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रैन बसेरों का सच! हाड़ कंपाती ठंड में  गरीबों के लिए आसमान है छत और धरती है बिछौना

रैन बसेरों का सच! हाड़ कंपाती ठंड में  गरीबों के लिए आसमान है छत और धरती है बिछौना

मेरठ में ठेले पर रात गुजरता गरीब बुजुर्ग

मेरठ में ठेले पर रात गुजरता गरीब बुजुर्ग

उत्तर प्रदेश में ठंड बढ़ने के साथ ही बदहाल रैन बसेरों की तस्वीर भी सामने आ रही है. उत्तर भारत में कोहरे और शीतलहर का प्रकोप जारी है. इन सब के बीच रैन बसेरों में जरुरीसुविधाओं की कमी के चलते बेघर गरीब खुले में जहां-तहां रात गुजार रहे हैं. इन गरीबों का कहना है कि बदहाली से तो खुले आसमान की गोद ही अच्छी है.

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    उत्तर प्रदेश में ठंड बढ़ने के साथ ही बदहाल रैन बसेरों की तस्वीर भी सामने आ रही है. उत्तर भारत में कोहरे और शीतलहर का प्रकोप जारी है. इन सब के बीच रैन बसेरों में जरुरीसुविधाओं की कमी के चलते बेघर गरीब खुले में जहां-तहां रात गुजार रहे हैं. इन गरीबों का कहना है कि बदहाली से तो खुले आसमान की गोद ही अच्छी है.

    मेरठ शहर में नगर निगम प्रशासन ने 12 रैन बसेरे बनाए हैं, लेकिन सभी बदहाल हैं. बेघर और गरीबों के लिए प्रत्येक वर्ष कड़ाके की सर्दी में इन्हें खोला जाता है. केंद्र सरकार और सुप्रीम कोर्ट ने रैन बसेरों में सुविधाएं बढ़ाने के आदेश भले ही दे रखे हों लेकिन अधिकांश रैन बसेरों में अभी भी टूटे तख्त, फटे पुराने और गंदे कंबल व गद्दे ही हैं. इतना ही नहीं टूटे दरवाजों से ठंडी हवा लगातार भीतर आती है. फर्श क्षतिग्रस्त हैं, बाथरूम और रसोई में भी कोई सामग्री नहीं है. रैन बसेरों के अंदर और आसपास गंदगी पसरी है.

    नियमानुसार रैन बसेरों में सफाई के लिए वाइपर, झाडू, मच्छरों से बचाव के लिए मॉर्टिन, बाल्टी, रिकार्ड अंकित करने के लिए रजिस्टर और पैन, शौचालय, साबुन, फिनाइल आदि के साथ सर्दी में प्रयोग होने वाले बिस्तर और बिजली आदि की व्यवस्था होना जरूरी है.  लेकिन किसी भी रैन बसेरे में जांच के दौरान निम्न स्तर के बिस्तर के अलावा कोई अन्य सुविधा नहीं मिली.

    हमारे संवाददाता उमेश श्रीवास्तव ने जब मेरठ शहर में रैन बसेरों का जायज़ा लिया तो लोग गंदे रैन बसेरों की बजाए लोग खुले आसमान के नीचे ज्यादा सुकून महसूस करते नज़र आ रहे इन लोगों के लिए खुला आकाश छत और धरती बिछौना है. खुले आकाश के नीचे इन गरीबों ने एक ठेले में अपना सामान रखा है और दूसरे पर एक पन्नी के सहारे इन सर्द रातों का मुकाबला कर रहे हैं.

    इन गरीबों का कहना है कि रैन बसेरों के दरवाजे टूटे हैं, जिनसे ठंडी हवा आती है. तख्त टूटे हैं, कंबल गंदे और फटे हैं, गद्दे फटे पुराने हैं और गंदगी फैली है. ऐसे में सर्द रातों में गरीब तबके के लोग खुले आसमान के नीचे रात काटने को मजबूर है.

    ऐसा नहीं है कि सर्दी से बचाने के लिए सरकारी इंतजाम नहीं है. शहर में एक दर्जन रैन बसेरे ऐसे लोगों को शरण देने के लिए बनाए गए हैं, लेकिन इनकी हालत बदतर है. दूसरों को सर्दी से बचाने के लिए खोले गए रैन बसेरे खुद अव्यवस्था से कांप रहे हैं.

    मेरठ नगर निगम के नगर आयुक्त का कहना है कि सर्दी अचानक बढ़ गई है. रैन बसेरों के सुधार के लिए निरीक्षण किया गया है. यहां सुविधाएं उपलब्ध कराने के निर्देश दिये गये हैं और जल्द सुविधाएं उपलब्ध की जाएंगी. सभी रैन बसेरों पर रात में अलाव जलाने का आदेश भी दिया गया है. लेकिन ये आदेश सिर्फ कागज़ी ही साबित हो रहे हैं. सवाल ये है कि प्रशासनिक मशीनरी आखिर कब तक कुम्भकर्णी नींद में सोती रहेगी और लोग यूं ही खुले आकाश के नीचे सर्द रातों का मुकाबला करने के लिए मजबूर होते रहेंगे.

    आपके शहर से (मेरठ)

    Tags: मेरठ

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