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मथुरा के इस कस्बे में आज भी है सती के 'श्राप' का खौफ, नहीं मनाई जाती करवाचौथ

News18 Uttar Pradesh
Updated: October 17, 2019, 12:22 PM IST
मथुरा के इस कस्बे में आज भी है सती के 'श्राप' का खौफ, नहीं मनाई जाती करवाचौथ
मथुरा में सती के श्राप की वजह से महलाएं नहीं रखती करवाचौथ का व्रत

Karva Chauth 2019: यहां कि महिलाओं पर सती के श्राप (Curse) का भय इस कदर मन-मस्तिष्क पर छाया हुआ है कि अपने सुहाग सलामती के त्योहार करवाचौथ (Karwa Chauth) को भी नहीं मनाती.

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मथुरा. आज पूरे देश मे सुहागिन महिलाएं करवाचौथ बड़े ही धूमधाम से मना रही है. गुरुवार को करवाचौथ (Karwa Chauth 2019) का चांद (Moon) तो पूरे जोश के साथ आसमान पर चमकेगा, मगर सामाजिक रूढ़िवादिता के बंधन में बंधी 'चांदनी' पर मथुरा के सुरीर कस्बे में मायूसी छाई रहेगी. कान्हा की नगरी के कस्बा सुरीर में सुहाग सलामती के त्योहार से परहेज की रूढ़िवादी परंपरा सैकड़ों वर्षों से चली आ रही है. यहां कि महिलाओं पर सती के श्राप (Curse) का भय इस कदर मन-मस्तिष्क पर छाया हुआ है कि अपने सुहाग सलामती के त्योहार को भी नहीं मनाती. कस्बा सुरीर के मुहल्ला वघा में ठाकुर समाज के सैकड़ों परिवारों में करवा चौथ एवं अहोई अष्ठमी का त्यौहार मनाने पर बंदिश लगी हुई है.

सैकड़ों वर्षों से चली आ रही परम्परा

करवाचौथ का त्योहार न मना पाने की कसक इस समाज की नवविवाहितों को कचोटती है. विवाहिता पूजा का कहना है कि मन में तमन्ना थी कि शादी के बाद करवाचौथ पर निर्जला व्रत एवं सोलह श्रृंगार कर अपने चांद का दीदार करेंगी, लेकिन ससुराल में आकर पता चला कि सती की बंदिश के चलते वह ऐसा नहीं कर पाएगी. विवाहिता रेखा का कहना है कि शादी के बाद उसने ससुराल में आकर इस त्योहार से परहेज की बात सुनी तो वह मन मसोस कर रह गई. रुक्मणि ने बताया कि शादी के पहले करवाचौथ पर सुहाग सलामती का व्रत रखने को मन में बड़ी उमंग थी, लेकिन बंदिश की वजह से इस त्योहार को नहीं मना पाई. जिसकी कसक उसे हमेशा कचोटती रहती है. रामवती देवी का कहना है कि सैकड़ों वर्षों से चली आ रही इस परंपरा का निर्वहन कर रहे हैं. इस बंदिश को तोड़ने की किसी में हिम्मत नहीं है. उन्हें इस बंदिश को तोड़ने पर अनिष्ट की आशंका सताती है.

ये है सती के श्राप की कहानी

कहते हैं कि सैकड़ों वर्ष पहले गांव रामनगला (नौहझील) का ब्राह्मण युवक अपनी पत्नी को विदा कराकर घर लौट रहा था. सुरीर में होकर निकलने के दौरान इस मुहल्ले के ठाकुर समाज के लोगों से बग्घी में जुते भैंसा को लेकर विवाद हो गया. जिसमें इन लोगों के हाथों इस ब्राह्मण युवक की मौत हो गई. अपने सामने पति की मौत से कुपित पत्नी मुहल्ले में इस समाज के लोगों को श्राप देते हुए सती हो गई थी. इसे सती का श्राप कहें या बिलखती पत्नी के कोप का कहर, संयोगवश इस घटना के बाद मुहल्ले में मानो कहर आ गया. एक के बाद एक कई जवान लोगों की मौत हो गई. महिलाएं विधवा होने लगीं. जिससे इन लोगों में कोहराम सा मच गया. जिसे देख बुजुर्ग लोगों ने इसे सती का श्राप मानते हुए क्षमा याचना की और मंदिर बना कर पूजा-अर्चना शुरू कर दी. बुजुर्ग बताते हैं कि तभी से करवाचौथ एवं अहोई अष्टमी का त्यौहार मनाना तो दूर महिलाएं पूरा साज-श्रृंगार भी नहीं करती हैं. उन्हें सती के नाराज होने का भय बना रहता है.

देवी की तरह पूजी जाती है सती

कस्बा सुरीर में सती की पूजा एक देवी की तरह हो रही है. यहां विवाह-शादी एवं तीज त्यौहार पर सती की पूजा की जाती है. इस मुहल्ले के ही नहीं बल्कि कस्बे में सभी जाति वर्ग के लोग सती मंदिर पर मत्था टेकने के लिए आते है.
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रामनगला के ब्राह्मण समाज कप सुरीर के पानी से भी परहेज

गांव रामनगला के ब्राह्मण समाज लोग आज भी सुरीर में पानी पीने से परहेज रखते हैं. प्रेमचंद्र शर्मा ने बताया कि इस घटना को लेकर सुरीर में खाने-पीने से परहेज की परंपरा पीढ़ी दर पीढ़ी चली आ रही है.

(मथुरा से नितिन गौतम की रिपोर्ट)

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First published: October 17, 2019, 12:22 PM IST
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