Independence Day 2020: मेरठ में आज भी मौजूद हैं वो कुआं, जहां क्रान्तिवीर मिटाते थे प्यास
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Independence Day 2020: मेरठ में आज भी मौजूद हैं वो कुआं, जहां क्रान्तिवीर मिटाते थे प्यास
शहीद स्मारक मेरठ

Indepenedence Day 2020: 10 मई, 1857 को मेरठ (Meerut) में ही पहली बार आजादी की मशाल जली थी. आज भी इतिहास की निशानियां यहां मिलती है. यहीं के काली पलटन मंदिर में वो कुआं है, जहां कभी बाबा शिवचरण दास स्वतंत्रता संग्राम सेनानियों की प्यास बुझाया करते थे.

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मेरठ. स्वतंत्रता दिवस (Independence Day-2020) के मौके पर आज हम आपको मेरठ (Meerut) के उस स्थल पर ले चलेंगे, जहां से आजादी की पहली क्रान्ति की शुरुआत हुई थी. आज भी यहां क्रान्ति की निशानियां मौजूद हैं. मेरठ में क्रान्ति के उद्गम स्थल पहुंचने पर रगों में उस वक्त अंग्रेज़ों के खिलाफ हुई बगावत का अहसास होता है.

काली पलटन मंदिर में है ये कुआं

मेरठ कैंट इलाके में स्थित काली पलटन मंदिर में आज भी वो कुआं मौजूद हैं, जहां बाबा शिवचरण दास स्वतन्त्रता संग्राम सेनानियों को पानी पिलाया करते थे. 10 मई, 1857 को मेरठ से आजादी के पहले आंदोलन की शुरूआत हुई थी, जो बाद में पूरे देश में फैल गई. 85 सैनिकों के विद्रोह से जो चिंगारी निकली, वह धीरे-धीरे ज्वाला बन गई.



85 सैनिकों ने किया था विद्रोह
क्रांति की तैयारी सालों से की जा रही थी. नाना साहब, अजीमुल्ला, रानी झांसी, तात्या टोपे, कुंवर जगजीत सिंह, मौलवी अहमद उल्ला शाह और बहादुर शाह जफर जैसे नेता क्रांति की भूमिका तैयार करने में अपने-अपने स्तर से लगे थे. गाय और सुअर की चर्बी लगा कारतूस चलाने से मना करने वाले 85 सैनिकों ने विद्रोह किया. उनके कोर्ट मार्शल के बाद क्रांतिकारियों ने उग्र रूप अख्तियार किया.

85 सैनिकों के कोर्ट मार्शल की घटना ने क्रांति की तात्कालिक भूमिका तैयार कर दी थी. हिंदू और मुसलमान सैनिकों ने बगावत कर दी थी. कोर्ट मार्शल के साथ उनको 10 साल की सजा सुनाई गई. 10 मई, 1857 को रविवार का दिन था. चर्च में सुबह की जगह शाम को अंग्रेज अधिकारियों ने जाने का फैसला किया. गर्मी इसका कारण था.

शाम को क्रांतिकारियों और भारतीय सैनिकों ने बोला था हमला

कैंट एरिया से अंग्रेज अपने घरों से निकलकर सेंट जोंस चर्च पहुंचे. रविवार होने की वजह से अंग्रेजी सिपाही छुट्टी पर थे. कुछ सदर के इलाके में बाजार गए थे. शाम करीब साढ़े पांच बजे क्रांतिकारियों और भारतीय सैनिकों ने ब्रिटिश सैनिक और अधिकारियों पर हमला बोल दिया. सैनिक विद्रोह की शुरूआत के साथ सदर, लालकुर्ती, रजबन व आदि क्षेत्र में 50 से अधिक अंग्रेजों की मौत के साथ हुई. भारतीय पुलिस की ओर से सदर कोतवाल धन सिंह भी मौके पर पहुंचे.

मेरठ से शुरू हुई क्रांति पंजाब, राजस्थान, बिहार, असम, तमिलनाडु व केरल में फैलती गई. आज मेरठ में क्रान्ति स्थल पर पहुंचने पर लोग आदर के साथ इस स्थल को प्रणाम करते हैं.

मिनटों में विक्टोरिया पार्क जेल हुआ था मुक्त

इतिहासकार बताते हैं कि 10 मई की शाम 6.30 बजे सिपाहियों ने 85 सैनिकों को विक्टोरिया पार्क जेल से मुक्त करा लिया. देखते ही देखते फिरंगियों के खिलाफ विद्रोह के सुर तेजी से मुखर हुए. तीनों रेजीमेंटों के सिपाही विभिन्न टोलियों में बंटकर दिल्ली कूच कर गए. 11 मई को मेरठ की देसी पलटनें साज-सज्जा और जोश के साथ यमुना पुल पार करती देखी गईं. क्रान्ति के उद्गम स्थल पर आज भी दूर-दूर से आए लोगों का तांता लगा रहता है. स्वतंत्रता दिवस पर मेरठ की क्रान्ति को हमेशा याद रखा जाएगा. आप सभी को स्वतंत्रता दिवस की हार्दिक शुभकामनाएं.
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