पूर्वांचल में 'जीरो' है कांग्रेस, क्या योगी-मोदी के गढ़ में बीजेपी को चुनौती दे पाएंगी प्रियंका गांधी?

ओम प्रकाश | News18Hindi
Updated: January 24, 2019, 4:08 PM IST
पूर्वांचल में 'जीरो' है कांग्रेस, क्या योगी-मोदी के गढ़ में बीजेपी को चुनौती दे पाएंगी प्रियंका गांधी?
प्रियंका गांधी के लिए बड़ी चुनौती है पूर्वांचल!

प्रियंका गांधी को उस पूर्वी उत्तर प्रदेश की कमान दी गई है जहां 2014 के लोकसभा चुनाव में कांग्रेस का खाता तक नहीं खुला और बीजेपी को 23 सीटें मिलीं. 2017 के विधानसभा चुनाव में पूर्वांचल से कांग्रेस की सिर्फ एक सीट है

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प्रियंका गांधी को जिस पूर्वी उत्तर प्रदेश की कमान दी गई है वहां कांग्रेस की हालत काफी खराब है. जबकि यह क्षेत्र बीजेपी के दो दिग्गजों प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और यूपी के सीएम योगी आदित्यनाथ का गढ़ है. इस क्षेत्र में 21 जिले और लोकसभा की 26 सीटें हैं. साल 2014 के आम चुनाव में यहां कांग्रेस का खाता तक नहीं खुला था. जबकि बीजेपी ने 23 सीटों पर कब्जा जमाया था. अपना दल को 2 और सपा को एक सीट मिली थी. यहां तक कि 2018 में हुए गोरखपुर, फूलपुर लोकसभा चुनाव में भी कांग्रेस की जमानत जब्त हो गई थी. सवाल ये है कि क्या प्रियंका गांधी योगी-मोदी के गढ़ में बीजेपी को चुनौती दे पाएंगी?

वैसे ये तो वो पूर्वांचल है जिसे अब तक राजनीति मानती आई है. कांग्रेस के पूर्वांचल में कौन कौन से जिले हैं ये तो पार्टी अलग से बताएगी, फिलहाल जानकार कांग्रेस के इस नए पूर्वांचल का विस्तार लखनऊ तक मान रहे हैं. पूर्वांचल, उत्तर में नेपाल, पूर्व में बिहार, दक्षिण में मध्य प्रदेश और पश्चिम में  उत्तर प्रदेश के अवध क्षेत्र से घिरा है. इसे अलग राज्य बनाने के लिए लंबे समय से राजनीतिक मांग हो रही है. (ये भी पढ़ें: क्या प्रियंका गांधी कांग्रेस के लिए वह कर पाएंगी जो राहुल नहीं कर पाए?)

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बहरहाल,  21 जिलों वाले पूर्वांचल में 2009 में कांग्रेस ने चार सीटें हासिल की थीं, जबकि बीजेपी ने 9 लोकसभा क्षेत्रों में कब्जा जमाया था. कांग्रेस ने अपनी इसी खोई हुई सियासी जमीन को वापस लेने के लिए प्रियंका गांधी को पूर्वांचल में उतारा है. राजनीतिक विश्लेषकों के मुताबिक, प्रियंका गांधी 2014 और 2019 के आंकड़ों में बहुत ज्यादा फेरबदल नहीं कर पाएंगी. लेकिन यह कांग्रेस कार्यकर्ताओं का मनोबल बढ़ाने और अपनी विरोधी पार्टियों पर मनोवैज्ञानिक दबाव डालने की अच्छी कोशिश जरूर है.

पूर्वांचल में ब्राह्मणों की अच्छी संख्या है. एक समय ब्राह्मण पारंपरिक तौर पर कांग्रेस के समर्थक थे, लेकिन मंडल के बाद उनका झुकाव भाजपा की ओर हो गया. जबकि दलितों, मुस्लिमों ने सपा, बसपा की राह पकड़ ली. माना जा रहा है कि 2019 के लोकसभा चुनाव में प्रियंका के जरिए पूर्वांचल के ब्राह्मणों को लुभाने की कोशिश होगी. कांग्रेस के समर्थक संत प्रमोद कृष्णन का कहना है कि यदि सपा-बसपा ने गठबंधन करते वक्त यदि अखिलेश-मायावती राहुल गांधी को गंभीरता से लेते तो प्रियंका गांधी को लाने की जरूरत नहीं पड़ती. (ये भी पढ़ें: ‘कांग्रेस मर नहीं सकती, उसके दोष बने रहेंगे और गुण लौट-लौट कर आएंगे...’ )

देश की सत्ता का रास्ता यूपी से होकर जाता है और यूपी को जीतने के लिए पूर्वांचल को जीतना जरूरी है. इसी फॉर्मूले से 2014 के लोकसभा और 2017 के विधानसभा चुनाव में यूपी में सबसे ज्यादा सीटें हासिल करने वाली भाजपा अब 2019 का चुनाव जीतने के लिए पूर्वांचल पर फोकस कर रही है. विकास में पिछड़े रहे इस क्षेत्र से पीएम मोदी खुद सांसद हैं. पूर्वांचल के दूसरे बड़े केंद्र गोरखपुर से योगी आदित्यनाथ सीएम हैं. गोरखपुर से लेकर बनारस तक विकास की कई बड़ी परियोजनाएं चल रही हैं. यह क्षेत्र बीजेपी और सपा का पुराना गढ़ रहा है. मुलायम सिंह यादव पूर्वांचल के आजमगढ़ से सांसद हैं. इसलिए इस क्षेत्र में प्रियंका गांधी को भेजकर कांग्रेस सेंध लगाने की कोशिश करेगी.

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वरिष्ठ पत्रकार आलोक भदौरिया कहते हैं "प्रियंका गांधी अचानक सबकुछ बदल नहीं देंगी लेकिन वो इतना जरूर करेंगी कि कांग्रेस विरोधी पार्टियां परेशान हो जाएं, कांग्रेस कार्यकर्ताओं का मनोबल ऊंचा हो और संगठनात्मक मजबूती आए. वो सीएम, पीएम के इस क्षेत्र में अपनी पार्टी को लेकर धारणा जरूर बदलेंगी. यूपी में सपा-बसपा गठबंधन में कांग्रेस को शामिल नहीं किये जाने के बाद उभरे समीकरणों के बीच प्रियंका गांधी का अचानक पूर्वी उत्तर प्रदेश का प्रभारी बनना सियासी तौर पर बेहद महत्वपूर्ण कदम है."

'24 अकबर रोड' के लेखक रशीद किदवई कहते हैं, 'राहुल गांधी ने एमपी, छत्तीसगढ़ और राजस्थान में जीत दर्ज कर दिखा दिया है कि उनमें पार्टी को उबारने की क्षमता है. ऐसे में अब ये तो नहीं कहा जा सकता कि राहुल फेल हो गए इसलिए प्रियंका को लाया गया है. दरअसल, प्रियंका को इसलिए उतारा गया है, क्योंकि 2019 के लोकसभा चुनाव में कांग्रेस के सामने करो या मरो की स्थिति है. ऐसे में कांग्रेस ने ब्रह्रमास्त्र के रूप में प्रियंका गांधी का दांव चला है. मुझे लगता है कि यह सफल भी रहेगा. यह कांग्रेस का मास्टर स्ट्रोक है.'

राजनीतिक विश्लेषकों के मुताबिक  2017 के विधानसभा चुनाव में भी पूर्वांचल में कांग्रेस की स्थिति अच्छी नहीं थी. पूर्वांचल में विधानसभा की 130 विधानसभा सीटें हैं. मोदी लहर में यहां बीजेपी ने सबसे ज्यादा 87 सीटों पर कब्जा जमाया था. जबकि कांग्रेस की सिर्फ एक सीट कुशीनगर के तमकुहीराज की है. अपना दल की 9, सपा की 14 और बसपा की 10 सीटें हैं.

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पूर्वांचल में कौन-कौन लोकसभा सीटें:

गोरखपुर, वाराणसी, आजमगढ़, देवरिया, कुशीनगर, बांसगांव, फैजाबाद, बहराइच, श्रावस्ती, गोंडा, डुमरियागंज, महराजगंज, आंबेडकरनगर, बस्ती, संत कबीर नगर, सलेमपुर, बलिया, जौनपुर, गाजीपुर, चंदौली, भदोही, मिर्जापुर, फतेहपुर, फूलपुर, इलाहाबाद और प्रतापगढ़. पूर्वांचल की फूलपुर सीट से 1952 में पंडित नेहरू ने चुनाव जीता. 1964 में नेहरू के निधन के बाद यहां उप चुनाव हुआ. जिसमें उनकी बहन विजय लक्ष्मी पंडित को भी जनता ने संसद भेजा.

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First published: January 24, 2019, 2:43 PM IST
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