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6.5 करोड़ का सोना पहन, 300 लोगों के काफिले के साथ मुजफ्फरनगर पहुंचे गोल्डन बाबा

6.5 करोड़ का सोना पहन, 300 लोगों के काफिले के साथ मुजफ्फरनगर पहुंचे गोल्डन बाबा

2016 में उन्होंने 12 किलो सोना पहना था तो 2017 में 14.5 किलो सोना पहना था. इस बार बाबा हरिद्वार से 20 किलो सोने के आभूषण पहनकर यात्रा पर निकले थे, जिनकी कीमत तकरीबन साढ़े छह करोड़ रुपए के आसपास बताई जा रही है.

    देश के सबसे बड़े कांवड़ मेले में दिखावे के लिए या फिर अपनी इच्छा से शिव भक्त खर्च तो बहुत करते हैं लेकिन 6.5 करोड़ की कीमत का सोना पहनकर कांवड़ लाने वाले शिव भक्त सिर्फ और सिर्फ एक ही हैं जिनका नाम है गोल्डन बाबा. दिल्ली से लेकर हरिद्वार तक की जनता उन्हें गोल्डन बाबा के नाम से जानती है.

    गोल्डन बाबा की यह सिल्वर जुबली कांवड़ है यानी की यह उनकी 25वीं कांवड़ है. इनकी खासियत यह है कि जब भी ये कांवड़ लाते हैं तो हमेशा करोड़ों की कीमत का सोना पहनकर लाते हैं. हर अगली कांवड़ यात्रा में ये पहले से अधिक वजन का सोना पहनकर आते हैं.

    2016 में उन्होंने 12 किलो सोना पहना था तो 2017 में 14.5 किलो सोना पहना था. इस बार बाबा हरिद्वार से 20 किलो सोने के आभूषण पहनकर यात्रा पर निकले थे, जिनकी कीमत तकरीबन साढ़े छह करोड़ रुपए के आसपास बताई जा रही है. उन्होंने इसके साथ ही इस बार 27 लाख रुपए की रोलेक्स की लग्जरी घड़ी भी पहनी है.

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    दरअसल ये गोल्डन बाबा हरिद्वार की हर की पौड़ी से जल भरकर गुरुवार की देर रात अपने 300 आदमियों के क़ाफ़िले के साथ मुज़फ्फरनगर पहुंचे, जहा इन्हें देखने वालो का तांता लग गया. ये गोल्डन बाबा हरिद्वार से जल भरकर दिल्ली के अशोक मार्किट जो कि कपड़ा मार्केट के नाम से मशहूर है, वहां पर भगवान शंकर को जल चढ़ाकर अपनी यात्रा पूरी करते हैं.

    हर साल प्रॉपर्टी बेचने से कमाए पैसों से करते हैं कांवड़ यात्रा
    गोल्डन बाबा का कहना है कि सोना उनके लिए मात्र आभूषण नहीं है बल्कि शिव शंकर का बहुमूल्य आशीर्वाद है और वे 1972, 73 से सोना पहनते हुए आ रहे हैं और सबसे पहले उन्होंने शिव का एक सोने का लॉकेट पहना था, जिसके बाद आज उनके पास इतना सोना है और सोना उनका इष्ट देवता है. बाबा की मानें तो वह गारमेंट और प्रॉपर्टी का कारोबार करते थे लेकिन सात साल पहले बाबा बनने के बाद उन्होंने वह बिजनेस भी बंद कर दिया और अब जो धन उनके पास है उससे वह हर साल प्रॉपर्टी खरीदते है और कांवड़ यात्रा से पहले उसे बेचकर जो मुनाफा वह कमाते हैं उससे अपनी कांवड़ यात्रा पूरी करते हैं.

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