अजब है पर सच है! एक गांव जहां 163 साल से नहीं मनाया गया दशहरा, जानिए वजह..

मेरठ जनपद के गगोल गांव के लोगों ने वर्ष 1857 के बाद से असत्य पर सत्य की जीत वाले दशहरा पर्व नहीं मनाया है
मेरठ जनपद के गगोल गांव के लोगों ने वर्ष 1857 के बाद से असत्य पर सत्य की जीत वाले दशहरा पर्व नहीं मनाया है

वर्ष 1857 में आजादी की क्रांति के दौरान हुई इस घटना के बाद चाहे गांव का बच्चा हो या बुजुर्ग, महिला हो या पुरुष कोई भी दशहरा (Dussehra 2020) नहीं मनाता. यही नहीं इस दिन गांव के किसी घर में चूल्हा तक नहीं जलता. कहा जा सकता है कि इस दिन पूरा गगोल गांव (Gagol Village) शोक में डूब जाता है

  • News18Hindi
  • Last Updated: October 24, 2020, 7:27 PM IST
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मेरठ. रविवार 25 अक्टूबर को बुराई पर अच्छाई का पर्व दशहरा (Dussehra 2020) है. मान्यता है कि इस दिन भगवान श्रीराम (Lord Rama) ने बुराई के प्रतीक लंकापति रावण (Ravana) का नाश कर विश्व को पाप से मुक्ति दिलाई थी. इसलिए पूरा देश इस दिन को असत्य पर सत्य की विजय मानते हुए विजयादशमी (दशहरा) का त्योहार मनाता है. मगर उत्तर प्रदेश के मेरठ जनपद (Meerut) के परतापुर स्थित एक गांव ऐसा है जहां आज तक कभी दशहरा नहीं मनाया गया है. यहां दशहरा का जिक्र होते ही लोग उदास हो जाते हैं और शोक में डूब जाते हैं.

मेरठ से तीस किलोमीटर दूर स्थित गगोल गांव (Gagol Village) की यह सच्चाई है. जब सभी लोग दशहरा का त्योहार मनाते हैं तो गगोल गांव में मातमी सन्नाटा रहता है. इस रहस्य का पता लगाने के लिए न्यूज़ 18 तकरीबन अट्ठारह हजार की आबादी वाले गांव गगोल पहुंचा तो हैरान करने वाली सच्चाई सामने आई. यहां के ग्रामीणों का कहना है कि वर्ष 1857 में मेरठ में आजादी की क्रांति की ज्वाला फूटी थी तो इस गांव के नौ लोगों को दशहरे के दिन फांसी दे दी गई थी. गांव में पीपल का वो पेड़ आज भी मौजूद है जहां इन सभी को फांसी पर लटका दिया गया था. जिन लोगों को सूली पर लटकाया गया था, उनके नाम हैं- शिब्बा सिंह, रमन सिंह, हरजस सिंह, कढेरा सिंह, राम सहाय, हिम्मत सिंह, घसीटा सिंह, बैरम और दरबा सिंह. इस सभी की उसी पीपल के पेड़ के नीचे समाधि बनाई गई थी. हर वर्ष दशहरे पर इन लोगों को याद कर श्रद्धांजलि दी जाती है.

मेरठ के गगोल गांव के ग्रामीणों का कहना है कि वर्ष 1857 में मेरठ में आजादी की क्रांति की ज्वाला फूटी थी तो यहां के नौ लोगों को दशहरे के दिन फांसी दे दी गई थी. इसलिए शोकस्वरूप वो तब से दशहरा नहीं मनाते हैं




घटना को याद कर पूरा गांव शोक में डूब जाता है, चूल्हा तक नहीं जलता
इस घटना के बाद चाहे गांव का बच्चा हो या बुजुर्ग, महिला हो या पुरुष कोई भी दशहरा नहीं मनाता. यही नहीं इस दिन गांव के किसी घर में चूल्हा तक नहीं जलता. कहा जा सकता है कि इस दिन पूरा गगोल गांव शोक में डूब जाता है.

ग्रामीणों का कहना है कि इन नौ लोगों को आज तक शहीद का दर्जा नहीं दिया गया. वो इस संबंध में सरकार से भी गुहार लगाते हैं. अब जबकि दशहरे का त्योहार आने वाला है गांव के रहने वाले लोग यादों के गलियारों में खो गए हैं.
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