खेती छोड़ 'क्रिकेट की फसल' उगा रहे हैं किसान, धरती उगल रही 'सोना'

दिल्ली एनसीआर में मैदानों की भारी कमी है, लेकिन अब दिल्ली नोएडा के बाहरी इलाकों में बसे किसानों ने मैदानों की कमी की भरपाई शुरू कर दी है.

News18Hindi
Updated: January 21, 2019, 7:31 AM IST
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Updated: January 21, 2019, 7:31 AM IST
एक साल पहले नए इरादे और नई सोच के साथ शुरू किया गया था खेलो इंडिया कार्यक्रम. लेकिन इंडिया खेलेगा कैसे. दिल्ली एनसीआर में जहां तक नज़र जाती है धरती पर पसरी इमारतें हैं. इमारतों पर चलती क्रेन हैं. कुछ बन चुकी तो अनगिनत बन रही हैं. मीलोंमील तक फैले हैं तो बस शहर के निशान. ऐसे में इंडिया खेले तो कहां खेले. एक देश जिसकी रगों में क्रिकेट धर्म बनकर बहता है. एक समाज जिसके लिए क्रिकेट एक ऐसा खेल है जो गली कूचों में खेला जाता है, जिसके नियम गली कूचों के हिसाब से तय होते हैं. लेकिन जब इसे कायदे से खेलने की ज़रूरत हो तब मैदान चाहिए होता है.

दिल्ली एनसीआर में मैदानों की भारी कमी है, लेकिन अब दिल्ली नोएडा के बाहरी इलाकों में बसे किसानों ने मैदानों की कमी की भरपाई शुरू कर दी है. कहते हैं ना कि जहां चाह वहां राह. आसमान चूमती इन इमारतों के बीच एक धरती ऐसी भी है जिस पर इमारतें नहीं उगतीं, खिलते हैं खेलने वालों के चेहरे और उन किसानों को भी अब रोज़ी रोटी के लिए पसीना नहीं बहाना पड़ता है जो कुदरत के आसरे खेती का जुआ खेलते रहे हैं. जिनके हाथ मेहनत के बाद भी खाली रह जाते हैं.

घाटे की खेती को देखते हुए एनसीआर के किसान अब क्रिकेट की खेती करने लगे हैं. खेतों में फसल की जगह क्रिकेटरों की नई पौध उगाई जा रही है. खेती में कम होते मुनाफे की वजह से किसान अपने खेतों को क्रिकेट ग्राउंड में बदल रहे हैं. जिससे उन्हें लाखों की आमदनी हो रही है. इसलिए किसानों ने खेत लीज पर देकर क्रिकेट ग्राउंड बनवा दिए हैं. किसानों ने ग्राउंड बनाकर कोच रख लिए हैं.



दिल्ली नोएडा के बाहरी इलाक़ों में खेतों को क्रिकेट ग्राउंड में बदलने का सिलसिला तेजी पकड़ता जा रहा है. किसानों को अब खेती घाटे का सौदा लगने लगी है. वजह है कि लाखों रुपये जुताई, निराई, गुड़ाई और बुआई में लगाने की बाद भी अच्छी फसल होने की गारंटी नहीं होती, लेकिन दिल्ली एनसीआर के बाहर खाली खेत अब आमदनी की गारंटी बनने लगे हैं.

किसान कहते हैं कि खेती में लागत के हिसाब से आमदनी नहीं हो रही है. यही वजह है कि किसान आमदनी का नया रास्ता अपना रहे हैं.
नोएडा के बाहरी इलाके में रहने वाले राजेश बताते हैं कि किसी समय पर यहां गेहूं औऱ धान की खेती करते थे बाद में सब्जियां उगाने लगे लेकिन इस खेती से मजदूरों का खर्चा भी निकालना मुश्किल होता था.

आज राजेश का खेत एक ग्राउंड का आकार ले चुका है. यहां खेती नहीं होती बल्कि खिलाड़ियों को ये मैदान किराये पर दिया जाता है. पिछले एक साल में सिर्फ़ नोएडा में खेती की ज़मीन पर एक दर्जन से ज़्यादा क्रिकेट ग्राउंड तैयार हुए हैं. किसानों को खेती से ज़्यादा ग्राउंड बनाने में मुनाफ़ा हो रहा है. 16 से 20 बीघा जमीन पर एक क्रिकेट ग्राउंड तैयार हो जाता है. जिससे सालाना 25 से 30 लाख रुपये तक की आमदनी हो जाती है. जबकि 16 से 20 बीघा ज़मीन में फसल उगाने से 10 से 15 लाख की आमदनी होती है. इसमें मेहनत और एक बार की लागत से फ़ायदा ज़्यादा हो रहा है

किसान जतिन कुमार बताते हैं कि रेतीली ज़मीन पर खेती मुश्किल थी. आमदनी नहीं हो पाती थी उसमें. लेबर का खर्च निकालना मुश्किल हो जाता था.

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खेती की जमीन पर क्रिकेट ग्राउंड बनाकर दो तरीके से किसानों की आमदनी हो रही है. पहला किसी क्रिकेट एकेडमी को अपनी खेती की जमीन लीज पर दे देते हैं जिसके बदले उन्हें लगभग 3 से 4 लाख रुपए महीना मिल जाते हैं. जबकि दूसरा तरीका है खुद ग्राउंड तैयार करके हर दिन के हिसाब से किराये पर देना. सोमवार से शुक्रवार तक एक मैच के ढाई हजार रुपये वसूले जाते हैं लेकिन शनिवार और रविवार को ज़्यादा ग्राउंड की डिमांड होने पर दस हजार तक मिल जाते हैं.

एक अन्‍य किसान ने बताया कि बहुत टीम आती हैं. उनको ग्राउंड नहीं मिलते हमने ग्राउंड बनवाया है. हम लीज़ पर लेते हैं. सालाना देते हैं. मालिकों को 4-5 लाख रुपये सालाना देते हैं. एक मैच की फीस 2-2.5 हजार होती है. शनिवार और रविवार को तीन से साढ़े तीन हजार रुपये चार्ज करते हैं.

इन ग्राउंड्स का इस्तेमाल तीन तरीके से होता है. पहला आसपास के गांव के लोग ग्राउंड किराये पर लेते हैं. उनसे 3 हजार तक प्रति मैच लिया जाता है. सोसाइटी में रहने वाले लोग ग्राउंड किराए पर लेते हैं तो उन्हें T20 मैच के लिए 4 हजार रुपए देने पड़ते हैं. लेकिन कॉरपोरेट लीग होनी होती है तो ग्राउंड की कीमत बढ़कर 10 से 15 हज़ार रुपये प्रति मैच तक पहुंच जाती है.


ग्रेटर नोएडा में एक कंपनी के कर्मचारियों ने नोएडा के क्रिकेट ग्राउंड को प्रैक्टिस के लिए किराए पर लिया है. इनका कहना है कि आसपास कोई ग्राउंड न होने के चलते उन्हें नोएडा के ग्राउंड की तरफ रुख करना पड़ा. ग्राउंड्स की कमी है और जो हैं वो काफी महंगे हैं लेकिन किसानों ने जो रास्ता अपनाया है उससे खेलने की जगह कम रेट में मिल रहा है.

क्रिकेटर निखिल ने बताया कि वह होंडा की सब्सिडियरी में काम करते हैं. लीग है तो यहां प्रैक्टिस करने आते हैं. ग्राउंड्स की कमी है. इसीलिए ग्रेटर नोएडा से यहां आ रहे हैं. उस साइड में उतने ग्राउंड्स नहीं हैं. किसानों का अच्छा इनिशिएटिव है. वो प्रमोट कर रहे हैं क्रिकेट को. इससे उनको आमदनी हो रही है. बोथ साइड विन-विन सिचुएशन है.

एक अन्‍य खिलाड़ी संदीप ने बताया, 'गवर्नमेंट के स्टेडियम कम पड़ रहे हैं. खेलो इंडिया प्रोग्राम शुरू हुआ है. बहुत जल्दी रिजल्ट चाहिएं तो किसानों का ये इनिशिएटिव अच्छा है. किसानों की इससे आमदनी बढ़ेगी लोगों को सुविधा मिलेगा. तीसरी चीज सौंदर्यीकरण होगा.'

नोएडा के बाहरी इलाकों में बने इन मैदानों में बच्चे और उनके माता पिता भी नज़र आते हैं. मीलों का सफर करके ये बच्चे अपने माता पिता के साथ इन मैदानों तक पहुंचते हैं और अपना हुनर निखारते हैं.
लगभग हर क्रिकेट ग्राउंड पर क्रिकेट एकेडमी भी चलती है जिसके जरिए भी आमदनी होती है. हर खिलाड़ी से 2 से 3 तीन हजार रुपए फीस के तौर पर लिए जा रहे हैं.
क्रिकेट के बढ़ते क्रेज को देखते हुए इन मैदान में पैरंट्स भी बच्चों की हौसला अफजाई करते नजर आते हैं.

क्रिकेट के जरिए न सिर्फ किसानों की आमदनी हो रही है बल्कि आसपास के गांवों के लोगों को भी रोजगार मिल रहा है. पास ही के गांव में रहने वाले रामनाथ पहले चने बेचने के लिए मीलों दूर भीड़ भाड़ वाली जगहों पर जाते थे. लेकिन क्रिकेट स्टेडियम बनने के बाद से इनको घर के पास ही ठीकठाक रोज़गार मिलने लगा है. उन्‍होंने बताया, 'हम तीनों ग्राउंड में चना बेचने आते हैं. बच्चे खरीदते हैं. संग आते हैं वो भी खाते हैं.'

इन ग्राउंड्स की बुकिंग की डिमांड बढ़ती जा रही है. इस तरह के क्रिकेट ग्राउंड का प्रचलन नोएडा और गुरुग्राम में तेजी से बढ़ रहा है. कुछ ग्राउंड्स में डे-नाइट मैच की तैयारी भी चल रही है. जिसके लिए निर्माण का काम जारी है. बढ़ते शहरीकरण के बीच सिटी प्लानर्स ने घर तो बनाए लेकिन घरों के अनुपात में उतने मैदान नहीं बना पाए कि बढ़ती हुई आबादी के लिए पर्याप्त हों.

अब नोएडा के किसान इस समस्या को अवसर में बदल रहे हैं. इससे इनका भी फायदा हो रहा है और मैदान की कमी के चलते ना निखर पाने वाले हुनरबाज़ों को भी अपने आपको निखारने का मौका मिल रहा है.

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