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चुनावी किस्से: जब बनारस लोकसभा चुनाव प्रचार के दौरान कांग्रेस प्रत्याशी की ‘बहूजी’ ने अपने विरोधी को दिया चुनावी चंदा

RajKumar Pandey | News18Hindi
Updated: May 9, 2019, 8:42 PM IST
चुनावी किस्से: जब बनारस लोकसभा चुनाव प्रचार के दौरान कांग्रेस प्रत्याशी की ‘बहूजी’ ने अपने विरोधी को दिया चुनावी चंदा
एक दूसरे की इज्जत उछालने की आज के चलन से उलट एक दूसरे के सम्मान की रही है परंपरा

एक दूसरे की इज्जत उछालने की आज के चलन से उलट एक दूसरे के सम्मान की रही है परंपरा

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प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के कारण आज बनारस देश के सबसे ज्यादा चर्चित सीट है. हालांकि शिवजी की ये नगरी हमेशा से राजनीतिक चर्चा का केंद्र रही. उस समय भी जब इंटरनेट नहीं थे और टेलीफोन भी किसी किसी के पास था. उस समय भी यहां की कहानियां कम से कम उत्तर भारत में लोगों की जुबान पर रहती थी.

कांग्रेस की सीट थी
1984 तक सिर्फ दो चुनाव 1967 और 77 को छोड़ कर यहां से कांग्रेस के ही सांसद हुआ करते थे. 67 में सीपीएम के सत्यनारायण सिंह और 77 में लोकदल के चंद्रशेखर सिंह यहां से सांसद हुए थे. ये वो वाले चंद्रशेखर नहीं थे, जो प्रधानमंत्री हुए थे. वे तो पहली बार 77 में ही बलिया से जीते थे.

1980 के चुनाव में यहां से दो दिग्गज मैदान में उतरे. कांग्रेस की ओर से कमलापति त्रिपाठी मैदान में उतरे तो उनके मुकाबले में उतरे राजनारायण. वही राजनारायण जिनके पास इंदिरा गांधी को हराने का तमगा था.

गढ़ था 'औरंगाबाद हाउस' 

पुराने लोग बताते हैं कि कमलापति त्रिपाठी न सिर्फ एक सम्मानित ब्राह्मण नेता थे, बल्कि आजादी के दौर में एक बड़े संपादक भी रह चुके थे. 1971 से 1973 तक वे उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री रह चुके त्रिपाठी की प्रदेश में बड़ी हैसियत थी. उनके घर औरंगाबाद हाउस को प्रदेश की राजनीति का केंद्र माना जाता था. राजनारायण से उनके संबंध बहुत अच्छे थे. ये भी कहा जाता है कि दोनों एक दूसरे का सम्मान इस तरह से करते थे कि दोनों आमने-सामने लड़ना नहीं चाहते थे.

हाल चाल पूछा और 'फंसे'80 के ही चुनाव में कमलापति त्रिपाठी अपनी बहू चंद्रा त्रिपाठी को साथ लेकर प्रचार के लिए जा रहे थे. अस्सी चौराहे के आसपास राजनारायण जी का मजमा लगा हुआ था. राजनारायण को देख कमलापति ने अपनी गाड़ी रुकवा दी. हाल-चाल लिया. जानकार याद करते हैं कि कमलापति ने पूछा – और राजनारायण जी प्रचार कैसा चल रहा है. इसके जवाब में राजनारायण ने कहा कि पैसे ही नहीं है. कुछ पैसा दिजीए तो प्रचार हो. ये सारा संवाद बनारसी बोली में ही हो रहा था.

दिया चुनावी चंदा

राजनारायण के स्वभाव से कमलापति परिचित थे. लिहाजा बहुत हुज्जत किए बगैर साथ बैठी अपनी बहू जी से कहा कि वे राजनारायण जी को कुछ रुपये दे दें. कमलापति की बहु को बनारस के लोग और उस समय की कांग्रेसी राजनीति से जुड़े प्रदेश भर के लोग बहू जी के ही नाम से जानते पहचानते रहे.

वरिष्ठ पत्रकार राजेश गुप्ता याद करते हैं –“खैर बहू जी ने अपने बटुए से निकाल कर कुछ सौ रुपये राजनारायण जी को दिया. उस चुनाव में भी राजनारायण जी बहुत खराब स्थिति में नहीं थे. उनके और कमलापति त्रिपाठी की जीत का अंतर भी बहुत ज्यादा नहीं रहा. हजारों में ही रहा. यानी इतनी नजदीकी लड़ाई होने के बाद भी दोनों प्रत्याशियों के दिलो में दूरियां नहीं थी.”

काशी की ये विशेषता दूसरी जगहों की तरह अब गुम हो गई, फिर भी बनारस के लोगों के जेहन में संपादक के सियासत का सफर और राजनारायण की सादगी दोनों आज भी रहती है. शायद यही कारण है कि नेता कोई भी हो बनारस जा कर वहां की फांकामस्ती और काशी के कलंदरपन का जिक्र करना नहीं भूलता.

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First published: May 9, 2019, 8:05 PM IST
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