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नोएडा: इतनी कम उम्र में प्रिंस और रोशनी शिक्षा की जला रहें अलख

नोएडा: इतनी कम उम्र में प्रिंस और रोशनी शिक्षा की जला रहें अलख

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नोएडा: इतनी कम उम्र में प्रिंस और रोशनी शिक्षा की जला रहें अलख

अब लगभग 500 सौ बच्चे नियमित रूप से पढ़ने आते है, उन्हे हम मुफ्त में किताबे, नाश्ता और शिक्षा देते है. प्रिंस कहते है कि धीरे-धीरे हमारा ग्रुप बड़ा होता गया और आज हमारे साथ कई साथी है, जैसे रौशनी,शैलेंद्र, कोमल, शुभम और सूरज साथ देते है.

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    नोएडा: किसी ने क्या खूब लिखा है, सिर्फ सांसे चलते रहने को ही ज़िन्दगी नही कहते, आंखों में कुछ ख़्वाब और दिल में उम्मीदे होना जरूरी है. महानगरीय जीवन जहां लोगों को खुद के लिए समय नहीं मिल पाता, वहां कुछ समय निकाल कर समाज के लिए कुछ करना वाकई प्रेरणा देता है. उत्तर प्रदेश के जिला गौतमबुद्ध नगर के नोएडा में रहने वाले 24 वर्षीय प्रिंस उन्हीं लोगों में से एक है.

    प्रिंस पिछले सात सालों से गरीब और असहाय बच्चों को पढ़ाने लिखाने के लिए कोशिश कर रहे हैं. उनके द्वारा पढ़ाएं स्लम्स के बच्चों ने दसवीं और बारहवीं तक की पढ़ाई पूरी की है.प्रिंस शर्मा बताते है कि जीवन में खुद के लिए तो सब करते है, लेकिन दूसरों के लिए कुछ करना, समाज में आपको एक अलग पहचान दिलाता है. साल 2014 में मैने अपने साथियों के साथ मिलकर झुग्गियों में रहने वाले बच्चों को पढ़ाना शुरू किया और आज सात साल हो गए.इनके द्वारा मेरे पढ़ाए गए कई बच्चे दसवी और बारहवीं की पढ़ाई पूरी कर चुके है.

    चैलेंज उठाना पड़ा तो ग्रुप का नाम ही चैलेंजर्स की पाठशाला रख दिया
    प्रिंस शर्मा बताते हैं कि 2014 में जब मैने बच्चों को पढ़ाना शुरू किया था, तो हमे कई मुसीबतों को झेलना पड़ा, पढ़ाने के लिए कोई तय जगह नहीं होने के कारण हम लोग सड़क किनारे, फुटपाथ पर सुबह के समय बच्चों को पढ़ाने लगते थे. लोगों ने हमे पागल कहना शुरू कर दिया था, वही लोग आज हमारे साथ झुग्गियों में जाते है और बच्चों को पढ़ाते हैं. उस वक्त जो हमने परेशानी झेली उसको ध्यान में रखते हुए हमने अपनी पाठशाला का नाम चैलेंजर्स ग्रुप रख दिया. प्रिंस बताते है कि शुरुआत में बच्चे ठीक से पढ़ने नहीं आते थे जो एक दिन आते वो दूसरे दिन नहीं आते इसलिए हमने नोएडा के प्रत्येक सेक्टर जैसे, सेक्टर 62,22, 102 सब जगह चैलेंजर्स पाठशाला खोला, पाठशाला बच्चों के घर के पास होने की वजह से आने जाने में आसानी होने लगी.

    अब लगभग 500 सौ बच्चे नियमित रूप से पढ़ने आते है, उन्हे हम मुफ्त में किताबे, नाश्ता और शिक्षा देते है. प्रिंस कहते है कि धीरे-धीरे हमारा ग्रुप बड़ा होता गया और आज हमारे साथ कई साथी है, जैसे रौशनी,शैलेंद्र, कोमल, शुभम और सूरज साथ देते है.

    खुद के लिए किताबे नहीं रहती थी तो सपना बना लिया गरीबी के वजह से कोई अनपढ़ नहीं रहेगा.
    चैलेंजर्स ग्रुप में प्रिंस के साथ रोशनी भी असहाय बच्चों को पढ़ाती है, रोशनी खुद बीएड कर रही है. मूलतः मेरठ की रहने वाली रोशनी के पापा अशोक सिक्योरिटी गार्ड हैं और माता गीता गृहणी है. साथ ही बताती है कि जब मैं छोटी थी तो मेरे पास पढ़ने को किताबे नहीं रहती थी, किताबों के पन्नो को धागे से जोड़ कर पढ़ने जाती थी, उसी वक्त मैंने ये सोच लिया था कि गरीबी के कारण कोई अनपढ़ नहीं रहेगा.

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