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क्यों दिलचस्प होता जा रहा है कृष्ण की नगरी मथुरा में चुनावी दंगल?

दिलचस्प है मथुरा का मुकाबला

दिलचस्प है मथुरा का मुकाबला

2009 में मथुरा सीट देश के सबसे बड़े जाट नेता रहे चौधरी चरण सिंह की तीसरी पीढ़ी के लांचिंग पैड के रूप में इस्तेमाल हुई थ ...अधिक पढ़ें

    देश की राजधानी दिल्ली से करीब 150 किलोमीटर दूर भगवान कृष्ण की नगरी मथुरा की लोकसभा सीट पीछले तीन लोकसभा चुनावों से हाई प्रोफाइल बनी हुई है. दरअसल 2009 में यह सीट देश के सबसे बड़े जाट नेता रहे चौधरी चरण सिंह की तीसरी पीढ़ी के लांचिंग पैड के रूप में इस्तेमाल हुई थी. उस समय राष्ट्रीय लोक दल ने भारतीय जनता पार्टी के साथ मिलकर चुनाव लड़ रहे पार्टी के युवा चेहरे और पार्टी अध्यक्ष अजीत सिंह के बेटे जयंत चौधरी को लोकसभा में भेजा था.

    हालांकि 2014 में बीजेपी और आरएलडी का गठबंधन टूट गया और बीजेपी ने इस सीट पर अपनी जीत सुनिश्चित करने के लिए पूरी ताकत लगा दी. फलस्वरूप बीजेपी प्रत्याशी फिल्म अभिनेत्री हेमा मालिनी ने जयंत चौधरी को 3 लाख तीस हजार से ज्यादा वोटों से हरा दिया. इस चुनाव में हेमा मालिनी को करीब पांच लाख सत्तर हजार वोट मिले थे.

    फाइल फोटो


    सीट का जातीय समीकरण
    बात करें इस सीट के जातीय समीकरण की तो करीब 17 लाख मतदाताओं वाली इस सीट पर करीब साढ़े तीन लाख जाट मतदाता हैं, जबकि ब्राह्मण मतदातओं की संख्या तीन लाख से कुछ ज्यादा है. ठाकुर मतदाताओं की संख्या तीन लाख से कुछ कम है, वहीं  जाटव करीब डेढ़ लाख हैं. मुस्लिम डेढ़ लाख से थोड़े कम हैं और वैश्य मतदाताओं की संख्या करीब एक लाख से ज्यादा है. यादव मतदाता 70 हजार के आस-पास, जबकि अन्य जातियों के करीब एक लाख वोटर हैं.



    हेमा मालिनी ने जाट वोटों पर ठोका दावा
    2019 के लोकसभा चुनाव में फिलहाल इस हाईप्रोफाइल सीट पर मुकबला कांटे का दिख रहा है. धर्मेन्द्र के बहाने जाट वोटों पर दावा ठोक हेमा मालिनी ने जातीय गणित के मुकाबले को और रोचक बना दिया है. स्थानीय स्तर पर मुद्दे और जातीय गणित, दोनों लड़ाई को बीजेपी बनाम गठबंधन ही दिखा रहे हैं. वैसे देखा जाय तो इस सीट पर मुस्लिम और जाट वोटों को अगर मिला दिया जाए तो किसी भी उम्मीदवार को पटखनी दी जा सकती है. इसी चुनावी गणित के मद्देनजर 2014 के लोकसभा चुनावों में आरएलडी के जयंत चौधरी ने अपनी सीट नहीं बदली.



    मुकाबले को त्रिकोणीय बनाने की कोशिश!


    गौरतलब है कि 2014 के लोकसभा चुनाव में मुस्लिम और जाट दोनों बंट गए थे. ऐसे में एसपी-बीएसपी के साथ गठबंधन के सहारे आरएलडी 2019 में इस सीट पर जाट-मुस्लिम गठजोड़ के सहारे इस सीट से हेमा मालिनी को पटकनी देना चाहती हैं. कांग्रेस उम्मीदवार महेन्द्र पाठक मुकाबले में आने की कोशिश तो कर रहे हैं लेकिन अभी तक वो मुकाबले को त्रिकोणात्मक बनाते नहीं दिख रहे हैं. लेकिन पाठक यदि ब्राह्मण वोट काटते हैं तो फायदा आरएलडी उम्मीदवार को होगा. वहीं बीजेपी को यहां राष्ट्रवाद और प्रधानमंत्री मोदी के चेहरे और हेमामालिनी के ग्लैमर पर पूरी उम्मीद है.

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