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लाचार पिता का दर्द, 'फैसला पहले आ जाता तो उसके बच्चे तड़प-तड़पकर नहीं मरते'

Mirzapur: पिता ने 2009 में बच्चों की इच्छामृत्यु की लगाई थी गुहार
Mirzapur: पिता ने 2009 में बच्चों की इच्छामृत्यु की लगाई थी गुहार

लाइलाज बीमारी मस्कुलर डिस्ट्राफी से पीड़ित बच्चों का शरीर अविकसित बच्चों की तरह होता है और ऐसे बच्चे चलने-फिरने और उठने में पूरी तरह असक्षम हैं. इस बीमारी में 26 साल की उम्र में पीड़ित की मौत हो जाती है

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मिर्ज़ापुर जिले के एक लाचार पिता ने शुक्रवार को इच्छामृत्यु के पक्ष में आए सुप्रीम कोर्ट के ऐतिहासिक फैसले का स्वागत करते हुए कहा है कि अगर फैसला और जल्द आ जाता तो लाइलाज बीमारी से लाचार उनके 3 बच्चों की मौत तड़प-तड़प कर नहीं होती. मालूम हो, पिता जीत नारायण ने 9 वर्ष पहले ही बच्चों की इच्छामृत्यु की दरख्वास्त राष्ट्रपति से की थी.

लालगंज ब्लाक के बसहीकला गांव के निवासी जीत नारायण और उसका परिवार लाइलाज मस्कुलर डिस्ट्राफी नामक बीमारी से लाचार अपने तीन बच्चों को अपनी आंखों के सामने धीरे-धीरे मौत के करीब जाते देख चुका है.

जीत नारायण ने बताया कि काफी इलाज के बाद थक-हारकर अब तक चारों बच्चों क्रमशः दुर्गेश, सर्वेश, बृजेश,सुशील की इच्छामृत्यु के लिए वर्ष 2009 में उन्होंने राष्टपति को पत्र लिख कर इच्छामृत्यु की गुहार की थी, लेकिन तब उनकी गुहार नहीं सुनी गई.



पिता के मुताबिक लाइलाज बीमारी से पीड़ित उनके चारों बच्चों की तबियत दिन प्रतिदिन खराब होती गई और वर्ष 2013 में 26 वर्षीय सर्वेश की मौत हो गई और उसके दो वर्ष बाद वर्ष 2015 में 22 वर्षीय दुर्गेश और 13 वर्षीय सुशील की भी मौत हो गई जबकि चौथे बच्चे 23 वर्षीय बृजेश अभी जिंदगी और मौत की लड़ाई लड़ रही है.
गौरतलब है लाइलाज बीमारी मस्कुलर डिस्ट्राफी से पीड़ित बच्चों का शरीर अविकसित बच्चों की तरह होता है और ऐसे बच्चे चलने-फिरने और उठने में पूरी तरह असक्षम हैं. इस बीमारी में 26 साल की उम्र में पीड़ित की मौत हो जाती है.

इच्छामृत्यु पर सुप्रीम कोर्ट के फैसले पर खुशी जताते हुए जीत नारायण कहा कि फैसला अगर पहले आता तो उनके तीनों बच्चे तड़प-तड़प कर नहीं मरते. उन्होंने कहा जब उन्होंने बच्चों की इच्छामृत्यु के लिए राष्टपति को पत्र लिखा था तो सिर्फ आश्वासन ही मिला. हालांकि सुप्रीम कोर्ट में इच्छामृत्यु के पक्ष में दायर याचिका में जीत नारायण के बच्चों के दर्द का उल्लेख किया गया था.
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