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देखिए लोग इसलिए छोड़ रहे चरखे से धागा बनाने का काम

चरखे से

चरखे से धागा बनाती महिला

चरखे की बात की जाए तो आजादी में भी चरखी का काफी महत्व है. राष्ट्रपिता महात्मा गांधी को भी चरखा काफी प्रिय था. लेकिन अब चरखे के माध्यम से धागा बनाने वाले लोगों का आर्थिक चुनौती की वजह से मोह भंग हो रहा है.

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    मेरठः-केंद्र सरकार और प्रदेश सरकार द्वारा भले ही खादी को बढ़ावा देने के लिए अनेकों योजनाएं चलाई जा रही हो. लेकिन अब राष्ट्रपिता महात्मा गांधी की प्रिय खादी उद्योग से जुड़े लोग अब दूर होने लगे है. जी हां उत्तर प्रदेश के क्षेत्रीय गांधी आश्रम मेरठ से संबंधित खरखौदा ब्लॉक में बड़े स्तर पर खादी ग्राम उद्योग कार्यक्रम के तहत महिलाएं, पुरुष चरखे के माध्यम से धागा बनाते थे. यह संख्या 8 से 10 गांव में थी. लेकिन जिस तेजी से महंगाई बढ़ती जा रही है. उसको देखते हुए अब लोग चरखे आधारित काम से दूर होते जा रहे हैं. इस काम से जुड़े कारीगरों की माने तो सुबह से शाम तक सिर्फ चरखे से सूत को कातने हुए सिर्फ एक किलो धागा ही बन पाता है. जिसका मात्र 50 रूपए मिलता है. ऐसे में घर का खर्चा चला पाना संभव नहीं. इसलिए अब इस काम को छोड़ रहे है.
    पहले 10 गांव में होता था काम अब सिर्फ 2 गांवों में सिमटा
    चरखे के माध्यम से धागा बनाने का कार्य खरखौदा ब्लॉक के 10 गांव में पहले किया जाता था. लेकिन धीरे-धीरे सिमटकर अब यह दो गांव में ही रह गया है. उन गांव में भी सिर्फ वह महिलाएं ही कार्य कर रही हैं. जिनकी आधे से ज्यादा जिंदगी इसी कार्य में बीत चुकी है. वही युवा पीढ़ी इस काम में आना नहीं चाहती. ऐसे में आने वाले सालों में उस गांव से चरखे से धागा बनाने का कार्य समाप्त होने की कगार पर है.

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