भीम आर्मी चीफ चंद्रशेखर आजाद के सामने इमेज को वोट में बदलने की चुनौती क्योंकि...

चंद्रशेखर आजाद: दलित राजनीति का नया चेहरा
चंद्रशेखर आजाद: दलित राजनीति का नया चेहरा

आजाद समाज पार्टी के पास अभी तक सभी जिलों में मजबूत संगठन का अभाव है और संगठन बिना नहीं जीते जाते चुनाव

  • News18Hindi
  • Last Updated: September 29, 2020, 4:00 PM IST
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नई दिल्ली. पुलिस-प्रशासन की कड़ी नाकाबंदी को धता बताते हुए आजाद समाज पार्टी (Azad Samaj Party) के राष्ट्रीय अध्यक्ष चंद्रशेखर आजाद (Chandra shekhar Azad) रविवार शाम अलीगढ़ के जेएन मेडिकल कॉलेज पहुंच गए. उन्हें यहां आइसीयू में भर्ती हाथरस की सामूहिक दुष्कर्म पीड़िता से मिलने नहीं दिया गया, लेकिन उन्होंने जिला प्रशासन को ज्ञापन सौंपकर पीड़ित परिवार को एक करोड़ रुपये की आर्थिक मदद दिलाने की मांग की. उनके अलीगढ़ जाने के एलान के बाद बसपा भी ट्विटर पर सक्रिय हुई. ऐसी कई घटनाओं पर वो मौके पर पहुंच रहे हैं. सवाल ये उठता है कि क्या वो अपनी सियासी सक्रियता को बढ़ा रहे हैं और क्या यह सक्रियता बहुजन समाज पार्टी (BSP) को नुकसान पहुंचाएगी?

राजनीतिक विश्लेषक आलोक भदौरिया कहते हैं कि अनुसूचित जाति के लोग मायावती (Mayawati) के कट्टर सपोर्टर हैं. इस अवधारणा को 2017 के यूपी विधानसभा चुनाव और 2019 के लोकसभा चुनाव में तब बड़ा झटका लगा था जब मोदी-शाह की जोड़ी ने इस वर्ग का काफी वोट अपनी तरफ कर लिया था.

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भीम आर्मी प्रमुख चंद्रशेखर (File Photo)




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मायावती कमजोर हुई हैं फिर भी कायम है जनाधार

इसलिए ऐसी कोई वजह नहीं है कि इस समाज के लोग चंद्रशेखर को स्वीकार न करें. चंद्रशेखर दलित आंदोलन का प्रतीक बनते जा रहे हैं. उनमें तेवर है. हर बड़ी घटना पर वो बोलते हैं. लोगों को विश्वास है कि यह युवा कुछ कर सकता है. राजनीति (Politics) इमेज और अवधारणा का खेल है. लेकिन अगर इसे वोटों में बदलना है तो हर जिले में संगठन चाहिए. क्योंकि चुनाव (Election) संगठन के बूते ही जीता जाता है. चंद्रशेखर ने खुद को प्रतीक के तौर पर चमकाने की कोशिश की है. लेकिन सफलता के लिए उन्हें संगठन का आधार चाहिए.



चंद्रशेखर के पास संगठन का अभाव

संगठन अभी दिख नहीं रहा है. इसके बिना काम नहीं बनेगा. दूसरी ओर, मायावती कमजोर हुई हैं लेकिन उनका जनाधार खत्म नहीं हुआ है. यह चंद्रशेखर को हमेशा याद रखना होगा. बीजेपी ने अपनी सोशल इंजीनियरिंग (Social engineering) के जरिए अनुसूचित जाति के कई छोटे धड़ों और उप जातियों को साधा है. चंद्रशेखर के लिए उन्हें एक छतरी के नीचे लाना चुनौती है. हालांकि, चुनाव में उनकी उपस्थिति महसूस की जाएगी. लेकिन हार जीत दूसरे दलों के तालमेल पर भी निर्भर करेगी.



मेरठ यूनिवर्सिटी में एसोसिएट प्रोफेसर और दलित मामलों के जानकार सतीश प्रकाश कहते हैं कि भीम आर्मी चीफ चंद्रशेखर के साथ बसपा से ही रिजेक्टेड लोग हैं. उनके पास थिंक टैंक का अभाव है. अगर चंद्रशेखर दलित समाज को लीड करना चाहते हैं तो उन्हें पहले समाज की मनोस्थिति जाननी होगी कि वो उन्हें नेता या फिर सामाजिक कार्यकर्ता, आखिर किस रूप में देखना चाहता है. चंद्रशेखर का व्यवहार उसी के अनुरूप होना चाहिए. इस वर्ग में नेता से अधिक स्वीकार्यता सामाजिक काम करने वालों की रही है.

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अनुसूचित जाति के वोट का होगा बिखराव

सतीश प्रकाश कहते हैं कि चार बार का सत्ता पाया हुआ हुआ दलित बहुत दिन तक सत्ता से दूर नहीं रह सकता. सत्ता पाने की इच्छा शक्ति उनमें बनी हुई है. बीएसपी निश्चित तौर पर काफी मजबूत है. ऐसे में चंद्रशेखर को पहले सामाजिक तौर पर पहचान बनाने का काम करना चाहिए था. क्योंकि उनके पार्टी बनाने से अनुसूचित जाति के वोटों का बिखराव होगा. इससे दूसरी पार्टियों को फायदा पहुंचेगा. चंद्रशेखर सियासी तौर पर अभी कितने पानी में हैं उन्हें खुद इसका अंदाजा लगाना चाहिए.
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