इस शिव मंदिर का 1857 की क्रांति से है अटूट नाता...

गाय और सुअर की चर्बी से बने कारतूस चलाने से मना करने पर 85 सैनिकों के कोर्ट मार्शल की घटना ने 1857 की क्रांति की भूमिका तैयार कर दी थी. उस वक्‍त काली पलटन मंदिर चर्चा में रहा था.

Umesh Srivastava | News18 Uttar Pradesh
Updated: July 22, 2019, 6:39 PM IST
इस शिव मंदिर का 1857 की क्रांति से है अटूट नाता...
मेरठ और क्रांति का अद्भुत नाता है. 10 मई 1857 को क्रांति की ज्वाला यहीं से फूटी थी.
Umesh Srivastava | News18 Uttar Pradesh
Updated: July 22, 2019, 6:39 PM IST
सावन का पहला सोमवार आज है और मेरठ के औघड़नाथ मंदिर की छटा तो बस देखते ही बनती है. यहां दूर-दूर तक सिर्फ और सिर्फ श्रद्धा का सैलाब नजर आ रहा है. सुबह से ही लम्बी-लम्बी कतारों में लगकर श्रद्धालु भोलेबाबा के दर्शनों के लिए लालायित हैं. मेरठ के औघड़नाथ मंदिर और 1857 की क्रांति का अद्भुत नाता है. इसी भूमि से 1857 में क्रांति का बिगुल भी फूंका गया था, लिहाज़ा जो भी श्रद्धालु यहां भोलेबाबा के दर्शनों के लिए आते हैं वो क्रांति के उदगम स्थल को भी प्रणाम करते हैं.

आपको बता दें कि मेरठ और क्रांति का अद्भु्त नाता है. 10 मई 1857 को क्रांति की जो ज्वाला मेरठ से फूटी थी वो अंग्रेजों को भगाकर देश को आज़ाद करने का सबब बनी. इस मंदिर में आज भी क्रांति के निशान मौजूद हैं. मेरठ में क्रांति के उदगम स्थल पहुंचने पर रग-रग में उस वक्त अंग्रेजों के खिलाफ हुई बगावत का अहसास होता है.

क्रांति और मेरठ का अद्भत नाता
10 मई 1857 क्रांति के निशान मेरठ के काली पलटन मंदिर में आज भी मौजूद हैं. भगवान भोलेनाथ के इस मंदिर परिसर में ही मौजूद है क्रांति का उदगम स्थल. यही वजह है कि दूर-दूर से आने वाले श्रद्धालु इसी धरा नमन करते हैं. जबकि यहां आज भी वो कुआं मौजूद हैं, जहां बैठकर बाबा स्वतन्त्रता सेनानियों को पानी पिलाते थे. यकीनन भारत की आजादी की लड़ाई के इतिहास में स्वर्णिम अक्षरों में दर्ज है 10 मई 1857 की तारीख.

10 मई 1857 क्रांति के निशान मेरठ के काली पलटन मंदिर में आज भी मौजूद हैं.


मेरठ की ज्‍वाला पूरे देश में फैली
10 मई 1857 को ही मेरठ से आजादी के पहले आंदोलन की शुरुआत हुई थी, जो बाद में पूरे देश में फैल गई. 85 सैनिकों के विद्रोह से जो चिंगारी निकली वह धीरे-धीरे ज्वाला बन गई. क्रांति की तैयारी सालों से की जा रही थी. नाना साहब, अजीमुल्ला, रानी झांसी, तांत्या टोपे, कुंवर जगजीत सिंह, मौलवी अहमद उल्ला शाह और बहादुर शाह जफर जैसे नेता क्रांति की भूमिका तैयार करने में अपने-अपने स्तर से लगे थे. गाय और मांस की चर्बी लगा कारतूस चलाने से मना करने पर 85 सैनिकों ने विद्रोह किया और उनके कोर्ट मार्शल के बाद क्रांतिकारियों ने उग्र रूप अख्तियार कर लिया था.
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10 मई 1857 को ही मेरठ से आजादी के पहले आंदोलन की शुरुआत हुई थी.


क्रांति की ये थी वजह
गाय और सुअर की चर्बी से बने कारतूस चलाने से मना करने पर 85 सैनिकों के कोर्ट मार्शल की घटना ने क्रांति की तात्कालिक भूमिका तैयार कर दी थी. हिंदू और मुसलमान सैनिकों ने बगावत कर दी थी. कोर्ट मार्शल के साथ उनको 10 साल की सजा सुनाई गई. 10 मई को रविवार का दिन था और चर्च में सुबह की जगह शाम को अंग्रेज अधिकारियों ने जाने का फैसला किया. हालांकि गर्मी इसका कारण था. कैंट एरिया से अंग्रेज अपने घरों से निकलकर सेंट जोंस चर्च पहुंचे. रविवार होने की वजह से अंग्रेजी सिपाही छुट्टी पर थे. कुछ सदर के इलाके में बाजार गए थे.

शाम करीब साढ़े पांच बजे क्रांतिकारियों और भारतीय सैनिकों ने ब्रितानी सैनिक और अधिकारियों पर हमला बोल दिया. सैनिक विद्रोह की शुरुआत के साथ सदर, लालकुर्ती, रजबन व आदि क्षेत्र में 50 से अधिक अंग्रेजों की मौत के साथ हुई. भारतीय पुलिस की ओर से सदर कोतवाल धन सिंह भी मौके पर पहुंचे. मेरठ से शुरू हुई क्रांति पंजाब, राजस्थान, बिहार, आसाम, तमिलनाडु व केरल में फैलती गई.

हालांकि क्रांति की ज्‍वाला पैदान करने वाले मेरठ के काली पलटन मंदिर को लेकर लोगों की मांग है कि इस स्थल एएसआई को संरक्षित करना चाहिए, लेकिन क्या ये हो पाएगा?

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First published: July 22, 2019, 6:36 PM IST
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