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जानिए मेरठ के इस किले का रहस्य, जहां लगता है कोबरा से लेकर जहरीले सांपों का डेरा

जानिए मेरठ के इस किले का रहस्य (file photo)
जानिए मेरठ के इस किले का रहस्य (file photo)

सांप (Snakes) की कहानी की शुरुआत तब होती है जब राजा परीक्षित जंगल का भ्रमण करते हुए ऋषि (Monk) शमीक की कुटिया में पहुंचे थे.

  • News18Hindi
  • Last Updated: November 23, 2020, 12:42 PM IST
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मेरठ. यूपी के मेरठ (Meerut) जिले से चालीस किलोमीटर दूर किला परीक्षितगढ़ का किला और सर्प (Snake) से जुड़ा हुआ एक ऐसा रहस्य जिसके बारे में जानकर आप भी हैरान रह जाएंगे. मान्यता ये है कि अगर परीक्षितगढ़ में या फिर यहां मौजूद श्रंगी ऋषि आश्रम में आसपास भी कहीं सांप होता है तो इसका अहसासा इंसान को ख़ुद ब ख़ुद हो जाता है. मान्यता ये भी है कि यहां राजा परीक्षित के पुत्र रहे जान्मेजय का नाम लेने भर से ही सांप कई मीटर पीछे लौट जाता है. श्रंगी ऋषि आश्रम के पुजारी तो यहां तक कहते हैं कि अगर कोई यहां सांप की पूंछ पर भी पैर रख दे तो वो नहीं काटता.

सांपों का अपना एक अलग ही संसार होता है. इसमें बड़े विशाल अजगर से लेकर कोबरा जैसे सांप आते हैं. शिव का एक प्रमुख आभूषण सांप ही है. भारत में सांपों से जुड़े कई त्यौहार भी मनाये जाते हैं. उन्ही त्योहारों में से एक त्योहार नाग पंचमी है. मेरठ के पास स्थित किला परीक्षितगढ़ है महाभारत कालीन राजा परीक्षित के नाम पर पड़ा है. यह कहानी राजा परीक्षित की सर्पदंश से हुई मृत्यु से शुरू होती है.

 ऋषि शमीक का अपमान



राजा परीक्षित उत्तरा और अभिमन्यु के पुत्र थे जिनको कृष्ण ने अश्वत्थामा द्वारा चलाये गए ब्रम्हास्त्र से बचाया था. परीक्षित का पालन-पोषण विष्णु और कृष्ण द्वारा किया गया था. परीक्षित का नाम परीक्षित इस लिए पड़ा क्योंकि वह सभी के बारे में यह परीक्षण करते थे कि वह कहीं उस आदमी से अपनी मां के गर्भ में ही तो नहीं मिला था. सांप की कहानी की शुरुआत तब होती है जब राजा परीक्षित जंगल का भ्रमण करते हुए ऋषि शमीक की कुटिया में पहुंचे थे.
वहां वह अत्यंत प्यासे थे और उन्होंने ध्यान लगाये हुए ऋषि शमीक को कई बार बड़े आदर और भाव से जगाना चाहा पर ऋषि का ध्यान ना टूटा और अंत में परेशान होकर उन्होंने एक मरे हुए सांप को ऋषि के ऊपर डाल दिया था. इस वाकिये को सुनकर ऋषि के पुत्र श्रृंगी ने परीक्षित को यह श्राप दे दिया कि वह सातवें दिन ही एक सांप द्वारा दंश किये जायेंगे और उनकी मृत्यु इससे हो जायेगी.

ऋषि का वेश बनाकर सांप ने राजा को डंसा

इसी श्राप को सुन कर राजा परीक्षित ने अपने पुत्र को राजा बना दिया और अगले सात दिन तक ऋषि शुक देव जो कि ऋषि वेद व्यास के पुत्र थे से भागवत पुराण सुनी. भागवत कथा सुनने के बाद परीक्षित ने ऋषि की पूजा करने के बाद कहा कि उनको अब सर्प दंश से कोई डर नहीं है क्यूंकि उन्होंने आत्मन और ब्रम्ह को जान लिया है.लेकिन ठीक सातवें दिन तक्षक सांप ऋषि का वेश बना कर राजा से मिलने आया और उनको डंस लिया जिससे उनकी मृत्यु हो गयी.

ऋषियों ने बताया किले का रहस्य

एक अन्य कथा के अनुसार जब परीक्षित को यह श्राप मिला तब उन्होंने एक कांच का महल बनवाया जिसमें कोई भी आ जा न सके. परन्तु तक्षक सांप एक छोटे जानवर का रूप लेकर फूल में से होते हुए चले गया. और राजा के पास पहुंचते ही अपने असली रूप में आकर उसने राजा को काट लिया. इस घटना के बाद राजा परीक्षित के पुत्र जन्मेजय अत्यंक क्रोधित हुए और वे सर्प सत्र या सर्प समूल नाश यज्ञ करवाने का आयोजन करते हैं. इस यज्ञ को करने के लिए ऋषियों को बुलाया गया था. जन्मेजय ने यह ठाना कि मात्र तक्षक ही नहीं अपितु संसार के समस्त सांपों की बलि वो दे देंगे.

पांच फनों वाला सांपों का जमावड़ा

यज्ञ के शुरू होते ही बड़ी मात्र में सर्प हवन कुंड में आने लगे. इतने में एक आस्तिक नाम के ऋषि आये और उन्होंने महाभारत में घटी घटनाओं को जन्मेजय को सुनाया जिसके बाद जन्मेजय यह यज्ञ रोक देते हैं. लेकिन इस वाक्ये के बाद इस स्थान पर सांपों में जान्मेजय का ऐसा ख़ौफ हुआ कि वो आज भी जन्मेजय का नाम सुनते ही कई मीटर पीछे लौट जाता है. श्रंगी ऋषि आश्रम के पुजारी का कहना है कि और तो और आश्रम में तो सांप की पूंछ पर भी अगर पैर रख दिया जाए तो वो नहीं काटता. यही नहीं वो ये भी दावा करते हैं कि इस स्थान पर अमावस्या और पूर्णिमा में पांच फनों वाला सांप भी आता है.
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