कांवड़ यात्रा से परशुराम और श्रवण कुमार का है खास नाता, जानिए क्‍यों?

कांवड़ यात्रा को लेकर अलग-अलग जगहों की अलग मान्यताएं रही हैं. ऐसा मानना है कि सर्वप्रथम भगवान परशुराम ने कांवड़ लाकर बागपत के पुरा महादेव में भगवान भोलेनाथ को जल चढ़ाया था, तभी से कांवड़ यात्रा की शुरुआत हुई थी.

Umesh Srivastava | News18 Uttar Pradesh
Updated: July 28, 2019, 11:59 AM IST
कांवड़ यात्रा से परशुराम और श्रवण कुमार का है खास नाता, जानिए क्‍यों?
ऐसे शुरू कांवड़ यात्रा...
Umesh Srivastava | News18 Uttar Pradesh
Updated: July 28, 2019, 11:59 AM IST
भगवान भोलेनाथ का ध्यान जब हम करते हैं तो श्रावण (सावन) का महीना, रूद्राभिषेक और कांवड़ का उत्सव आंखों के सामने आता है. हरिद्वार से लेकर वाराणसी तक केसरिया कुम्भ नजर आ रहा है. खासतौर से वेस्ट यूपी में तो कांवड़ यात्रा का नजारा देखने लायक है. जबकि आज हम आपको बताएंगे कि आखिर कांवड़ यात्रा की शुरुआत कब हुई और इसकी क्या मान्यताएं हैं.

ऐसे शुरू हुई कांवड यात्रा
कांवड़ यात्रा को लेकर अलग-अलग जगहों की अलग मान्यताएं रही हैं. ऐसा मानना है कि सर्वप्रथम भगवान परशुराम ने कांवड़ लाकर बागपत के पुरा महादेव में भगवान भोलेनाथ को जल चढ़ाया था, तभी से कांवड़ यात्रा की शुरुआत हुई थी. गढ़मुक्तेश्वर से गंगाजल लाकर उन्होंने पुरातन शिवलिंग पर जलाभिषेक, किया था. आज भी उसी परंपरा का अनुपालन करते हुए श्रावण मास में गढ़मुक्तेश्वर, जिसका वर्तमान नाम ब्रजघाट है वहां से जल लाकर लाखों लोग श्रावण मास में भगवान शिव पर उसे चढ़ाकर अपनी कामनाओं की पूर्ति करते हैं.

ये मंदिर बना आस्‍था का केंद्र

मेरठ से तकरीबन पचास किलोमीटर दूर बालौनी कस्बे में एक छोटे से गांव पुरा में हिन्दू भगवान शिव का एक प्राचीन मंदिर है जो शिवभक्तों की आस्था का केन्द्र है. मान्यता है कि काफी पहले यहां पर कजरी वन हुआ करता था. इसी वन में जमदग्नि ऋषि अपनी पत्नी रेणुका सहित अपने आश्रम में रहते थे. रेणुका प्रतिदिन कच्चा घड़ा बनाकर हिंडन नदी से जल भर कर लाती थीं, जिसे वह शिव को अर्पण किया करती थीं. प्राचीन समय में एक बार राजा सहस्त्र बाहु शिकार खेलते हुए उस आश्रम में पहुंचे. ऋषि की अनुपस्थिति में रेणुका ने कामधेनु गाय की कृपा से राजा का पूर्ण आदर सत्कार किया. राजा उस अद्भुत गाय को बलपूर्वक वहां से ले जाना चाहता था, लेकिन वह ऐसा करने में सफल नहीं हो सका.

अन्त में राजा गुस्से में रेणुका को ही बलपूर्वक अपने साथ हस्तिनापुर अपने महल में ले गया तथा कमरे में बन्द कर दिया. रानी ने अवसर पाते ही अपनी छोटी बहन द्वारा रेणुका को मुक्त्त कर दिया. रेणुका ने वापिस आकर सारा वृतान्त ऋषि को कह सुनाया, लेकिन ऋषि ने एक रात्रि दूसरे पुरूष के महल में रहने के कारण रेणुका को ही आश्रम छोड़ने का आदेश दे दिया. रेणुका ने अपने पति से बार-बार प्रार्थना की कि वह पूर्णता पवित्र है तथा वह आश्रम छोड़कर नहीं जायेगी. रेणुका ने कहा कि अगर उन्हें विश्वास नहीं तो वे अपने हाथों से उसे मार दें, जिससे पति के हाथों मरकर वह मोक्ष को प्राप्त हो जाये, लेकिन ऋषि अपने आदेश पर अडिग रहे.

फिर ऋषि ने किया ये काम
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इसके बाद ऋषि ने अपने तीन पुत्रों को उनकी माता का सिर धड़ से अलग करने को कहा, लेकिन उनके पुत्रों ने मना कर दिया. चौथे पुत्र परशुराम ने पितृ आज्ञा को अपना धर्म मानते हुए अपनी माता का सिर धड़ से अलग कर दिया. बाद में परशुराम को इसका घोर पश्चाताप हुआ उन्होंने थोड़ी दूर पर ही घोर तपस्या करनी आरम्भ कर दी तथा वहां पर शिवलिंग स्थापित कर उसकी पूजा करने लगे. उनकी तपस्या से प्रसन्न होकर आशुतोष भगवान शिव ने उन्हें प्रत्यक्ष दर्शन दिये तथा वरदान मांगने को कहा. भगवान परशुराम ने अपनी माता को पुनर्जीवित करने की प्रार्थना की. भगवान शिव ने उनकी माता को जीवित कर दिया तथा एक परशु (फरसा) भी दिया तथा कहा जब भी युद्ध के समय इसका प्रयोग करोगे तो विजय होगे.

यूं हुई शुरुआत
भगवान शिव को प्रसन्न करने केलिए परशुराम गढ़मुक्तेश्वर से गंगाजल कांवड़ में लाकर पुरामहादेव मंदिर में चढ़ाते थे,तभी से कांवड़ यात्रा की शुरुआत मानी जाती है. परशुराम वहीं पास के वन में एक कुटिया बनाकर रहने लगे. थोड़े दिन बाद ही उन्‍होंने अपने फरसे से सम्पूर्ण सेना सहित राजा सहस्त्रबाहु को मार दिया और जिस स्थान पर शिवलिंग की स्थापना की थी वहां एक मंदिर भी बनवा दिया. कालान्तर मंदिर खंडहरों में बदल गया. जबकि काफी समय बाद एक दिन रानी इधर घूमने निकली तो उसका हाथी वहां आकर रूक गया. महावत की बड़ी कोशिश के बाद भी हाथी वहां से नहीं हिला,तब रानी ने सैनिकों को वह स्थान खोदने का आदेश दिया. खुदाई में वहां एक शिवलिंग प्रकट हुआ जिस पर रानी ने एक मंदिर बनवा दिया. यही शिवलिंग तथा इस पर बना मंदिर आज परशुरामेश्वर मंदिर के नाम से विख्यात है.

पुरामहादेव मंदिर के अलावा वेस्ट यूपी के कई ऐसे मंदिर हैं जहां का अलग-अलग इतिहास है.


हालांकि पुरामहादेव मंदिर के अलावा वेस्ट यूपी के कई ऐसे मंदिर हैं जहां का अलग अलग इतिहास है और यहां भी कांवड़िए गंगाजल लाकर चढ़ाते हैं. ये भी मान्यता है कि श्रवण कुमार जब अपने अंधे माता पिता को लेकर तीर्थों के दर्शन कराने के लिए निकले तब से कांवड़ यात्रा की शुरुआत हुई.

बात औघड़नाथ शिव मन्दिर की

मेरठ में औघड़नाथ शिव मन्दिर एक प्राचीन सिद्धिपीठ है. इस मन्दिर में स्थापित लधुकाय शिवलिंग स्वयंभू हैं. यहां मनोकामनाएं पूर्ण करने वाले औघड़दानी शिवस्वरूप हैं. इसी कारण इसका नाम औघड़नाथ शिव मन्दिर पड़ गया. भारत के प्रथम स्वातन्त्रय संग्राम (1857) की भूमिका में इस देव-स्थान का प्रमुख स्थान रहा है. औघड़नाथ मंदिर के पुजारी पण्डित श्रीधर त्रिपाठी का कहना है कि जब शिव जी ने हलाहल पान किया था तब से कांवड़ यात्रा की शुरुआत हुई थी.

वैसे शिव भूतनाथ, पशुपतिनाथ, अमरनाथ आदि सब रूपों में कहीं न कहीं जल, मिट्टी, रेत, शिला, फल, पेड़ के रूप में पूज्‍यनीय हैं. जल साक्षात् शिव है, तो जल के ही जमे रूप में अमरनाथ हैं. कांवड़ शिव के उन सभी रूपों को नमन है. कंधे पर गंगा को धारण किए श्रद्धालु इसी आस्था और विश्वास को जीते हैं. यूं भी कह सकते हैं कि कांवड़ यात्रा शिव के कल्याणकारी रूप और निष्ठा के नीर से उसके अभिषेक को तीव्र रूप में प्रतिध्वनित करती है.

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First published: July 28, 2019, 11:40 AM IST
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