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सांसद हैं सोनिया गांधी लेकिन राय बरेली के सदर में चलती है 'विधायक जी' की हनक

बेटी अदिति के साथ अखिलेश सिंह (फाइल फोटो)

अखिलेश सिंह का दबदबा और हनक इस सीट पर देखने को मिलती है. 2017 के चुनाव में अपनी गिरती सेहत और सियासी विरासत को संजोए रखने के लिए अखिलेश ने अपनी बेटी को कांग्रेस के टिकट पर चुनाव लड़वाकर विधानसभा भेजा.

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उत्तर प्रदेश के मानचित्र पर रायबरेली जिला देश में गांधी खानदान की पारंपरिक लोकसभा सीट के लिए मशहूर है. इमरजेंसी के बाद इस सीट से 1977 में इंदिरा गांधी को जनता पार्टी के राजनारायण के हाथों हार मिली थी, लेकिन तीन साल बाद हुए चुनाव में कांग्रेस ने वापसी कर ली. तब से लेकर आज तक इस सीट पर कांग्रेस का ही कब्ज़ा है. रायबरेली में छह विधानसभा सीटें बछरावां, हरचंदपुर, रायबरेली सदर, सरेनी, ऊंचाहार और सलोन हैं. लेकिन, कांग्रेस का गढ़ होने के बावजूद वर्ष 2017 तक रायबरेली सदर सीट पर कांग्रेस का कब्ज़ा नहीं रहा. वजह थी ‘विधायक जी’ के नाम से मशहूर अखिलेश सिंह. बाहुबली अखिलेश सिंह क्रिमिनल बैकग्राउंड होने के बावजूद यहां की जमीन पर पकड़ रखते हैं.

अखिलेश सिंह का दबदबा और हनक इस सीट पर देखने को मिलती है. वर्ष 2017 के चुनाव में अपनी गिरती सेहत और सियासी विरासत को संजोए रखने के लिए अखिलेश ने अपनी बेटी को कांग्रेस के टिकट पर चुनाव लड़वाकर विधानसभा भेजा. कहा जाता है कि जिले के हर ठेके-पट्टे पर उनका कमीशन तय होता है. किसी भी प्रोजेक्ट को शुरू करने के लिए उनके आदमी को काम देना भी जरूरी है. अखिलेश सिंह का सिक्का आज भी यहां बोलता है.

सैयद मोदी हत्याकांड में भी आया था नाम
अखिलेश सिंह पर 45 से भी ज्यादा मुकदमे दर्ज हैं, कई मामले में वे बरी हो चुके हैं, जबकि कई केस अभी भी विचाराधीन हैं. वर्ष 1988 के मशहूर सैय्यद मोदी हत्याकांड में भी उनका नाम आया था. हत्याकांड में अखिलेश सिंह के अलावा अमेठी राजघराने के संजय सिंह और सैयद मोदी की पत्नी अमिता मोदी पर भी मुकदमा दर्ज हुआ था. साल 1990 में संजय सिंह और अमिता को बरी कर दिया गया और 1996 में अखिलेश सिंह भी बरी हो गए.

कभी राहुल-प्रियंका को जमकर कोसते थे अखिलेश सिंह
अखिलेश सिंह इस सीट से पांच बार विधायक रहे हैं. कई बार निर्दलीय चुने गए और वर्ष 2012 के चुनावों से पहले पीस पार्टी जॉइन की थी. अखिलेश सिंह 13 साल तक कांग्रेस से अलग रहे. इस दौरान वह गांधी परिवार को जमकर कोसते थे. कहा जाता है कि अखिलेश सिंह का खौफ ऐसा था कि कांग्रेसी उनके डर से पोस्टर भी नहीं लगा पाते थे. राहुल और प्रियंका की रैलियों से ज्यादा भीड़ उनकी सभाओं में जुटती थी. कहा ये भी जाता है कि जिस दिन राहुल और प्रियंका की जनसभा होती थी, अखिलेश उसी दिन रैली करते थे.

अब बेटी अदिति सियासी वर्चस्व को दे रहीं नई दिशा
शायद इसे ही पॉलिटिक्स कहते हैं. जो कभी खिलाफ थे, आज कांग्रेस के साथ हैं. दरअसल, इसके पीछे की वजह है एमएलसी दिनेश प्रताप सिंह की ताकत बढ़ना और अखिलेश का गिरता स्वास्थ्य. समय के साथ परिस्थितियां भी बदलीं. अखिलेश के खिलाफ कांग्रेस ने दिनेश प्रताप सिंह को ताकत देना शुरू किया. एक समय यह भी आया कि कभी सत्ता का केंद्र रहा 'विधायक जी' का निवास एमएलसी निवास पंचवटी (दिनेश प्रताप सिंह का घर) की तरफ शिफ्ट होने लगा. दिनेश सिंह का बढ़ता रसूख और अखिलेश सिंह का गिरता स्वास्थ्य कांग्रेस के लिए फायदेमंद साबित हुआ. वर्ष 2017 में अदिति सिंह कांग्रेस के टिकट पर इस सीट से जीतीं. कांग्रेस के साथ आने से अखिलेश का पर्सनल वोट बैंक कांग्रेस के नाम हुआ.

कांग्रेस के खास भी हो गए बागी
कहानी की दूसरी तस्वीर अभी बाकी थी. जिले की राजनीति में अपना कद बढ़ा चुके गांधी परिवार के खास दिनेश प्रताप सिंह इस बीच बागी हो गए और बीजेपी में शामिल होकर इस बार सोनिया के खिलाफ चुनाव भी लड़ा है. जानकारों की मानें तो दिनेश के बागी होने पीछे की वजह राजनीतिक वर्चस्व है. अदिति के कांग्रेस में आने से और पार्टी में महत्वपूर्ण पद मिलने से पंचवटी की धाक कम हो रही थी. हालांकि, कांग्रेस ने ही दिनेश सिंह को एमएलसी, उनके एक भाई को विधायक और दूसरे को जिला पंचायत अध्यक्ष बनाया था, लेकिन सियासी वर्चस्व में अदिति की एंट्री से हालात बदल गए.

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