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एक नेशनल प्लेयर की दर्दभरी कहानी, खेल का मैदान छोड़ थामा सब्जी का ठेला

एक नेशनल प्लेयर की दर्दभरी कहानी, खेल का मैदान छोड़ थामा सब्जी का ठेला

कहते हैं इरादों से हौसलों की उड़ान होती है, लेकिन मेरठ के गौरव तितौरिया के साथ ऐसा नहीं हुआ। जबरदस्त मेधा के धनी गौरव की कामयाबी की उड़ान को मुफलिसी के बादलों ने परवान चढ़ने से पहले ही मटियामेट कर दिया। जबरदस्त फुर्ती और इच्छाशक्ति के कारण मेरठ के रहने वाले गौरव ने कबड्डी में अनेक धुरंधरों को हराकर कर खूब नाम कमाया। लेकिन, राष्ट्रीय फलक पर चमकने वाला गौरव अब मुफलिसी के झंझावतों में बुरी तरह जकड़ गया है और बन गया सब्जीवाला।

कहते हैं इरादों से हौसलों की उड़ान होती है, लेकिन मेरठ के गौरव तितौरिया के साथ ऐसा नहीं हुआ। जबरदस्त मेधा के धनी गौरव की कामयाबी की उड़ान को मुफलिसी के बादलों ने परवान चढ़ने से पहले ही मटियामेट कर दिया। जबरदस्त फुर्ती और इच्छाशक्ति के कारण मेरठ के रहने वाले गौरव ने कबड्डी में अनेक धुरंधरों को हराकर कर खूब नाम कमाया। लेकिन, राष्ट्रीय फलक पर चमकने वाला गौरव अब मुफलिसी के झंझावतों में बुरी तरह जकड़ गया है और बन गया सब्जीवाला।

कहते हैं इरादों से हौसलों की उड़ान होती है, लेकिन मेरठ के गौरव तितौरिया के साथ ऐसा नहीं हुआ। जबरदस्त मेधा के धनी गौरव की कामयाबी की उड़ान को मुफलिसी के बादलों ने परवान चढ़ने से पहले ही मटियामेट कर दिया। जबरदस्त फुर्ती और इच्छाशक्ति के कारण मेरठ के रहने वाले गौरव ने कबड्डी में अनेक धुरंधरों को हराकर कर खूब नाम कमाया। लेकिन, राष्ट्रीय फलक पर चमकने वाला गौरव अब मुफलिसी के झंझावतों में बुरी तरह जकड़ गया है और बन गया सब्जीवाला।

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कहते हैं इरादों से हौसलों की उड़ान होती है, लेकिन मेरठ के गौरव तितौरिया के साथ ऐसा नहीं हुआ। जबरदस्त मेधा के धनी गौरव की कामयाबी की उड़ान को मुफलिसी के बादलों ने परवान चढ़ने से पहले ही मटियामेट कर दिया। जबरदस्त फुर्ती और इच्छाशक्ति के कारण मेरठ के रहने वाले गौरव ने कबड्डी में अनेक धुरंधरों को हराकर कर खूब नाम कमाया। लेकिन, राष्ट्रीय फलक पर चमकने वाला गौरव अब मुफलिसी के झंझावतों में बुरी तरह जकड़ गया है और बन गया सब्जीवाला।

मुफलिसी ने रोकी हौसलों की उड़ानः
पिता की मौत ने चूर किए नेशनल खिलाड़ी के सपने। घर के गुजारे को बेच रहा है सब्जी। ये दास्तान है मेरठ के रहने वाले होनहार खिलाड़ी गौरव तितौरिया की। कभी कबड्डी में राष्ट्रीय खिलाड़ी रहा गौरव अब सब्जी बेचने को मजबूर है। गौरव के पिता की मौत ने सारे हालात बदल दिए और वो खिलाड़ी कहलाते कहलाते सब्जीवाला कहलाने लगा। वर्ष 2012 में गौरव के पिता श्रीपाल सिंह की बीमारी से मौत हो गई। जिससे घर में रोटी के लाले पड़ गए।

मजबूरी में पढ़ाई और खेल का मैदान दोनों छिन गए। रोजगार भी नसीब नहीं हुआ। बदतर हालात में पिता के सब्जी के काम को ही व्यवसाय बना लिया। घर में मेडलों की झड़ी लगाने वाले गौरव को अब लोग राष्ट्रीय खिलाड़ी के तौर पर नहीं एक सब्जीवाला की हैसियत से जानते हैं।

मेडलों की लगा दी थी झड़ीः
गौरव ने महज चार साल में पढ़ते हुए मेडलों की झड़ी लगा दी। जवाहर नवोदय विद्यालय सरधना में छठीं कक्षा से दसवीं कक्षा तक कबड्डी में खूब पदक झटके। गौरव ने अंडर चौदह और फिर अंडर सत्रह में नेशनल स्कूल कबड्डी प्रतियोगिता में गोल्ड मेडल जीता। 2010 में 56वें नेशनर स्कूल गेम्स रायपुर छत्तीसगढ़ में सिल्वर और 57वें अंडर उन्नीस नेशनल कबड्डी प्रतियोगिता लखनऊ में गोल्ड मेडल जीता।

गौरव का कहना है कि वो खुद तो फिलहाल मैदान से बाहर हो गया है, लेकिन अब वो अपनी बहन को राष्ट्रीय स्तर का खिलाड़ी बनाएगा और कबड्डी में देश की शान बढ़ाएगा। गौरव की मां अपने बेटे की इस हालत को देखकर खून के आंसू रो रही है, लेकिन कुछ कर पाने में असमर्थ है।

हालातों ने बना दिया मजबूतः
हालातों ने गौरव को मजबूत बना दिया। हालांकि गौरव दृढ़ आवाज में कहते हैं कि अब बहन पूजा को आगे बढ़ाना है। जवाहर नवोदय विद्यालय सरधना में पढ़ रही पूजा ने पिछले दिनों जूनियर कबड्डी में गोल्ड मेडल जीता था। गौरव को पढ़ाई छूटने का खासा मलाल है। गौरव कहते हैं कि हालातों ने करवट बदली तो वो आगे पढ़ाई जरूर करेगा। बहरहाल एक अदद मददगार की तलाश उसकी आंखे जरूर कर रही हैं।

गौरव की आस अब यूपी सरकार सेः
गौरव की आस अब यूपी सरकार की तरफ है कि शायद सरकार की नजर उस पर पड़े और वो एक बार फिर सब्जी के ठेले के साथ नहीं बल्कि कबड्डी के मैदान में अपना जलवा दिखा सके।

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