मिर्जापुर: भ्रष्टाचार की भेंट चढ़ा स्टेडियम, 10 साल और दोगुनी लागत के बाद बना आवारा पशुओं का चारागाह 
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मिर्जापुर: भ्रष्टाचार की भेंट चढ़ा स्टेडियम, 10 साल और दोगुनी लागत के बाद बना आवारा पशुओं का चारागाह 
भ्रष्टाचार की भेंट चढ़ा स्पोर्ट्स स्टेडियम

10 साल बाद भी दोगुना खर्च करने के बावजूद स्टेडियम का निर्माण पूरा नहीं हो पाया. अधिकारियों व कर्मचारियों की मिलीभगत से पैसे का बंदर बांट कर लिया गया.

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मिर्जापुर. खिलाड़ियों की खेल प्रतिभा को अंतरराष्ट्रीय स्तर पर पहचान दिलाने के लिए 2010 के बसपा शासन काल में एक स्पोर्ट्स स्टेडियम (Sports Stadium) के निर्माण की शुरुआत हुई. इस स्टेडियम के निर्माण के साथ-साथ भ्रष्टाचार (Corruption) की भी शुरुआत हुई. आलम यह है कि दो करोड़ खर्च होने और 10 साल बीतने के बाद भी स्टेडियम का निर्माण अधूरा ही रह गया. आज यह स्टेडियम आवारा पशुओं का चरागाह बना हुआ है.

बसपा शासन काल में शुरू हुआ निर्माण

दरअसल, नक्सल प्रभावित क्षेत्र मिर्ज़ापुर के जसौहर पहाड़ी में बच्चों के भविष्य और उनकी खेल प्रतिभा को निखारने के लिए 2010 में एक स्पोर्ट्स स्टेडियम का निर्माण शुरू हुआ. दो करोड़ बारह लाख की लागत से बनने वाले इस स्टेडियम के निर्माण का जिम्मा खेल निदेशालय ने पैक्सफेड नामक कार्यदाई संस्था को सौंप दिया. साथ ही निर्देश दिया गया कि वर्ष 2013 में स्टेडियम का निर्माण पूरा कर लिया जाए. लेकिन शुरू से ही कार्यदायी संस्था ने निर्माण में धांधली शुरू कर दी. काम समय से पूरा न होने के कारण स्टेडियम  निर्माण का लागत बढ़ गया. बाद में कार्यदायी संस्था ने निर्माण लागत के अलावा 1.97 करोड़ रुपये और आहरण करा कर स्टेडियम निर्माण के नाम पर धन खर्च कर दिया. यानी दोगुना खर्च करने के बावजूद स्टेडियम का निर्माण पूरा नहीं हो पाया. अधिकारियों व कर्मचारियों की मिलीभगत से पैसे का बंदर बांट कर लिया गया.



योगी सरकार ने बैठाई जांच
आरटीआई कार्यकर्ता इरशाद अली  ने सन 2012 में आरटीआई के माध्यम से स्टेडियम निर्माण में चल रहे धांधली का खुलासा करते हुए तत्कालीन  मुख्यमंत्री से शिकायत की थी. लेकिन तत्कालीन सरकारों ने इस घोटालेबाजों पर कोई कार्यवाई नहीं की. योगी सरकार बनने के बाद फिर से आरटीआई कार्यकर्त्ता ने शासन को पत्र लिखा जिसके बाद मुख्यमंत्री के आदेश पर टीएसी जांच का आदेश दिया गया. जांच में पता चला कि स्टेडियम निर्माण में व्यापक रूप से धांधली की गई है. 16,732,248 रूपये का घोटाला सामने आया. जिसके बाद दोषी पाए गए अवर अभियंता, सहायक अभियंता एवं अधिशासी अभियंता को सीधे तौर पर दोषी मानते हुए इन अधिकारियों के खिलाफ क़ानूनी कार्यवाई करते हुए  धनराशि की वसूली का आदेश दिया गया था. साथ ही कार्यदायी संस्था पैकफेड को जो धनराशि दी गयी है उसी से  निर्माण कार्य जल्द पूरा करने के निर्देश दिए गए. साथ ही उच्च स्तर के अधिकारियों पर भी पर्यवेक्षण व नियंत्रण न करने का दोषी पाया गया. अब तक दो करोड़ से अधिक रुपये खर्च होने के बाद भी स्टेडियम का सपना पूरा तो नहीं हो सका, लेकिन भ्रष्ट अधिकारियों ने इस स्टेडियम को आवारा पशुओं का चारागाह बना दिया.
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