार के एक साल का भी लोगों ने आंकलन किया.

    समाजशास्त्री प्रो. राजेश मिश्रा कहते हैं कि 2014 और 2017 के चुनाव में थोड़ा फर्क था. लोग उस फर्क को नहीं आंक रहे हैं. हालांकि चुनाव में बीजेपी के मतों का जो प्रतिशत था, वह लगभग वही था जो 2014 में था. इस बार सिर्फ 0.5 प्रतिशत की कमी थी. लेकिन एक साल में सत्ता आने के बाद थोड़ा परिवर्तन हुआ है. केंद्र सरकार की जो साढ़े तीन साल की सत्ता विरोधी लहर है. उसका भी असर उपचुनाव में दिखा है. यूपी में भी बीजेपी सरकार को एक साल हो गया है, लोग उसे भी आंक रहे हैं. इसके अलावा यूपी में हर दलों की जो बांटने की राजनीति रही है, उसके भी कुछ नए परिणाम सामने आ रहे हैं.

    हिंदू युवा वाहिनी की उपचुनाव से दूरी भी पड़ी महंगी

    गोरखपुर हो या फूलपुर सीएम योगी आदित्यनाथ और डिप्टी सीएम केशव मौर्य ने धुंआधार रैलियां की. सभी मंत्री लगातार चुनावी सभाओं में जाते रहे. संगठन ने जी जान लगा दी. लेकिन कमी कहां रही? जब तक गोरखपुर की सीट पर स्वंय योगी आदित्यनाथ चुनाव लड़ते रहे, बीजेपी से ज्यादा उस जीत में हिंदू युवा वाहिनी का रोल होता था. लेकिन इस चुनाव में हिंदू युवा वाहिनी की भूमिका अप्रासंगिक थी. कहा जा रहा है कि दोनों सीटों पर संगठन ने अपने पसंद के प्रत्याशी उतारे थे न कि सीएम और डिप्टी सीएम के. जिसके चलते अंतर्विरोध भी नजर आ रहा था.

    फिलहाल उपचुनाव की हार ने संगठन और सरकार की चुनौतियां बढ़ा दी है. जिसके लिए अब दोनों को विपक्षियों से दो-दो हाथ करने की तैयारी नए तरीके करनी होगी. गोरखपुर और फूलपुर लोकसभा उपचुनाव के नतीजों ने यूपी सरकार के फैसलों और बीजेपी की साख पर सवाल खड़ा कर दिया है. सरकार के एक साल पूरे होने वाले हैं, ऐसे में आने वाले दिनों में मंत्रिमंडल से लेकर संगठन तक बदलाव भी देखने को मिल सकता है.

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    Tags: BJP, लखनऊ

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