ब्रजभाषा में पढ़ें: अन्‍य भाषान ते चौं पिछड़ गई ब्रजभाषा
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ब्रजभाषा में पढ़ें: अन्‍य भाषान ते चौं पिछड़ गई ब्रजभाषा
अन्‍य भाषाओं से पिछड़ गई ब्रजभाषा जबकि साहित्‍य में इसका बड़ा योगदान है.

ब्रजभाषा गद्य कौ प्रयोग संवत 1400 के आसपास स्वीकार करौ गयौ और जाइ के प्रभाव ते बृज की जा बोली नै भाषा नाम प्राप्त करौ. तब ते ब्रजभाषा के नाम ते जानी जायिबे लगी. ब्रजभाषा के कवि सूरदास, रहीम, रसखान, केशव, धनानंद, बिहारी, आदि भये.

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  • Last Updated: September 13, 2020, 3:52 PM IST
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नई दिल्‍ली. ब्रजभाषा मूल रूप ते क्षेत्रीय भाषा है. ब्रजभाषा की उत्पत्ति शौरसेन भाषा ते भयी है. ब्रजभाषा के बारे में कहावत है कै जे भौतई प्यार की भाषा है. ब्ररजभाषा बोलते समय भैया ,बहना, लल्ली लल्ला ऐसे शब्दन कौ प्रयोग करौ जावै है. इन शब्दन में भौतई अपनौपन महसूस होवै है. जा भाषा के बोलिवै बारे लगभग 2 करोड़ लोग 38000 वर्गमील क्षेत्र में बसे भये हैं.

ब्रजभाषा की शुरुआत के बारे में कछु साहित्यकारन कौ विचार है के जाकी शुरुआत 10वींं सदी मेंई है गई और 13 वींं शताब्दी ते लेकै 20 वी शताब्दी तक जे भारत की साहित्यिक भाषा रही. गोकुल में बल्लभ सम्प्रदाय कौ केंद्र बनिवे के बाद ब्रजभाषा में कृष्ण साहित्य लिखौ जायिबे लगौ और जि भाषा भारत की भक्ति काल की भाषा कहि जाइवै लगी. ब्रजभाषा गद्य कौ प्रयोग संवत 1400 के आसपास स्वीकार करियो गयौ और जाइ के प्रभाव ते बृज की जा बोली नै भाषा नाम प्राप्त करियौ. तब ते ब्रजभाषा के नाम ते जानी जाबै है. ब्रजभाषा के कवि सूरदास, रहीम, रसखान, केशव, धनानंद, बिहारी, आदि भये.

ब्रजभाषा चार प्रदेश उत्तर प्रदेश के मथुरा, आगरा, अलीगढ़, हाथरस, बुलंदशहर, बंदायू, कासगंज, एटा, फिरोजाबाद, मैनपुरी, इटावा के कछु हिस्सा में, और मध्य प्रदेश के भिंड, ग्वालियर के आसपास के क्षेत्र, और राजस्थान के भरतपुर, धौलपुर, हिंडौन , करौली, अलवर जिले के कछु क्षेत्र, और हरियाणा के होडल, पलवल, और मेवात के कछु क्षेत्र न में बोली जावै है. ब्रजभाषा बंगाल के एक हिस्सा में उ बोली जावै जाकूँ ब्रजबुलि के नाम ते जानैं और अफगानिस्तान के पास ताज्जुबेकिस्तान में ताज्जुबेकी ब्रजभाषा के नाम ते बोली जावै है.



चौं पिछड़‍ि गई ब्रजभाषा 
भारत के भक्ति काल की भाषा कूँ यदि आज की परिस्थिति में देखौ जावै तौ जि बृजभाषा अन्य भाषान ते पिछडि गयी है. आज भोजपुरी, मैथ‍िली, हरियाणवी, गुजराती, राजस्थानी जैसी अन्य भाषा आगे जाय रही हैं. ब्रजभाषा के अन्य भाषान ते पिछड़वे के कईं कारण बने हैं. पहलौ कारण तौ जे है के बृजभाषी क्षेत्र एक प्रदेश में न है कै चार प्रदेश उत्तर प्रदेश, राजस्थान, मध्यप्रदेश और हरियाणा मैं फैल रह्यो है. जाकी बजह ते बृजभाषा के विकास के काजै कोई ठोस व्यवस्था नाय है सकी है. बृजभाषी क्षेत्र उत्तर प्रदेश में 80 प्रतिशत के आसपास है और बाकी 3 प्रदेशन में 20 प्रतिशत कौ ही हिस्सा है. पर उत्तर प्रदेश में अबई तक बृजभाषा साहित्य अकादमी की स्थापना नाय है पाई है.

राजस्थान में बृज क्षेत्र कम हैवे के बावजूद राजस्थान बृजभाषा अकादमी कौ गठन 19 जनवरी 1986 कूँ ई है चुक्‍यौ है. पर भौत ज्यादा काम न हैवे की वजह ते बृजभाषा कूँ कोई विशेष लाभ नाय भयौ. जब कै दूसरी भाषा हरियाणा साहित्य अकादमी कौ गठन 9 जनवरी 1970, भोजपुरी अकादमी बिहार कौ गठन सन 1777 में  हैवे के संग संग दिल्ली, मध्यप्रदेश, उत्तर प्रदेश मेंउ है चुक्‍यौ है.

राजस्थान साहित्य अकादमी को गठन 1958, गुजराती साहित्य अकादमी कौ गठन 1981 में ई है गयौ है. इन भाषा न के संग उत्तर प्रदेश उर्दू अकादमी कौ गठन सन 1972 में और सिंधी भाषा के काजै मध्य प्रदेश सिंधी साहित्य अकादमी कौ गठन 1984, राजस्थान सिंधी भाषा अकादमी 1978 में है चुक्‍यौ है.

लुप्‍त है रही हैं जे ब्रज की धरोहर 

अगर ब्रजभाषा साहित्य अकादमी उत्तर प्रदेश कौ गठन है गयौ होतौ तौ आज ब्रज में रसिया, ढोला, मल्हार, समाज गायन, हवेली संगीत, चरकुला नृत्य, सांझी कला जैसी ब्रज संस्कृति की धरोहर जो धीरे धीरे लुप्त है रही हैं उन कूं नयौ जीवन मिल जातौ. जई कारण ते संगीत नाटक अकादमी, ललित कला अकादमी, भारतेंदु नाट्य कला केंद्र आदि में ब्रज कूँ प्रतिनिधित्व न हैवे के कारण ब्रज की कला और कलाकार दोनों न कूँ सम्मान नाय मिल पाय रह्यो है.

ब्रजभाषा कूँ पिछड़वे कौ दूसरौ कारण ब्रजभाषी क्षेत्र में कोई ऐसौ बड़ौ संगठन नाय बन पायौ जो सम्पूर्ण ब्रजभाषीन कूँ एक सूत्र में पिरोय सकै. जैसे गुजराती समाज नें गुजरातीन कूँ अपनी बात रखिवै ताईं एक मजबूत मंच प्रदान करियौ है. पर अब भौतई देर के बाद 10 अप्रैल 2019 कूँ ब्रजभाषी समाज न्यास को गठन है गयौ है. जो समस्त ब्रजभाषी न कूँ एक सूत्र में पिरोयवे के काजै प्रयास करि रह्यो है.

ब्रजभाषा कूँ पिछड़वे कौ एक कारण ब्रजभाषी क्षेत्र के निवासी, सामाजिक कार्यकर्ता और राजनैतिक नेता न कूँ अपनी मातृ भाषा के प्रति लगाव में कमी और हीनभावना कौ हैवो ऊ शामिल है. हमनें देखौ है कै जब कबहुँ कोई स्थानीय नेता और सामाजिक कार्यकर्तान कूँ मंच पै बोलिवै कौ मौको मिलौ होयगौ तौ अपनी ब्रजभाषा कौ कबहुँ प्रयोग नाय करें. जब कै हरियाणवी, राजस्थानी, गुजराती, बुन्देलखंडी, भोजपुरी, मैथली, आदि क्षेत्रन के निवासी और नेता अपनी बोली भाषा कौ उपयोग तौ करें ही और बोलिवै में अपनी शान भी समझैं.
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