Holi 2021: पीलीभीत शहर में होली की अनोखी परंपरा, गाली देकर रंग लगाने पर मिलता है पैसा

पीलीभीत शहर में होली की अनोखी परंपरा (File photo)

पीलीभीत शहर में होली की अनोखी परंपरा (File photo)

पीलीभीत (Pilibhit) के पूरनपुर तहसील में पड़ने वाले गांव शेरपुर जहां की आबादी लगभग 40 हजार के आसपास हैं यहां 38000 मुस्लिम (Muslim) है तो सिर्फ 2 हजार हिंदू हैं.

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पीलीभीत. होली (Holi 2021) के अवसर पर पूरा देश खुशियां मना रहा है. लेकिन पीलीभीत (Pilibhit) के शेरपुर में रंग के साथ-साथ गालियां भी दी जाती हैं. यहां पहले हिन्दू मुस्लिमों को रंग लगाते हैं और फिर उनको गाली देते हैं. खास बात ये है कि मुसलमान इससे नाराज नहीं होते हैं, बल्कि हंस कर होली की बधाई देते हैं. उसके बदले में मुस्लिम लोग उन्हें आशीर्वाद स्वरुप पैसा देते हैं.

40,000 की आबादी में दो हजार हिंदू

पीलीभीत के पूरनपुर तहसील में पड़ने वाले गांव शेरपुर जहां की आबादी लगभग 40 हजार के आसपास हैं यहां 38000 मुस्लिम है तो सिर्फ 2 हजार हिंदू हैं. जिसमें बाल्मीकि, पासी और राठौर जाति के हिंदू भाई निवास करते हैं और गाली की परंपरा सिर्फ इसी गांव में है. इस गांव के रहने वाले वरिष्ठ पत्रकार तारिक कुरैशी का कहना है कि यह परंपरा काफी पुरानी चली आ रही है. कुरैशी बताते है कि इसमें कोई भी लोग बुरा नहीं मानता है और गांव का भाईचारा इस बात से देखा जा सकता है कि 40000 की आबादी में सिर्फ 2000 हिंदू- भाई खुलकर जश्न बनाते हैं और अपनी परंपरा को निभाते हैं.

हिंदू-मुस्लिम दोनों उत्साहित
शेरपुर गांव में हिंदुओं की आबादी में एक स्थल है जहां पर एक मंदिर बना हुआ है. इसी मंदिर पर रात में होलिका जलाई जाती है. सुबह-सुबह सभी हिंदू भाई इकट्ठा होकर एक जुलूस की शक्ल में पूरे इलाके में होली मनाते हैं और चारों तरफ यानी कि पूरे गांव में टहलते हुए परंपरा के साथ फिर इसी मंदिर में आकर यह जुलूस को खत्म करते हैं जो गाली वाले जुलूस के नाम से भी मशहूर है.

क्या कहते हैं नवाब साहब 

शेरपुर के रहने वाले मौजूदा समय के नवाब नवाज उल हसन खान का कहना है कि यह परंपरा लगभग 300 साल पुरानी है. 365 दिन में एक दिन इन लोगों का आता है यह लोग उस दिन अपनी पूरी भड़ास निकालते हैं और नवाबों को जमकर गालियां देते हैं. जिसके बदले में नवाब खानदान के लोग इन्हें उपहार स्वरूप पैसा देते हैं. बहुत से लोगों ने इस परंपरा को खत्म करने की बात कही नवाब साहब का कहना है कि यह परंपरा बहुत पुरानी यानी 300 साल पुरानी है. वह लोग शुरुआत से एक दिन अपनी भड़ास निकालते थे जो आज भी चली आ रही है.
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