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यूपी के वोटबैंक: 7 फीसदी आबादी, 5 सीएम, 2 पीएम, ये है राजपूतों की सियासी ताकत!

यूपी के वोटबैंक: 7 फीसदी आबादी, 5 सीएम, 2 पीएम, ये है राजपूतों की सियासी ताकत!

यूपी के वोट बैंक

यूपी के वोट बैंक

सीएसडीएस के एक सर्वे के मुताबिक 2009, 2014 के लोकसभा चुनाव में ठाकुरों का सबसे ज्यादा वोट बीजेपी को मिला था. देखना ये है कि यह वोटबैंक इस बार किसके साथ जाता है

आजादी के वक्त जब जयपुर राजघराना भारत गणराज्य में मिलाया जा रहा था, तो उसके राजा मानसिंह ने शर्त रखी कि वो जिंदगी भर 'राज प्रमुख' रहेंगे. सरकार ने ये बात मान ली पर कुछ साल बाद 1956 में यह पद खत्म कर दिया. रजवाड़े कमजोर हो रहे थे पर उनकी अकड़ खत्म नहीं हुई थी. इंदिरा गांधी आईं तो उन्होंने 1971 में इन पर आखिरी प्रहार किया और राजाओं को मिलने वाले वित्तीय लाभ (प्रिवीपर्स) भी खत्म कर दिए. राजपूत हमेशा से सत्ता के करीब रहे थे और उसी से जुड़े रहना चाहते थे, मगर अब उनकी स्वतंत्र सत्ता नहीं चल सकती थी. ऐसे में वो सीधे लोकतांत्रिक राजनीति में उतरने लगे.

यहां पढ़ें: यूपी के वोट बैंक: पार्ट-1(दलित ), पार्ट-2 ( मुस्लिम), पार्ट-3 (ब्राह्मण), पार्ट-4 (यादव), पार्ट-5 (जाट)

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यूपी की ऐसी ही एक रियासत ने वीपी सिंह को प्रधानमंत्री की कुर्सी तक पहुचाया. वरिष्ठ पत्रकार सुशील सिंह कहते हैं कि राजपूत हमेशा सत्ता एंज्वाय करते रहे हैं इसलिए वे इससे दूर नहीं रह सकते थे… आजादी के बाद जमींदारी उन्मूलन और प्रिवीपर्स खत्म करने से रजवाड़े कमजोर हुए और इससे आम राजपूतों ने भी खुद को जोड़कर देखा… परसेप्शन ऐसा बना कि राजपूतों का झुकाव जनसंघ की ओर होने लगा. 1962 में प्रतापगढ़ के राजा अजीत प्रताप सिंह जनसंघ के टिकट पर चुनाव लड़कर लोकसभा पहुंचे. सुशील सिंह के मुताबिक, चूंकि राजपूत ओपीनियन मेकर हैं, इसलिए कांग्रेस ने अस्सी के दशक में इन्हें जोड़ने की मुहिम शुरू की. 9 जून 1980 को एक ही दिन कांग्रेस के दो मुख्यमंत्रियों मध्य प्रदेश में अर्जुन सिंह और यूपी में वीपी सिंह ने कुर्सियां संभालीं.

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यूपी की बात करें तो वहां राजपूत (ठाकुर) 6-7 फीसदी तक हैं. आजादी के बाद यूपी को उन्होंने 5 सीएम दिए हैं. यूपी के ही दो ठाकुर प्रधानमंत्री की कुर्सी तक पहुँचे. ब्राह्मणों के बाद सत्ता पर सबसे ज्यादा पकड़ ठाकुरों की ही रही है. यूपी से चंद्रशेखर और वीपी सिंह तो राजस्थान से भैरो सिंह शेखावत शीर्ष पदों तक पहुँचे.

जबकि वरिष्ठ पत्रकार टीपी शाही कहते हैं, 'यूपी में राजपूत सीएम तो बने पर कोई अपना कार्यकाल पूरा नहीं कर पाया क्योंकि पार्टियां उन्हें जोड़तोड़ करके हटाती रही हैं. सत्ता लाने के लिए, जनमत बनाने के लिए उन्होंने मेहनत की और बाद भी कुर्सी राजपूतों से लेकर किसी और को सौंप दी गई.'

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हालांकि 2017 में जब यूपी में बीजेपी को पूर्ण बहुमत मिला और योगी आदित्यनाथ सीएम बने तो चुनाव नतीजों को समाजवादी पार्टी के 'यादववाद' के खिलाफ जनाक्रोश बताया गया. योगी के साथ ही सत्ता में राजपूतों (ठाकुरों) की वापसी हुई. सुलखान सिंह पुलिस मुखिया, तो राघवेंद्र सिंह एडवोकेट जनरल बनाए गए. प्रदेश की 7% आबादी के बावजूद यूपी कैबिनेट में 7 मंत्री राजपूत हैं और विधानसभा में 56 विधायक. राज्यसभा चुनावों में भी राजा भैया ने योगी का साथ देकर इशारा कर दिया है कि लोकसभा चुनाव में राजपूत किस करवट बैठने वाले हैं.

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यूपी की राजनीति और ठाकुर

बीजेपी में इस वक्त ठाकुरों के चार बड़े चेहरे हैं. पूर्वी उत्तर प्रदेश में योगी आदित्यनाथ, राजनाथ सिंह. पश्चिमी यूपी में संगीत सोम और सुरेश राणा. सबसे ज्यादा ठाकुर नेता बीजेपी में हैं. जाहिर है इसके चलते इस वर्ग का वोट भी बीजेपी को मिल रहा है. पहले समाजवादी पार्टी में अमर सिंह और राजा भैया जैसे बड़े ठाकुर नेता हुआ करते थे और उनके होने का लाभ उसे मिलता था.

वरिष्ठ पत्रकार राजकुमार सिंह मानते हैं कि ठाकुर संख्या में भले ही कम रहे लेकिन 'दबंगई' की वजह से इनका पावर शेयर अन्य जातियों के मुकाबले ज्यादा रहा है. अपने-अपने क्षेत्रों में इनका खासा प्रभाव रहा है. ठाकुर सामाजिक तौर पर दबदबे वाले, ग्रामीण उच्चवर्ग के प्रतीक, दबंग एवं मत बनाने वाले माने जाते हैं. राजकुमार सिंह कहते हैं कि जबसे जातीय कैलकुलेशन काफी होने लगा है तब से पार्टियों ने इन्हें टिकट देना कम कर दिया है. 2019 में राजपूतों को शायद सबसे कम सीटें मिलने वाली हैं. सपा-बसपा तो दे ही नहीं रही हैं, बीजेपी ने भी अपना फोकस ओबीसी पर कर लिया है.

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मगर वरिष्ठ पत्रकार हिमांशु मिश्र इससे सहमत नहीं. ‘‘बीजेपी बनने से पहले राजपूत कांग्रेस में थे. बीजेपी और कांग्रेस जैसी पार्टियां कभी इन्हें इग्नोर नहीं कर पाईं क्योंकि ये ओपीनियन मेकर हैं. माहौल बनाने में सक्षम हैं. मौजूदा समय में क्षत्रिय वोटरों का झुकाव बीजेपी की तरफ दिखता है, इसकी वजह भागीदारी है. बीजेपी ने क्षत्रिय नेताओं को तवज्जो दी हुई है. गांव में अब भी उनका दबदबा है.’’

समाजशास्त्री बद्रीनारायण भी इस बात को मानते हैं- "चुनावों में लाठी से मज़बूत होने के कारण बूथ मैनेजमेंट में यह प्रभावी जाति मानी जाती रही है. इसीलिए पार्टियों के प्रभावी राजनीतिक नेतृत्व के रूप में यह जाति छाई रही है. बाद में यादव, कुर्मी, चमार जैसी बड़ी संख्या वाली जातियां जब धन, लाठी और बोली से सशक्त होकर चुनावी राजनीति में प्रभावी हुईं तो राजपूत जाति का महत्व थोड़ा कम हो गया."

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दिल्ली यूनिवर्सिटी में जातियों पर रिसर्च कर चुके प्रवीण कुमार कहते हैं, ब्राह्मणों को छोड़ दें तो कोई भी जाति राजनीतिक रूप से तब अहम होती है जब उसके पास जमीन हो, उस पर कुछ वर्ग निर्भर हों... यानी वो काम देने वाला हो. राजपूतों के मसले में ये दोनों बातें हैं. इसलिए भी राजनीतिक ढांचे में वे काफी महत्वपूर्ण हैं और उनके सीएम बनते रहे हैं.’’

पर पूर्व एमएलसी यशवंत सिंह कहते हैं, 'समय के साथ राजपूतों की राजनीतिक शक्ति घटी है, क्योंकि अब अन्य जातियों, वर्गों की उन पर निर्भरता काफी कम हुई है.'

मंडल के बाद ठाकुर

यह अजीबोगरीब है कि जिस मंडल आरक्षण को यूपी के ठाकुर नेता वीपी सिंह ने लागू कराया, उन्हीं ठाकुरों के खिलाफ बाद में ओबीसी जातियां खड़ी हो गईं. हालांकि सामाजिक तौर पर ठाकुरों का रसूख इतना कम नहीं हुआ कि वे राजनीति से बाहर हो जाते. इसलिए वे उन जगहों से भी चुने जाते हैं जहां उनकी आबादी अन्य जातियों के मुकाबले कम है. यही नहीं कई बार दूसरी जातियों के लोग भी इनकी पसंदीदा पार्टी को वोट कर देते हैं. कई बार ये भी हुआ कि ठाकुरों का वर्चस्व न मानने वाले लोगों ने उनके विरोधी पक्ष को वोट कर दिया. 2019 में भी ये समीकरण बनेंगे बिगड़ेंगे.

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मंडल वाला 'ठाकुर' नेता: 'राजा' से 'कलंक' तक

विश्वनाथ प्रताप सिंह ने 1990 में 'मंडल आरक्षण' लागू करने के बाद कहा था- 'मैंने गोल तो कर दिया, पर अपनी टांगें तुड़वा लीं'. इस फैसले के बाद वह अगड़ी जातियों के निशाने पर आ गए थे. मंडल विरोधी आंदोलन को बीजेपी ने कैश किया और केंद्र में वह बड़ी भूमिका में सामने आई. मंडल के कारण वीपी सिंह की सरकार गिरी और वह खुद राजनीतिक तौर पर हाशिए पर चले गए. वीपी सिंह के लिए नारे लगे 'राजा नहीं फकीर है, देश की तकदीर है.' बाद में उनके खिलाफ नारा बदलकर 'रंक' और 'देश का कलंक' तक जा पहुंचा.

जाति से ठाकुर होने के बावजूद वीपी सिंह की राजनीति पिछड़ों और दलितों की समर्थक ज्यादा नज़र आती है. मंडल के अलावा भी उनके फैसलों ने बने-बनाए राजनीतिक ढांचे को चुनौती दी. मसलन, राममंदिर आंदोलन के मुद्दे पर बीजेपी के सामने झुकने से इनकार, बाबा साहेब को भारत रत्न देना, उनकी जयंती पर छुट्टी देना और ऑपरेशन ब्लू स्टार के लिए स्वर्ण मंदिर जाकर माफी मांगने जैसे कदम उठाए.

वीपी 1969 में पहली बार यूपी में विधायक बने. मुख्यमंत्री पद भी उन्होंने विवादास्पद परिस्थितियों में छोड़ा. केंद्रीय मंत्री के बतौर भ्रष्टाचार के सवाल पर उनका प्रधानमंत्री राजीव गांधी से लंबा विवाद चला. 1989 में लोकसभा चुनाव के बाद गैरकांग्रेसी सरकार के गठन का वक्त आया तो भी विवाद उठा. जनता दल संसदीय दल ने पहले चौधरी देवी लाल को अपना नेता चुना और उसके तुरंत बाद देवी लाल ने अपनी पगड़ी वी पी सिंह के सिर पर बांध दी. इसके बाद चंद्रशेखर ने आरोप लगाया कि वीपी सिंह धोखा देकर पीएम बन गए हैं.

ठाकुरों का नेता: चंद्रशेखर

वीपी सिंह और चंद्रशेखर का फर्क यही है कि वीपी सिंह के नाम पर भड़क जाने वाले संगठन अखिल क्षत्रिय महासभा के कार्यक्रमों में चंद्रशेखर की तस्वीर के बिना मंच नहीं सजता. चंद्रशेखर प्रधानमंत्री बनने से पहले कभी भी न किसी राज्य में न ही केंद्र में मंत्री रहे थे. वरिष्ठ पत्रकार केपी सिंह का मानना है कि चंद्रशेखर को वीपी सिंह के खिलाफ मंडल के बाद बने माहौल का फायदा मिला था. केपी के मुताबिक मीडिया या अन्य प्रभावशाली संस्थानों पर अगड़ी जातियों के लोगों का कब्जा था और मंडल के बाद वीपी सिंह को विलेन बनाने में इन्होने अहम भूमिका निभाई.

चंद्रशेखर छह महीने ही प्रधानमंत्री रहे और अगले लोकसभा चुनाव में 'चार महीने बनाम चालीस साल' का नारा दिया. हालांकि वो कुछ कमाल नहीं कर पाए. उनके केवल पांच सांसद जीत पाए थे, जिनमें से एक भी ऐसा नहीं था जो उनके नाम पर जीता हो. सब अपनी-अपनी जगह खुद मजबूत थे. जैसे एचडी देवगौड़ा, बेनीप्रसाद वर्मा और मुलायम सिंह अपनी अपनी सीटों पर जीत गए थे.

केपी सिंह लिखते हैं कि चंद्रशेखर के ठाकुर नेता होने को इस तरह समझिए कि 1991 के चुनाव में उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री के रूप में चंद्रशेखर के प्रचार के लिए गए मुलायम सिंह को बलिया में उनके समर्थक दबंग ठाकुरों ने सभा में जूते उल्टे करके दिखाए थे. मामला ये था कि जगन्नाथ चौधरी ने चंद्रशेखर को हराया था और चौधरी यादव (अहीर) थे. ऐसे में दबंग ठाकुरों ने इस बात का गुस्सा मुलायम सिंह यादव पर निकाला. इसी के बाद से चंद्रशेखर और मुलायम में दूरियां भी आ गईं. केपी के मुताबिक चंद्रशेखर ने जो लोकनायक जयप्रकाश नारायण को ठगा था जब वीपी सिंह ने उनके साथ वैसा ही किया तो वे काफी भड़क गए.

केपी सिंह के मुताबिक चंद्रशेखर के गुस्से का कारण ये भी था कि वीपी सिंह भी ठाकुर थे और उन्होंने पहले पीएम बनकर बाजी मार ली थी और वह ठाकुरों के कोई काम नहीं कराते थे. चंद्रशेखर का स्पष्ट मानना था कि जो अपनी जाति का नेता नहीं हो सकता वो इस देश का नेता कभी नहीं बन सकता. चंद्रशेखर शुरूआत में चाहे कुछ रहे हों लेकिन आखिर में उनकी परिणति ठाकुर नेता के रूप में स्थापित हुई. वह कहते हैं कि यह दुर्भाग्य की बात है कि कांशीराम जैसे महापुरुषों ने भी यह तथ्य जानने के बावजूद उनका साथ दिया. हालांकि मायावती ने इस मामले में काफी समझ बना ली थी और आज भी वे वीपी सिंह को याद करती हैं लेकिन चंद्रशेखर का नाम तक नहीं लेतीं.

ठाकुर राजनीति और राजा भैया

यूपी की ठाकुर राजनीति में बड़ा नाम है रघुराज प्रताप सिंह उर्फ राजा भैया का. ठाकुरों में उनकी पैठ है. मगर अब मुख्यमंत्री खुद ठाकुर हैं. जिससे राजपूत उनके पक्ष में गोलबंद हुआ है. यूपी के ही राजनाथ सिंह मोदी सरकार में नंबर दो की हैसियत में हैं. ऐसे में ज्यादातर राजपूतों का झुकाव बीजेपी के साथ नजर आता है. राजसत्ता से जुड़े परिवार में जन्मे राजा भैया ने अब जनसत्ता पार्टी बना ली है. हालांकि वे सपा और बीजेपी दोनों के करीबी रहे हैं पर 2018 के राज्यसभा चुनाव में बीजेपी का समर्थन किया तो सपा से रिश्ते खराब हो गए. राजा भैया प्रतापगढ़ के कुंडा विधानसभा क्षेत्र से विधायक हैं. महज 24 साल की उम्र में अपना राजनीतिक सफर शुरू किया था. 1993 से लगातार निर्दलीय विधायक रहकर रिकार्ड बना चुके हैं. वो कल्याण सिंह, राम प्रकाश गुप्ता, राजनाथ सिंह व मुलायम सिंह यादव के मुख्यमंत्रित्व काल में मंत्री रहे हैं. देखना है कि उनकी खुद की पार्टी कितना कामयाब होती है.

2019 में राजपूत कहां ?

बीजेपी ने राजपूत नेताओं को तवज्जो देना शुरू किया तो उसका उसे फायदा भी मिला. सीएसडीएस के एक सर्वे के मुताबिक 2014 के लोकसभा चुनाव में ठाकुरों का सबसे ज्यादा वोट बीजेपी ने ही पाया था. सेंटर फॉर द स्‍टडी ऑफ सोसायटी एंड पॉलिटिक्‍स के निदेशक प्रोफेसर एके वर्मा कहते हैं, "राजपूत शुरू से ही यह सोचते रहे हैं कि जो सत्ता में है उसके साथ रहना चाहिए. वो कांग्रेस में भी रहे हैं. बीएसपी में भी शॉर्ट टर्म के लिए कुछ राजपूतों का झुकाव हुआ था. इस समय राजपूत वोटर बीजेपी, सपा और कांग्रेस के साथ जुड़े नजर आते हैं.

बीजेपी 2019 में भी ठाकुरों को तवज्जो देकर चल रही है. बीजेपी ने यूपी के लिए जिन 40 स्टार प्रचारकों की सूची दी है उनमें चार राजपूत स्टार प्रचारक हैं. टिकट की बात करें तो बिजनौर से कुंवर भारतेंद्र सिंह, मुरादाबाद से कुंवर सर्वेश सिंह, एटा से राजवीर सिंह (लोध राजपूत), रायबरेली से दिनेश प्रताप सिंह, फ़र्रूख़ाबाद से मुकेश राजपूत, फैजाबाद से लल्लू सिंह, गोंडा से कीर्तिवर्धन सिंह, डुमरियागंज से जगदम्बिका पाल, बलिया से वीरेन्द्र सिंह मस्त को टिकट दिया है. कुछ और सीटों पर वो राजपूत उम्मीदवार उतार सकती है. जबकि कांग्रेस ने आंवला से कुंवर सर्वराज सिंह, अलीगढ़ से बिजेन्द्र सिंह, गौतमबुद्ध नगर से अरविन्द सिंह चौहान को उम्मीदवार बनाया है. देखना ये है कि ठाकुर वोटरों को कौन अपने पक्ष में करने में कामयाब होता है.

साथ में अंकित फ्रांसिस, ग्राफिक्स: अनिकेत

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Tags: BJP, Congress, Politics, Up ke vote bank, Yogi adityanath

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