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कभी जुड़ा था फिल्म स्टार दिलीप कुमार से नाम, अब सरकारी मदद का तलबगार है मेरठ का ये बाज़ार

Umesh Srivastava | News18 Uttar Pradesh
Updated: November 25, 2019, 7:01 PM IST
कभी जुड़ा था फिल्म स्टार दिलीप कुमार से नाम, अब सरकारी मदद का तलबगार है मेरठ का ये बाज़ार
फिल्म स्टार दिलीप कुमार भी मेरठ का बना हुआ ट्रंपेट एक फिल्म में बजा चुके हैं (File Photo)

ब्रिटिश आर्मी (British Army) में बैंड लीडर (Band Leader) रहे नादिर अली ने 1905 में मेरठ (Meerut) में बैंड (Band) बनाना शुरु किया था, अब यहां एक पूरा बाजार ही वाद्य यंत्रों को समर्पित है. यहां करीब 100 तरह के वाद्य यंत्र बनाए जाते हैं, लेकिन अब इस परंपरा को आगे बढ़ने के लिए यहां के सधे हुए हाथों को सरकार मदद की दरकार है.

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मेरठ. पूरा विश्व में मेरठ (Meerut) को क्रान्ति की नगरी (City of Revolution) के रूप में जाना जाता है, लेकिन आपको जानकर अच्छा लगेगा कि मेरठ सुर और ताल (Tone and rhythm) के क्षेत्र में भी क्रान्ति करता रहा है. प्रथम विश्व युद्ध (First World war) से लेकर अब तक कई देशों में मेरठ के वाद्य यंत्र बजाए जा रहे हैं. अमेरिका के व्हाइट हाउस (White House, America) में भी यहीं के वाद्य यंत्रों ने एक ज़माने में धुन बजाई थी. यहां का बना वाद्य यंत्र फिल्म दिलीप कुमार भी एक फिल्म में बजा चुके हैं. इस कारोबार से जुड़े कारीगर (Artisan) इस सुर और साज़ में ही जीवन गुज़ारना चाहते हैं, इसलिए वो सरकार से गुहार भी लगा रहे हैं कि एशिया (Asia) की इस सबसे बड़ी मंडी की ओर भी नज़रें इनायत हों ताकि यहां का राग फिर से विश्वव्यापी हो सके.

लंबी है मेरठ से साज़ों की जुगलबंदी
ज़िन्दगी के सफर में सुर और साज़ की जुगलबंदी का जवाब नहीं है. क्रान्ति की नगरी कहे जाने वाले मेरठ के मिजाज़ में भी संगीत धड़कता है. बैंड पार्टी से जुड़े साज़ बनाने में मेरठ ने दुनिया को तोहफे दिए हैं. ब्रिटिश आर्मी में बैंड लीडर रहे नादिर अली ने 1905 में बैंड बनाना शुरू किया. 1914 में प्रथम विश्व युद्ध और 1939 से लेकर 1945 तक दूसरे विश्वयुद्ध में सिर्फ मेरठ के बैंड की ही धून गूंजती रही. बाद में फिल्मों और अमेरिका के व्हाइट हाउस तक में यहां के बैंड की धूनें गूंजी. बांसुरी, शहनाई, ढोलक और अन्य साज़ भी यहीं बनने लगे. तकनीकी बदलाव के दौर में भी यहां कारोबार की लय बरकरार रही. यहां आज की तारीख में 100 प्रकार के वाद्य यंत्र बनाए जाते हैं. यहां के 'जलीकोठी' इलाके में एक पूरा बाज़ार वाद्य यंत्रों को ही समर्पित है.

news - यहां के कारीगर इसी में जीवन बिताना चाहते हैं तो नई पीढी कुछ नया करना चाहती है
यहां के कारीगर इसी में जीवन बिताना चाहते हैं तो नई पीढी कुछ नया करना चाहती है


सरकार से मदद की गुहार
एक ज़माने में अभिनेता दिलीप कुमार ने भी यहीं के बने हुए ट्रम्पेट बजाए थे. फिल्म लीडर में उन्होंने 'मुझे दुनिया वालों शराबी न समझो ' गीत पर ट्रंपेट बजाकर सुर साधना की थी. 15 अगस्त और 26 जनवरी की परेड में भी मेरठ के बैंड और अन्य वाद्य यंत्र इस्तेमाल होते हैं. यहां के कारीगरों को भारतीय और यूरोपीय वाद्य यंत्र बनाने में महारथ हासिल है. सउदी अरब, सिंगापुर, नेपाल, आस्ट्रेलिया से लेकर दर्जन भर अफ्रीकी देशों में यहां के बने हुए वाद्य यंत्रों का इस्तेमाल होता है. इस कारोबार से जुड़े हुए कारोबारी आखिरी सांस तक यही करना चाहते हैं. लेकिन अब नई पीढ़ी कुछ नया करना चाहती है. कारोबारियों का कहना है कि अगर सरकार इस ओर ध्यान दे तो ये उद्योग और बढ़ेगा, नहीं तो अब नई पीढ़ी कुछ नया करने पर आमादा है.

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First published: November 25, 2019, 6:13 PM IST
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