मथुरा: श्रीकृष्ण जन्मभूमि व शाही ईदगाह विवाद पहुंचा सुप्रीम कोर्ट, जानिए याचिका में क्या रखी गयी है मांग

श्री कृष्णा जन्मभूमि और ईदगाह विवाद पहुंचा सुप्रीम कोर्ट

श्री कृष्णा जन्मभूमि और ईदगाह विवाद पहुंचा सुप्रीम कोर्ट

Shri Krishna Janmbhoomi and Mosque Dispute: सुप्रीम कोर्ट में एक याचिका दाखिल हुई है, जिसमें कृष्ण जन्मभूमि की जमीन को समझौते के जरिये मस्जिद को देने को चुनौती दी गई है.

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मथुरा. मथुरा (Mathura) के श्रीकृष्ण विराजमान (Shri Krishna Virajman) व शाही ईदगाह मस्जिद (Shahi Eidgah Mosque) के कब्जे में 13.37 एकड़ जमीन के मालिकाना हक का मामला बढ़ता ही जा रहा है. वर्तमान में इस मामले को लेकर जिला जज व सिविल जज सीनियर डिवीजन के न्यायालय में वाद व याचिका विचाराधीन है और आये दिन कोई न कोई कृष्ण भक्त न्यायालय का दरवाजा खटखटाकर मामले को जिंदा बनाये हुए है. जिला न्यायालय में वाद के बाद अब एक बार फिर यह मामला सुप्रीम कोर्ट पहुंच गया है.

सुप्रीम कोर्ट में एक याचिका दाखिल हुई है, जिसमें कृष्ण जन्मभूमि की जमीन को समझौते के जरिये मस्जिद को देने को चुनौती दी गई है. याचिका में कहा गया है कि हिंदुओं के साथ धोखा करके कृष्ण जन्मभूमि ट्रस्ट की संपत्ति बिना किसी कानूनी अधिकार के अनधिकृत रूप से समझौता करके शाही ईदगाह को दे दी गई जो कि गलत है. कोर्ट घोषित करे कि श्रीकृष्ण जन्म सेवा संस्थान की ओर से 12 अगस्त, 1968 को शाही ईदगाह के साथ किया गया समझौता बिना क्षेत्राधिकार के किया गया था.

याचिका में यह भी मांग की गई है कि श्रीकृष्ण सेवा संस्थान द्वारा बिना किसी अधिकार के कृष्ण जन्मभूमि और ट्रस्ट की संपत्ति को समझौते के जरिए मुसलमानों को दिए जाने और हिंदुओं से धोखा किये जाने की एसआइटी गठित कर जांच कराई जाए और सेवा संस्थान के सदस्यों के खिलाफ आइपीसी की विभिन्न धाराओं में मुकदमा चलाया जाए. इस संबंध में हिन्दू वादी नेता गोपेश्वर नाथ चतुर्वेदी का कहना है कि यह कोई पहली बार नहीं है जब याचिकाकर्ता ने ऐसी याचिका लगाई हो. इससे पहले यह 3 बार जिला जज, हाइकोर्ट और सुप्रीम कोर्ट में याचिका लगा चुके है और तीनों बार मामला खारिज हुआ है. अब फिर इन्होंने रिव्यू किया है, जो होगा देखा जाएगा. यह  नया विषय नहीं है.

क्या है श्रीकृष्ण जन्मभूमि की मान्यता 
लीला पुरुषोत्तम भगवान श्रीकृष्ण का वर्तमान कटरा केशवदेव में स्थित कंस के कारागार में लगभग 5247  वर्ष पूर्व जन्म हुआ था. श्रीकृष्ण के प्रपौत्र वज्रनाभ ने उसी कारागार स्थली पर भगवान श्रीकेशवदेव के प्रथम मन्दिर की स्थापना की. कालान्तर में इसी स्थल पर बार-बार भव्य मंदिरों का निर्माण हुआ. आखिर में 250 फ़ीट ऊंचा मन्दिर जहांगीर के शासन काल में ओरछा के राजा वीरसिंह देव ने बनाया. जिसे औरंगजेब ने 1669 में ध्वस्त कर मन्दिर के अग्रभाग पर ईदगाह मस्जिद का निर्माण कराया, जो आज विद्यमान है. कटरा केशवदेव के सम्पूर्ण परिसर (13.37 एकड़) को धर्मानुरागी सेठ जुगलकिशोर बिरला ने महामना मदनमोहन मालवीय की प्रेरणा पर क्रय कर 1951 में श्रीकृष्ण-जन्मभूमि ट्रस्ट की स्थापना कर सम्पूर्ण भूखण्ड ट्रस्ट को समर्पित कर दिया। तभी से सम्पूर्ण परिसर (ईदगाह सहित) का स्वामित्व श्रीकृष्ण-जन्मभूमि ट्रस्ट का है, जिसका दैनन्दिन प्रबंधन श्रीकृष्ण-जन्मस्थान सेवा-संस्थान द्वारा किया जा रहा है.

क्या है विवाद?

1815 में ईस्ट इंडिया कम्पनी ने नजूल भूमि के रूप में कटरा केशवदेव को नीलाम किया, जिसे सबसे ऊंची बोली लगाकर वाराणसी के राजा पटनीमल ने खरीदा। 1875 -1877 के मध्य  राजा नृसिंह दास के पक्ष में 6 मुकदमे डिक्री हुए. 1920 में मुकदमा हुआ तो फैसला हिन्दू पक्ष में हुआ. 1921 में अपील भी खारिज हो गई. 1928 में राय कृष्णदास ने मुस्लिमों के विरुद्ध मुकदमा किया जो उनके पक्ष में डिक्री हुआ. उसकी अपील इलाहाबाद हाईकोर्ट में मुस्लिमों ने की वह भी 1935 में खारिज हो गई. 08.02.1944 को मदनमोहन मालवीय, गोस्वामी गणेशदत्त व भीखनलाल आत्रेय के नाम जुगलकिशोर बिरला के आर्थिक सहयोग से कटरा केशवदेव की 13.37 एकड़ भूमि क्रय की गई. 21.02.1951 को श्रीकृष्ण-जन्मभूमि ट्रस्ट पंजीकृत हुआ और भूमि के तीनों स्वामियों ने भूमि ट्रस्ट को समर्पित कर दी. 21.01.1953 को सिविल मुकदमा 4/1946 खारिज हुआ जो मुस्लिम ने बैनामा निरस्ति के लिये किया था. 01.05.1958 को ट्रस्ट ने प्रबंधन के लिए श्रीकृष्ण-जन्मस्थान सेवा-संघ नामक समिति पंजीकृत करायी. 1959 में पुनः मुस्लिम पक्ष ने मुकदमा361/1959 किया जो खारिज हुआ. 1967 में श्रीकृष्ण-जन्मस्थान ने मुस्लिमों को परिसर खाली करने व ढांचा हटाने के लिए मुकदमा किया जो 12.10.1968 के समझौते के आधार पर 1974 में समाप्त हुआ. 07.05.1993 को मनोहरलाल शर्मा एडवोकेट ने 12.10.1968 के समझौते को नियम विरुद्ध बताकर धारा 92 में संस्थान के विरुद्ध मुकदमा किया जो जनपद न्यायाधीश ने खारिज कर दिया.



डीएम व एसपी के सुझाव पर हुआ था लिखित समझौता

करीब तीन दशक तक श्रीकृष्ण जन्मस्थान और शाही मस्जिद ईदगाह का विवाद चला था. विवाद में दोनों पक्षों से अनेक शिकायत एवं मुकदमेंबाजी भी हुई थी. बाद में तत्कालीन जिलाधिकारी आरके  गोयल एवं एसपी  गिरीश बिहारी ने दोनों पक्षों को आपसी रजामंदी से समझौता करा दिया था. यह समझौता ढाई रूपये के स्टांप पेपर पर किया गया था. इसमें श्रीकृष्ण जन्मस्थान सेवा संघ और शाही मस्जिद ईदगाह कमेटी ने दस प्रमुख बिन्दुओं पर समझौता किया था. जिस समझौते को अवैध करार देते हुए कोर्ट में दाखिल दावे में मस्जिद को हटाने की मांग की गई है. उस समझौते का विरोध भी सेवा संघ को पत्र लिखकर किया गया था. इस समझौते का उल्लेख कई पुस्तकों में दर्ज भी है, जिनमें न्यायिक स्थिति श्रीकृष्ण जन्मस्थान नामक  पुस्तक में इस समझौते का उल्लेख है. यह समझौता वर्ष 1968 के 10 अगस्त को हुआ था. उस समय तत्कालीन जिलाधिकारी आरके गोयल और एसपी गिरीश बिहारी भी उपस्थित थे.  दोनों के सुझाव पर दोनों पक्षों के आपसी रजामंदी पर ये समझौता हुआ था. तब श्रीकृष्ण जन्मस्थान सेवा संघ की ओर से समझौते पर हस्ताक्षर सह सचिव देवधर शर्मा, उनके सहयोगी फूलचंद्र गुप्ता ने किए थे. मामले में अधिवक्ता अब्दुल गफ्फार थे. श्रीकृष्ण जन्मस्थान सेवा संघ के सदस्य गोपेश्वर नाथ चतुर्वेदी बताते हैं कि शाही मस्जिद ईदगाह कमेटी की ओर से समझौते में शाहमर मलीह, डा. शाहबुद्दी साकिब, आबिदुल्ला खां, मौहम्मद आकूब आलूवाला के हस्ताक्षर थे, जबकि अधिवक्ता रज्जक हुसैन थे.

समझौते का हुआ था विरोध

विश्व हिन्दू परिषद के तत्कालीन जिलाध्यक्ष डा. रमनदास पंडया और चंद्रभानु ने श्रीकृष्ण जन्मस्थान सेवा संघ को इस समझौते को न करने की सलाह देते हुए एक लिखित पत्र देकर विरोध जताया था. जिस धार्मिक स्थल का उत्थान हो रहा है उसी के एक हिस्से को मुसलमानों के लिए ये देना गलत कार्य है. उन्होंने पत्र में सेवा संघ के ट्रस्ट्रियों से फैसले पर पुनर्विचार करने और धार्मिक स्थान का अंगभंग न करने की बात उठाई थी.

समझौते में प्रमुख मुद्दे जो तय हुए थे

श्रीकृष्ण जन्मस्थान और ईदगाह से जुड़े पक्षों में जो समझौता हुआ था उसमें निम्नलिखित प्रमुख मुद्दे तय हुए थे. मस्जिद निर्माण समिति को दो दीवारों का निर्माण की जिम्मेदारी दी गई थी, जिसमें ईदगाह के ऊपर के चबूतरे की उत्तर व दक्षिण दीवारों को पूरब की ओर रेलवे लाइन तक बढ़ाकर उपरोक्त दोनों दीवारों को बनाएगी. साथ ही यह भी तय हुआ था कि मस्जिद कमेटी मुस्लिम आबादी को खाली कराकर संघ को सौंपेगी. साथ ही यह भी तय हुआ था कि एक अक्टूबर 1968 तक दक्षिण की ओर जीने का मलबा मस्जिद कमेटी उठा लेगी. समझौते में यह भी था कि मुस्लिम आबादी में जिन मकानों का बैनामा उत्तर और दक्षिण वाली दीवारों के बाहर अपने हक में जो कराया है उसे संघ को दे देगी. साथ ही जन्मस्थान की ओर आ रहे ईदगाह के पनाले, ईदगाह की कच्ची सड़क कर्सी की ओर मोड़ा जाएगा. इसका खर्च जन्मस्थान संघ वहन करेगा. साथ ही पश्चिम उत्तरी कोने में जो भूखंड संघ का है ऊसमें कमेटी अपनी कच्ची कुर्सी को चौकोर करेगा और वह उसी की मिल्कियत मानी जाएगी तथा रेलवे लाइन के लिए जो भूमि संघ अधिग्रहित करा रहा है, जो भूमि ईदगाह के सामने दीवारों के भीतर आएगी उसे कमेटी को दे देगा. ईदगाह और श्रीकृष्ण जन्मस्थान से जुड़े दोनों पक्षों की ओर से सभी शर्ते पूरी होने पर जो मुकदमें चल रहे हैं, उसमें राजीनामा दाखिल होगा और सभी मुकदमें आपसी सहयोग और सहमति से वापस होंगे.
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