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Opinion : धर्म का सामाजिक मर्म तलाश लेने वाले महंत थे अखाड़ा परिषद के नरेंद्र गिरी

विदा महंत नरेंद्र गिरी.

विदा महंत नरेंद्र गिरी.

Hindu saint : अपनी धार्मिक मान्यताओं और सामाजिक विचारधारा में अडिग और स्पष्ट रहने वाले नरेंद्र गिरी हाल के दिनों में कुछ विवादों से घिरे जरूर रहे, पर इस विवाद को उनके व्यक्तित्व का प्रतिनिधि रूप नहीं माना जा सकता. उनके सामाजिक मूल्यों, आस्थाओं की पड़ताल उनकी टिप्पणियों के माध्यम से की जा सकती है.

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अखिल भारतीय अखाड़ा परिषद के अध्यक्ष महंत नरेंद्र गिरी की मौत संदिग्ध परिस्थितियों में हो गई है. प्रयागराज के बाघम्बरी गद्दी मठ में उनका शव फंदे से झूलता मिला है. अपनी धार्मिक मान्यताओं और सामाजिक विचारधारा में अडिग और स्पष्ट रहने वाले नरेंद्र गिरी हाल के दिनों में कुछ विवादों से घिरे जरूर रहे, पर इस विवाद को उनके व्यक्तित्व का प्रतिनिधि रूप नहीं माना जा सकता. प्रसंगवश हाल के विवाद की चर्चा करते हुए उनके सामाजिक मूल्यों, आस्थाओं की पड़ताल उनकी टिप्पणियों के माध्यम से की जा सकती है.

महंत नरेंद्र गिरी के शिष्य रहे हैं स्वामी आनंद गिरी. पिछले दिनों आनंद गिरी पर परिवार से संबंध रखने का आरोप लगा था. साथ ही मठ और मंदिर के धन के दुरुपयोग के मामले में उनपर मठ और मंदिर से निष्कासन की कार्रवाई हुई थी. इसके बाद आनंद गिरी ने अपने गुरु महंत नरेंद्र गिरी के खिलाफ कई बयान दिए थे. कई आरोप भी लगाए. इस मुद्दे पर अखाड़ा परिषद ने एक बैठक भी बुलाई थी. हालांकि बाद में अध्यक्ष महंत नरेंद्र गिरी और आंनद गिरी के बीच का विवाद खत्म होने की बात भी सामने आई.

लेकिन निधन से पहले की उनकी सामाजिक और राजनीतिक सक्रियता पर अगर गौर करें तो यह साफ तौर पर दिखेगा कि उनके व्यक्तित्व में धार्मिकता प्रमुख गुण की तरह थी, जबकि राजनीतिक और समाजिक मुद्दों पर भी वे उतने ही सजग रहे थे. इसी 17 सितंबर को उन्होंने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के जन्मदिन पर उन्हें शुभकामना प्रेषित की थी. पिछले दिनों अफगानिस्तान पर तालिबान के कब्जे के बाद वे स्पष्ट तौर पर तालिबान के खिलाफ दिखे थे. बल्कि उन्होंने उन तमाम लोगों को आतंकी की संज्ञा दी थी जो तालिबान के साथ खड़े दिख रहे थे.

भारत में रहनेवाले कुछ मुस्लिम धर्मगुरुओं की आस्था तालिबान के साथ खड़ी देखकर महंत नरेंद्र गिरी ने बहुत स्पष्ट रूप से इसका विरोध किया था. अखाड़ा परिषद अध्यक्ष महंत नरेंद्र गिरि ने भारतीय मुस्लिम महिलाओं से कहा था कि अफगानिस्तान में महिलाओं के साथ तालिबान जिस तरह का अन्याय और अत्याचार कर रहा है, उसे समझते हुए भारत में रहने वाली मुस्लिम महिलाओं को भी तालिबान का समर्थन करने वाले मुस्लिम धर्म गुरुओं का विरोध और बहिष्कार करना चाहिए.

महंत नरेद्र गिरी के कई बयानों में साफ दिखता रहा कि वे उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ से हिंदू प्रेम के मुद्दे पर अगाध स्नेह रखते हैं. इसके बावजूद जब कोरोना की तीसरी लहर की आशंका के बीच शुरू में सीएम योगी ने कांवड़ यात्रा को सहमति दे दी थी तो महंत नरेंद्र गिरी ने बेहद सौम्य लहजे में सरकार के इस फैसले के खिलाफ दिखे थे. उन्होंने कहा था कि सीएम योगी आदित्यनाथ ने परंपरा के निर्वहन को लेकर कांवड़ यात्रा की इजाजत दे दी है. लेकिन जिस तरह के खतरे की आशंका तीसरी लहर को लेकर जताई जा रही है. उसके मद्देनजर कांवड़ यात्रा निकालना कतई उचित नहीं होगा. उन्होंने शिवभक्तों से अपील की थी कि वे अपने नजदीक के शिवालयों में पूजा अर्चना और जलाभिषेक कर सकते हैं. चाहें तो अपने घरों में पार्थिव शिवलिंग स्थापित करें और जलाभिषेक करें. लेकिन भरसक कोशिश करें कि कांवड़ यात्रा पर न जाएं.

देश में बढ़ती हुई जनसंख्या को लेकर भी नरेंद्र गिरी ने गहरी चिंता भी जताई थी. उनका मानना था कि जनसंख्या बढ़ने का सीधा प्रभाव अच्छी शिक्षा और चिकित्सा व्यवस्था पर पड़ता है. यही वजह है कि तेजी से बढ़ रही जनसंख्या पर वे तत्काल रोक चाहते थे. उन्होंने मांग की थी कि जनसंख्या पर नियंत्रण के लिए सरकार ऐसा सख्त कानून बनाए, जिसे देश और प्रदेश में रहने वाले हर नागरिक को मानना ही हो. बल्कि उन्होंने जनसंख्या नियंत्रण कानून की सख्ती को लेकर सुझाव दिया था कि अगर दो बच्चे के बाद तीसरा बच्चा कोई पैदा करे तो उसे वोट देने का अधिकार न हो, न ही चुनाव लड़ने का अधिकार हो और उसका आधार कार्ड भी न बने और सरकार की तमाम योजनाओं से भी उसे वंचित कर दिया जाए. तभी इस कानून का सही मायने में सख्ती से पालन हो सकता है.

तो ऐसे मजबूत इरादों वाला महंत, इतनी स्पष्ट दृष्टि रखने वाला महंत अपने जीवन के आखिरी दिनों में क्या सचमुच किसी मानसिक तनाव से गुजर रहे थे? इस सवाल का जवाब तो आनेवाला वक्त देगा. लेकिन कांवड़ के मुद्दे पर या जनसंख्या नीति को लेकर या तालिबान जैसे सवालों पर जो निर्भीक और स्पष्ट आवाज हमें सुनाई पड़ती थी, अब नहीं आएगी. यह सही है कि उनके इस तरह चले जाने से धर्मसभाओं ने एक वैचारिक योद्धा खो दिया, जो तार्किक तरीके से धार्मिक-सामाजिक गतिविधियों को समझता और समझाता रहा था.

(डिस्क्लेमर: ये लेखक के निजी विचार हैं. लेख में दी गई किसी भी जानकारी की सत्यता/सटीकता के प्रति लेखक स्वयं जवाबदेह है. इसके लिए News18Hindi किसी भी तरह से उत्तरदायी नहीं है)

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