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मेरठ:-जानिए आखिर क्यों सरधना की ऐतिहासिक चर्च को कहा जाता है चमत्कारी चर्च 

मेरठ:-जानिए आखिर क्यों सरधना की ऐतिहासिक चर्च को कहा जाता है चमत्कारी चर्च 

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आस्था और अटूट विश्वास का केंद्र है सरधना(Sardhna) चर्च जिसको चमत्कारी चर्च के नाम से भी जाना जाता है.मेरठ  से 20 किलोमीटर दूर सरधना तहसील में स्थित चर्च में देश ही नहीं विदेशों से भी लोग आते हैं.मान्यता है कि माता मरियम से सच्चे मन से प्रार्थना कर जो भी मन्नत मांगता है उसकी मन्नत जरूर पूरी होती है.

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    मेरठ में आप को आस्था और विश्वास के अनेकों स्थान देखने को मिलेंगे.जहां लोगों की मन्नते पूरी होती है.दूरदराज से भी लोग दर्शन करने के लिए पहुंचते हैं.कुछ इसी तरह की आस्था और अटूट विश्वास का केंद्र है सरधना(Sardhna) चर्च जिसको चमत्कारी चर्च के नाम से भी जाना जाता है.मेरठ से 20 किलोमीटर दूर सरधना तहसील में
    स्थित चर्च में देश ही नहीं विदेशों से भी लोग आते हैं.मान्यता है कि माता मरियम से सच्चे मन से प्रार्थना कर जो भी मन्नत मांगता है उसकी मन्नत जरूर पूरी होती है.वही आज क्रिसमस के अवसर पर चर्च को भव्य रूप से सजाया गया है.क्रिसमस के विशेष अवसर पर
    यीशु मसीहाका जन्मदिन मनाया जा रहा है.साथ ही विशेष प्रार्थना का भी आयोजन किया गया.जिसमें सीमित लोगों की संख्या में माता मरियम से प्रार्थना की जाएगी.

    1809 में चर्च का निर्माण हुआ था शुरू 1822 में बनकर हुई थी तैयार
    सरधना में बनी ऐतिहासिक रोमन कैथलिक चर्च को फरजाना उर्फ बेगम समरू द्वारा बनवाया गया था.मान्यता है कि चर्च का निर्माण 1809 में शुरू हुआ था.यह निर्माण कार्य 11 साल से ज्यादा चला 1822 में यह सर्च बनकर तैयार हुई.इतना ही नहीं इसके बाद यह तक कहा जाता है कि चर्च को बनाने के लिए उस दौर में 25 पैसे रोज मिस्त्री को रखा गया था.जोकि उस दौर का सबसे महंगा मिस्त्री था.

    सरधना की चर्च को चमत्कारी भी कहा जाता है
    मान्यता है कि जब इस चर्च का निर्माण हो गया था.तो सबसे पहले एक महिला माता मरियम से प्रार्थना करने पहुंची थी.जिसमें उसने अपने बेटे के स्वस्थ होने की प्रार्थना की थी.जो काफी दिनों से गंभीर बीमारी से ग्रस्त था कहा जाता है.जैसे ही माता मरियम से उस महिला ने प्रार्थना की थी .उसके पश्चात उसका बेटा स्वस्थ हो गया था.उसदिन के बाद से माता मरियम की प्रार्थना करने के लिए लोगों का तांता लगने लगा.

    चर्च के निर्माण में बेजोड़ वास्तु कला की झलक देखने को मिलती है .
    रोम व पूर्वी सभ्यताबेगम ने चर्च के निर्माण कार्य की कमान सैन्य अधिकारी मेजर एंथोनी रेगीलीनी के हाथ में सौंपी थी.जिनको वास्तुकला का काफी ज्ञान था.चर्च में जिस स्थान पर प्रार्थना होती है. उसे अल्तार कहा जाता है.इस अल्तार के निर्माण के लिए सफेद संगमरमर जयपुर से लाया गया था.इसमें फूलों की पच्चीकारी बड़ी ही खूबसूरती से की गई है.जिसमें कीमती पत्थर भी जुड़े हुए हैं .जोकि चर्च की खूबसूरती को और बढ़ाते हैं. इतना ही नहीं फूल पत्तियों के नमूने की वजह से अल्तार ताजमहल में बनी फूलों की पंचकारी से मिलता जुलता है.

    रिपोर्ट
    विशाल भटनागर
    मेरठ

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