UP के पीलीभीत में मिलीं खजुराहो जैसी मूर्तियां, पुरातत्व विभाग ने मोदी सरकार को भेजी रिपोर्ट
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UP के पीलीभीत में मिलीं खजुराहो जैसी मूर्तियां, पुरातत्व विभाग ने मोदी सरकार को भेजी रिपोर्ट
उत्तर प्रदेश के पीलीभीत में 11वीं शताब्दी के अवशेष मिले हैं.

पीलीभीत (Pilibhit) में जंगल के बीच स्थित बीसलपुर तहसील में इलाहाबाद देबल गांव में प्रसिद्ध प्राचीन देव स्थल मंदिर है. यहां हर साल बड़ा मेला लगता है. मंदिर के आसपास ग्रामीणों को खुदाई के दौरान खेतों में मूर्तियां और शिलालेख प्राप्त हो रहे हैं.

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पीलीभीत. उत्तर प्रदेश के पीलीभीत (Pilibhit) में जंगल के बीचों-बीच स्थित एक किलोमीटर दायरे में फैले इलाहाबाद देबल के देवस्थल में छिपे रहस्य से पीलीभीत को नई ख्याति मिल सकती है. बीते दिनों पुरातत्वविदों की टीम द्वारा सर्वेक्षण कर खुदाई के दौरान मंदिर के गर्भ गृह में मिली मूर्तियों व शिलालेखों की रिपोर्ट भारत सरकार को भेज दी है. बताया जाता है कि गांव के लोगों को आज भी खुदाई के समय मूर्तियां और 11वीं शताब्दी के शिलालेख मिले हैं.

जंगल के बीच स्थित बीसलपुर तहसील में इलाहाबाद देबल गांव में प्रसिद्ध प्राचीन देव स्थल मंदिर है. यहां हर साल बड़ा मेला लगता है. मंदिर के आसपास ग्रामीणों को खुदाई के दौरान खेतों में मूर्तियां और शिलालेख प्राप्त हो रहे हैं. वहीं मंदिर के गर्भ गृह में बना टीला भी अपने में रहस्य छुपाए हुए है.

मंदिर के गर्भगृह के रहस्य के बारे में बीते 2 वर्षों से अध्ययन कर रहे शिवम ने पत्र लेखन के माध्यम से जिला प्रशासन को पुरातत्व से जुड़े इस मंदिर के बारे में अवगत कराया. शासन से संज्ञान लेने के बाद बीते दिनों आगरा की पुरातत्व विभाग की टीम ने देव स्थल पर आकर खुदाई में मिली खजुराहो जैसी मूर्तियों व मिली शिलालेखों के बारे में ग्रामीणों से बात की. शुरुआती जानकारी के अनुसार ये 11वीं शताब्दी के अवशेष हैं.



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देवस्थल से कई पुरानी मूर्तियां ग्रामीणों को मिली हैं.




ग्रामीणों को उम्मीद मंदिर से पीलीभीत को मिलेगी ख्याति
अब शिवम और ग्रामीणों को उम्मीद है कि इस मंदिर के गर्भ गृह के रहस्य से पीलीभीत को नई ख्याति मिलेगी. बहुत जल्द अन्वेषण के बाद पीलीभीत में दक्षिण भारत के राजा से जुड़ी कहानी को पूरे प्रदेश में जाना जाएगा. स्थानीय निवासी कहते कि बीते कई वर्षों से उनके गांव से लेकर दूर-दूर से लोग यहां आते हैं. ये मंदिर कुल देवी के मंदिर के नाम से प्रसिद्ध है, जहां हर मनोकामना पूर्ण होती है. हर वर्ष मेले का आयोजन होता है. बीते दिनों पुरातत्व सर्वेक्षण की टीम ने यहां आकर खोजबीन कर जांच पड़ताल की.
ग्रामीणों ने बताया कि यहां खेतों की जुताई के समय कई बार मूर्तियां मिलीं, जिन्हें मंदिर में रख दिया जाता है. बीते दिनों खेतों में टीले की खुदाई में भी नटराज भगवान की मूर्तियां मिली हैं.

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ये मूर्तियां 11वीं शताब्दी की बताई जा रही हैं.


मंदिर से जुड़ीं अजीबोगरीब धारणाएं
मंदिर में लगे शिला पट के बारे मे भी अजीबोगरीब धारणा है. लोगों का मानना है कि जो भी इस शिला लेख को पढ़ लेगा, उसे खजाने का रास्ता मिल जायेगा. कुछ लोगों ने उसे पढ़ने की कोशिश भी की. मान्यता है कि जिसने भी इसे पढ़ा, वह पागल हो गया.

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कुछ मूर्तियों को सहेजने की कोशिश की गई है.


10वीं शताब्दी का इतिहास
कहा जाता है कि यह गांव 10वीं शताब्दी में राजपूतों की आस्था का प्रमुख केंद्र था. जहां करीब 1 किलोमीटर के दायरे में फैला भगवान शिव और माता पार्वती का विशाल मंदिर था. राजपूत माता पार्वती को वनदेवी मानकर उनकी पूजा करते थे. वक्त के थपेड़े खाकर गुमनामी के अंधेरे में गुम हुए इस इलाहाबाद देबल देवस्थल  के बारे में सबसे पहले 1829 में अंग्रेज इतिहासकार ने लिखा था. इसके बाद 1837 में जेम्स प्रिंसेप ने मंदिर के बारे में लिखा.

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गांववालों को उम्मीद है कि इन मूर्तियों के कारण उनका गांव पीलीभीत की पहचान बनेगा.


अंग्रेजों के समय में इस पर खूब काम हुआ मगर आजादी के बाद प्रदेश और देश की सरकार ने ऐतिहासिक दृष्टि से बेहद महत्वपूर्ण इलाहाबाद देबल की चिंता नहीं की.

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