Analysis: क्या रायबरेली सीट पर सोनिया गांधी को चुनौती दे पाएगी बीजेपी?

इतिहास देखें तो रायबरेली सीट गांधी परिवार की सबसे पसंदीदा सींटों में एक रही है, लेकिन इस सीट ने ही गांधी परिवार को राजनीति का सबसे बड़ा जख्म भी दिया है.

Anil Rai | News18 Uttar Pradesh
Updated: April 18, 2019, 10:42 AM IST
Analysis: क्या रायबरेली सीट पर सोनिया गांधी को चुनौती दे पाएगी बीजेपी?
सोनिया गांधी (फाइल फोटो)
Anil Rai
Anil Rai | News18 Uttar Pradesh
Updated: April 18, 2019, 10:42 AM IST
उत्तर प्रदेश की रायबरेली लोकसभा सीट का नाम आते ही गांधी परिवार का नाम जेहन में उभर आता है. 1957 से इस सीट पर गांधी परिवार से जो भी लड़ा निराश नहीं हुआ. 1957 में फिरोज गांधी यहांं से चुनाव जीते. इतिहास देखें तो ये सीट गांधी परिवार की सबसे पसंदीदा सीटों में एक रही है, लेकिन इस सीट ने ही गांधी परिवार को राजनीति का सबसे बड़ा जख्म भी दिया है.

1977 में इस सीट पर गांधी परिवार की सबसे ताकतवर शख्सियत समझी जाने वाली इंदिरा गांधी को राजनारायण ने शिकस्त दी थी. इंदिरा ने हार के बाद इस सीट से कभी चुनाव नहीं लड़ा. इसके बाद यहां से गांधी परिवार की करीबी समझी जाने वाली शीला कौल और सतीश शर्मा सांसद रहे.

सोनिया गांधी ने भले ही अपने चुनावी जीवन की शुरुआत अमेठी से की हो, लेकिन उनको सबसे ज्यादा बार संसद में रायबरेली सीट ने ही भेजा है. 1977 को छोड़, 1996 और 1998 में ये सीट कांग्रेस के पाले से बाहर रही है. दोनों बार ये सीट बीजेपी के अशोक सिंह ने जीती, लेकिन इन दोनों चुनावों में गांधी परिवार या उनका कोई करीबी इस सीट से चुनाव नहीं लड़ा था.

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मोदी लहर में भी सोनिया गांधी ने यहां से करीब 3 लाख 50 हजार से ज्यादा वोटों से जीत दर्ज की थी. सोनिया गांधी इस सीट पर 2004 से सांसद हैं और हर चुनाव में उन्होंने बड़े अंतर से जीत दर्ज की है. बीजेपी इस बार सोनिया गांधी को उनकी परंपरागत सीट पर कड़ी चुनौती देने में लगी है. हालंकि बीजेपी का जोर रायबरेली से ज्यादा अमेठी पर है.

सोनिया गांधी (फाइल फोटो)


2009 और 2014 के लोकसभा चुनावों में समाजवादी पार्टी ने इस सीट पर सोनिया गांधी के समर्थन में अपना उम्मीदवार खड़ा नहीं किया था. 2019 में गठबंधन धर्म के नाते बीएसपी ने भी सोनिया गांधी का समर्थन किया है और उनके खिलाफ उम्मीदवार नहीं उतारा है. बीजेपी ने इस सीट से स्थानीय एमएलसी दिनेश सिंह को मैदान में उतारा है.यह भी पढ़ें- Analysis: क्या बीजेपी का ये मास्टर प्लान कन्नौज में दे पाएगा डिंपल यादव को चुनौती?

बात करें इस सीट के जातीय समीकरण की तो करीब 34 फीसदी एससी वोटों में सबसे ज्यादा पासी जाति के हैं. 20 लाख के करीब मतादाताओं वाली इस सीट पर 11 फीसदी ब्राह्मण, 8 फीसदी ठाकुर, 7 फीसदी यादव और लगभग 6 फीसदी मुस्लिम मतदाता हैं. ऐसे में जातीय आंकड़ा भी सोनिया गांधी के पक्ष में है. शायद यही वजह है, जिसके कारण बीजेपी नेतृत्व इस सीट पर ज्यादा फोकस करने के बजाय अमेठी पर जोर दे रहा है.

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