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दूसरा चरण: 6 सीटों पर बिगड़ा जाति का वोट गणित, एक ही जाति के तीन से ज़्यादा उम्मीदवार

दूसरा चरण: 6 सीटों पर बिगड़ा जाति का वोट गणित, एक ही जाति के तीन से ज़्यादा उम्मीदवार

प्रतीकात्मक तस्वीर

प्रतीकात्मक तस्वीर

अलीगढ़ सीट पर सपा-बसपा व रालोद गठबंधन, कांग्रेस और शिवपाल यादव की पार्टी ने जाट उम्मीदवारों पर दांव लगाया है, जबकि बीजेपी ने मौजूदा सांसद सतीश गौतम पर एक बार फिर भरोसा जताया है.

    उत्तर प्रदेश में पहले चरण का मतदान पूरा हो चुका है. प्रचार करने वालों की टोली अब दूसरे चरण में पहुंच गई है. दूसरे चरण में नगीना, अमरोहा, बुलंदशहर, हाथरस, मथुरा, आगरा और फतेहपुर सीकरी मुख्य सीटें हैं. भौगोलिक दृष्टि से इन सीटों को दो हिस्से में बांटा जा सकता है. पहला हिस्सा मेरठ के आसपास का है, जबकि दूसरा हिस्सा आगरा और उसके आसपास का है. इन आठ सीटों में चार सुरक्षित सीटें ऐसी हैं, जिनमें बीएसपी आज तक अपना खाता नहीं खोल सकी है.

    इन दोनों इलाकों में आगरा के पास की सीटों की बात करें तो इनमें आगरा के अलावा फतेहपुर सीकरी, बुलंदशहर, अलीगढ़ और हाथरस हैं. जिस तरह दूसरे चरण में मतदान होना है, इन सीटों पर जातीय गणित फेल होता नजर आ रहा है और इसका कारण है, हर सीट पर एक ही जाति के कई उम्मीदवारों का होना. दूसरे चरण की इन 8 सीटों में नगीना, बुलंदशहर, आगरा और हाथरस चार सुरक्षित सीटें हैं. मतलब साफ है कि चार सीटों पर हर पार्टी का दलित नेता ही उम्मीदवार होगा. ऐसे में जाति का वोट गणित फेल होना निश्चित है.

    हर सीट पर अलग है जाति का गणित
    बात करें अलीगढ़ सीट की तो यहां सपा-बसपा व रालोद गठबंधन, कांग्रेस और शिवपाल यादव की पार्टी ने जाट उम्मीदवारों पर दांव लगाया है, जबकि बीजेपी ने मौजूदा सांसद सतीश गौतम पर एक बार फिर भरोसा जताया है. स्थानीय पत्रकार धीरेन्द्र सिंह मानते हैं कि जाट वोटों का बंटवारा ही यहां बीजेपी की सबसे बड़ी ताकत है. कांग्रेस ने यहां पूर्व सांसद विजेन्द्र सिंह को उम्मीदवार बनाया है, जबकि गठबंधन ने अजीत बालियान और शिवपाल की प्रसपा ने दीपक चौधरी को मैदान में उतारा है. अलीगढ़ में स्थानीय मुद्दों पर राष्ट्रवाद का मुद्दा भारी है और उसका कारण है अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय.

    मठों में रहने वालों के लिए धर्म नहीं, देश बड़ा मुद्दा
    वहीं, मथुरा से जाट, दलित मुस्लिम समीकरण के साथ-साथ ठाकुर वोटरों को लुभाने के लिए आरएलडी ने ठाकुर उम्मीदवार नरेन्द्र सिंह को मैदान में उतारा है. जिसकी काट में बीजेपी के स्थानीय कार्यकर्ता धर्मेन्द्र के बहाने हेमा मालिनी को जाट बताने में लगे हैं. यानि यहां भी जाति का समीकरण उल्टा दिख रहा है. बात करें मुद्दों की तो कृष्ण नगरी मथुरा और वृंदावन में मंदिरों और धर्मशालाओं की हजारों की संख्या में वोटर है. जिनकी राय शहरी वोटरों से अलग-अलग है. शहर के लोग जहां स्थानीय समस्याओं के साथ-साथ अपने सांसद हेमा मालिनी को लेकर नाराज है. वहीं, इन मठों में रहने वालों के लिए धर्म और देश बड़ा मुद्दा है. ऐसे में पीएम मोदी से बड़ा चेहरा उनके लिए कोई नहीं है.

    मथुरा के तुतुर्रा और नवादा गांव के कुछ लोग जो अपनी मुकदमें की सुनवाई में कचहरी आए हैं, उनके लिए स्थानीय मुद्दे से बड़ा मुद्दा देश है. जब हमने एक्सप्रेसवे बनाने के बहना मायावती के विकास की बात की तो उनका जबाब साफ था कि एक्सप्रेसवे का फायदा सिर्फ उन्हें मिला जिनकी जमीनों का अधीग्रहण हुआ था. हमें क्या मिला, क्योकि सर्विस लेन तो बनी ही नहीं ऐसे में देश से बड़ा कोई मुद्दा नहीं है. साफ है कि उत्तर प्रदेश में भले ही जाति चुनाव का बड़ा मुद्दा है, लेकिन दूसरे चरण की सीटों पर स्थानीय मुद्दे और राष्ट्रीय मुद्दे जाति के वोट गणित पर भारी हैं.

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