'लीची की बहार है, पर ठंडा कारोबार है', कोरोना के कारण मेरठ के किसानों का दर्द
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'लीची की बहार है, पर ठंडा कारोबार है', कोरोना के कारण मेरठ के किसानों का दर्द
कोरोना के चलते लीची की कीमत में 30 से 40 फीसदी की गिरावट आई है.

मेरठ में पेड़ों पर लीचियों (Litchi) के गुच्छे लटके हुए हैं. ये नजारा इतना खूबसूरत है कि नजर हटाने का दिल नहीं हो, लेकिन ये नजारा मेरठ के किसानों (Farmers) को एकदम नहीं भा रहा है.

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मेरठ. उत्तर प्रदेश के मेरठ में इस बार खूब लीची (Litchi) हुई है, लेकिन किसानों (Farmers) को इसका लाभ नहीं मिल पा रहा है. कोरोना के चलते वे अपनी लीची बेच नहीं पा रहे हैं. किसानों का कहना है कि कोरोना (Corona) ने उन्हें तबाह कर दिया. क्योंकि इस बार लीची तो खूब हुई, पर खरीदार न के बराबर हैं. पेड़ों पर लीचियों के गुच्छे लटके हुए हैं. ये नजारा इतना खूबसूरत है कि नजर हटाने का दिल नहीं हो. लेकिन ये नजारा मेरठ के किसानों को एकदम नहीं भा रहा है. क्योंकि लीची से मोटी कमाई का सपना देखने वाले किसानों को बेहद कम दाम मिल रहे हैं. लीची की कीमत में तीस से चालीस प्रतिशत की गिरावट आई है.

कोरोना के चलते खरीदार गायब 

न्यूज-18 की टीम ने मेरठ के किठौर इलाके में जब लीची के एक बाग का जायजा लिया तो पाया कि किसान पेड़ों से लीचियों को तोड़कर उन्हें छाटने में जुटे थे. इन्हीं लीचियों के सहारे इनके घरों का चूल्हा जलता है. लेकिन इस बार कोरोना महामारी ने सबकुछ तबाह कर दिया है. किसानों की माने तो कोरोना के चलते लीची खरीदने के लिए दूसरे जिलों या राज्यों के कारोबारी नहीं आ रहे हैं. जिसका सीधा असर उनके व्यापार पर पड़ रहा है. किसानों का कहना है कि एक कैरेट लीची चार सौ से पांच सौ रुपए तक बिकती थी. लेकिन आज वह ढाई सौ से तीन सौ रुपए की दर से बिक पा रही है.



आम पर भी कोरोना की मार 
लीचियों के साथ-साथ मेरठ के किठौर इलाके का शाहजहांपुर बाजार आम की वैरायटी के लिए भी जाना जाता है. यहां आम के बागों में भी बहार है. यहां के आम अपने स्वाद के लिए दूर-दूर तक जाने जाते हैं. फिर चाहे वो लंगड़ा हो, चौसा, रामकेला या फिर सिंदूरी आम. लेकिन फलों का राजा आम भी इस बार खास नहीं बन पा रहा है. कोरोना के चलते लीची के साथ-साथ आम भी मंदी की मार झेल रहा है. आम के कारोबारी भी बाहर से नहीं आ पा रहे हैं. जिसका सीधा असर किसानों पर पड़ रहा है. किसानों का कहना है कि आम की कैरेट आठ सौ से हजार रुपए तक बिकती थी. लेकिन आज की तारीख में यह तीन सौ से चार सौ रुपए कैरेट तक ही बिक रहा है.

हालांकि इस निराशा के बीच भी किसानों को ये आशा भी है कि आगे दिन बहुरेंगे. बागों की ये बहार उनके जीवन में भी बहार लेकर आएगी. और उनका कारोबार फिर से पटरी पर लौटेगा. लीची किसान के साथ साथ फूलों का कारोबार भी चौपट है. लेकिन फूलों की बगिया फिर से गुलज़ार होने लगी है.
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