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Lockdown Diaries: वृंदावन की विधवाओं के सामने गुजारे का संकट, काम बंद होने से आमदमी रुकी
Mathura News in Hindi

प्रिया गौतम | News18Hindi
Updated: May 23, 2020, 10:46 PM IST
Lockdown Diaries: वृंदावन की विधवाओं के सामने गुजारे का संकट, काम बंद होने से आमदमी रुकी
वृंदावन शहर में करीब पांच हज़ार से ज्यादा ऐसी महिलाएं रहती हैं.

वृंदावन में रह रहीं महिलाएं अपना जीवन यापन भीख मांगने से लेकर मंदिर, अस्पताल, स्कूल और घरों में झाड़ू-पोंछा-बर्तन, खाना बनाना, जजमानों की ओर से दी गई मदद आदि के सहारे करती हैं. लेकिन लॉकडाउन के बाद इन निराश्रितों का यह काम बंद हो गया है. उनकी आमदनी के सभी रास्ते भी बंद हैं

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नई दिल्ली. कोरोनावायरस (COVID-19) के कारण हुए लॉकडाउन (Lockdown) में लोगों को तमाम तकलीफों का सामना करना पड़ रहा है. जहां दो वक्त की रोटी जुटाना मुश्किल हो गया है, वहीं रहने के लिए एक अदद छत का इंतजाम भी नहीं हो पा रहा है. संकट की इस घड़ी में विधवाओं को दिक्कतें उठानी पड़ रही हैं जो अपनों के द्वारा ठुकराए जाने के बाद वृंदावन में शरण लिए हुए हैं. मथुरा (Mathura) जिले के वृंदावन (Vrindavan) शहर में करीब पांच हजार से ज्यादा महिलाएं रहती हैं जो या तो विधवा हैं या फिर उन्हें उनके अपनों ने बेघर कर दिया है. पश्चिम बंगाल, छत्तीसगढ़, बिहार, झारखंड, मध्य प्रदेश और उत्तर प्रदेश के कई जिलों से आकर वृंदावन में रह रहीं महिलाएं अपना जीवन यापन भीख मांगने से लेकर मंदिर, अस्पताल, स्कूल और घरों में झाड़ू-पोंछा-बर्तन, खाना बनाना, जजमानों की ओर से दी गई मदद आदि के सहारे करती हैं. लेकिन लॉकडाउन के बाद इन निराश्रितों का यह काम बंद हो गया है. उनकी आमदनी के सभी रास्ते भी बंद हैं.

लॉकडाउन में विधवाओं की क्या है स्थिति
इस बार लॉकडाउन डायरीज (Lockdown Diaries) में हरियाणा के एक गांव की रहने वाली, और अब लंबे समय से वृंदावन में रहकर शादी-ब्याह में पूरी (पूड़ी) बेलकर गुजारा कर रहीं किसनी, पति के मर जाने के बाद अकेली रह गईं. घरों में काम कर के गुजर-बसर कर रहीं अनारो, बंगाल में परिवार द्वारा निकाले जाने के बाद वृंदावन में अकेली रह रहीं रूपा, टिम्पा और यशोदा ने न्यूज़ 18 हिंदी को लॉकडाउन के दौरान आ रहीं अपनी समस्याएं बताईं.

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देश के अलग-अलग हिस्से से आकर वृंदावन में रह रहीं महिलाएं कई तरह के काम कर अपना जीवन यापन करती हैं (फाइल फोटो)




ब्याह-शादी-भंडारे बंद होने से नहीं मिल रहा काम, दो वक्त के खाने के पड़े लाले


किसनी बताती हैं कि पति की मौत के बाद घरवालों ने परेशान किया तो दो बेटों को लेकर वृंदावन चली आईं. यहां शादी-ब्याह के अलावा आए दिन होने वाले भंडारों में पूड़ी बेलकर किसी तरह गुजारा हो रहा था. लेकिन अब कोरोना आने के बाद सब कुछ बंद है. मैं अपने बेटों के साथ एक हजार रुपये महीने पर रहती हूं लेकिन अब किराया निकल पाना तो दूर, दो वक्त की रोटी के भी लाले पड़े हैं. किसी तरह लोगों से उधार लेकर काम चल रहा है.

कहीं खाना बंटता है तो मांगकर खा लेते हैं, भीख भी नहीं मिलती
बंगाल से आकर यहां रह रहीं टिम्पा बताती हैं कि अप्रैल के महीने में उन्हें बंगाल वापस लौटना था लेकिन मार्च में ही सब गाड़ी (ट्रेन) बंद हो गई. ऐसे में उनके पास वहां जाने के लिए जो सामान और पैसे रखे थे, उससे किसी तरह दो महीने का खर्च चल गया. अब अगर कहीं खाना बंट रहा होता है तो वहां से मांग कर खा लेती हैं. कभी-कभी भूखे पेट भी सोना पड़ता है.

वहीं रूपा बताती हैं कि वो एक पैर से लाचार हैं. वो सुबह-शाम राधा वल्लभ मंदिर के सामने बैठकर भीख मांगा करती थीं. बहुत सारे परदेसी आते थे. रोजाना उन्हें करीब 60-70 रुपये मिल जाया करते थे. वहीं कुछ लोग भीख में खाने-पीने का सामान भी दे जाते थे, लेकिन अब सब बंद है.

भजनाश्रम और मंदिर बंद हैं, बेचना पड़ रहा है घर का सामान
यशोदा कहती हैं कि वो रोजाना बालाजी भजनाश्रम में जाकर भजन गाती थीं. यहां और भी 300-350 महिलाएं भजन गाती थीं. वहां उन्हें रोजाना दाल-चावल, चीनी, कभी कभी साड़ी और अन्य सामान भी मिल जाया करता था. इतना ही नहीं वृंदावन के एक मंदिर में वो जूते रखवाली का काम भी करती थीं. इससे जो पैसा मिलता था उससे घर का खर्च चल जाता था लेकिन पिछले ढाई महीने से सब कुछ बंद है. वो बताती हैं, 'मेरे पास भजन आश्रम में मिले हुए गद्दे और दो कंबल रखे हुए थे जिन्हें मैं पहले ही बेच चुकी हूं लेकिन अब आगे क्या बेचूं. समझ में नहीं आ रहा है कि यह सब कब तक बंद रहेगा और हमारा जीवन आगे कैसे चलेगा.'

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वृंदावन में कई विधवाश्रम हैं जहां पर व्यवस्था के तहत माताओं का गुजारा हो रहा है (फाइल फोटो)


कई घरों में करती थी झाड़ू-पोंछा और बर्तन, अब सबने मना कर दिया
अनारो बताती हैं कि करीब 15 साल पहले उनके पति का निधन हो गया. दो बेटियां थीं, जिनकी शादी हो गई अब एकदम अकेली हैं. वो अब घरों में झाड़ू-पोंछा और बर्तन साफ कर के अपनी रोजी-रोटी चलाती हैं. लेकिन यह नई बीमारी (कोरोना) आने के बाद से लोगों ने उन्हें घर आने से मना कर दिया, और कहा कि बीमारी चल रही है तुम भी घर पर रहो. अनारो कहती हैं कि उन्होंने तो कह दिया घर रहो लेकिन अब घर पर रहकर खाएं क्या? अब बीमारी से नहीं मरेंगे, लेकिन भूख से मर जाएंगे.

लॉकडाउन में कई निराश्रित माताएं आ चुकी हैं मदद मांगने, इलाज की भी आ रही समस्या
वृंदावन में विधवाओं के लिए काम करने वाली राष्ट्रपति पुरस्कार प्राप्त डॉ. लक्ष्मी गौतम कहती हैं, 'वृंदावन में लोगों के दान, सहयोग और भंडारों से हजारों लोगों का पेट भरता है. यहां बाहर से आने वाली विधवाओं और निराश्रित महिलाओं की भी अच्छी खासी संख्या है. लेकिन जब से कोरोना के चलते लॉकडाउन हुआ है तब से परेशानियां बढ़ गयी हैं. कई माताएं मेरे पास मदद के लिए आ चुकी हैं. हाल ही में एक माता मेरे पास आईं और उन्होंने बताया कि वो पिछले 10 दिन से भटक रही हैं. उनका मकान मालिक उनसे जबरन किराया मांग रहा था. माता के पास पैसे ना होने पर मकान मालिक ने कमरे को ताला लगा दिया और उन्हें बिना सामान दिए घर से बाहर निकाल दिया. इन्हें लेकर मैंने पुलिस से भी बात की है.'

वृंदावन में कई विधवाश्रम हैं जहां पर व्यवस्था के तहत माताओं का गुजारा हो रहा है लेकिन वो निराश्रित महिलाएं जो किराये के घरों में रहती हैं और यहां किसी प्रकार से घरों, मंदिरों में काम कर के, भीख मांग कर जीवन यापन कर रही हैं, उनके सामने बहुत बड़ा संकट खड़ा हो गया है.

डॉ. लक्ष्मी कहती हैं कि बीमार माताओं को लॉकडाउन में इलाज के लिए भी बहुत संघर्ष करना पड़ रहा है. मैं खुद कई महिलाओं को सरकारी अस्पताल में लेकर गयी हूं लेकिन वहां कोई पूछने वाला नहीं है और पूरी व्यवस्था बहुत खराब है.

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First published: May 23, 2020, 8:56 PM IST
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