संघर्ष से उपजे नेता हैं आजम खान फिर भी बोल कर फंसते रहे हैं विवादों में

रामपुर में नवाब खानदान की राजनीति को तोड़ा, जनता पार्टी से राजनीति शुरू की, समर्थकों में लोकप्रिय भी हैं लेकिन कई बार दे चुके हैं विवादास्पद बयान

News18 Uttar Pradesh
Updated: July 26, 2019, 1:24 PM IST
संघर्ष से उपजे नेता हैं आजम खान फिर भी बोल कर फंसते रहे हैं विवादों में
आजम खान ने इमरजेंसी के दौरान राजनीतिक संघर्ष की शुरुआती की थी.
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Updated: July 26, 2019, 1:24 PM IST
यूसुफ़ अंसारी

समाजवादी पार्टी के दिग्गज नेता आज़म ख़ान और विवाद, दोनों का चोली दामन का साथ है. उनके मुंह से बयान बाद में निकलता है, विवाद पहले शुरू हो जाता है. कई बार उनके बयान को लेकर विवाद होता है तो कई बार उनका अंदाज़-ए-बयां विवाद का विषय बन जाता है. गुरुवार को लोकसभा में पीठासीन अधिकारी रमा देवी को आज़म ख़ान की टिप्पणी बेहद नागवार गुजरी. उनकी टिप्पणी पर सदन में जमकर हंगामा हुआ और उसे सदन की कार्यवाही से निकालना पड़ा.

तीन तलाक विधेयक पर बहस के दौरान लोकसभा की कार्यवाही का संचालन कर रही पीठासीन अधिकारी रमा देवी को लेकर आज़म ख़ान ने जो बात कही और जिस अंदाज में कहीं उसे क़तई उचित नहीं ठहराया जा सकता. हैरानी की बात यह है कि आज़म ख़ान अपनी गलती मानने को तैयार नहीं थे. बात जब ज़्यादा बढ़ी तो उन्होंने लोकसभा से इस्तीफ़े तक की पेशकश कर दी. सदन में समाजवादी पार्टी के अध्यक्ष अखिलेश यादव उनका बचाव करते नज़र आए. साथ ही वो आज़म ख़ान को मामला यहीं ख़त्म करने को समझाते हुए दिखे.

लोकसभा चुनाव में जया प्रदा पर टिप्पणी से खड़ा किया विवाद

ठीक ऐसा ही रवैया आज़म ख़ान ने लोकसभा चुनाव के प्रचार के दौरान जयाप्रदा के बारे में की गई अपनी टिप्पणी को लेकर दिखाया था. तब भी वो यह मानने को तैयार नहीं थे कि उन्होंने कुछ ग़लत कहा है. जयप्रदा या किसी महिला की शान में ग़ुस्ताखी की है.



जयाप्रदा के बारे में दिए गए उनके बयान को लेकर चुनाव आयोग ने फटकार के साथ उनके प्रचार पर 72 घंटे की पाबंदी भी लगाई थी. आज़म खान के विवादित बयानों के फेहरिस्त इतनी लंबी है, जिसे देखकर उन्हें विवादित बयानों का बेताज बादशाह कहा जा सकता है.
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1976 में बने जनता पार्टी के रामपुर जिला अध्यक्ष
आजम खान का राजनीतिक सफर संघर्षों से भरा रहा है, इमरजेंसी के दौरान आजम खान ने जनता पार्टी से अपनी राजनीति की शुरुआत की थी. 1976 में वह रामपुर के जिला अध्यक्ष बने थे और उन्होंने रिक्शा वालों और रेहड़ी पटरी के दुकानदारों को लेकर रामपुर की सियासत पर बरसों से क़ाबिज़ नवाबों के वर्चस्व को चुनौती दी थी. मजबूत राजनीतिक इच्छाशक्ति और कड़े संघर्ष की बदौलत ही आज़म खान ने रामपुर में नवाबों के वर्चस्व को ख़त्म किया.



14 अगस्त 1948 को रामपुर के मोहल्ला घायर मीर बाज खान में जन्मे आज़म ख़ान ने छात्र जीवन में ही राजनीति में कदम रख दिया था. रामपुर के डिग्री कॉलेज से स्नातक की पढ़ाई पूरी करने के बाद वे अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी चले गए. वहां वकालत की पढ़ाई के दौरान उनकी सियासत में दिलचस्पी जगी और छात्र राजनीति में सक्रिय हो गए. 1976 में उन्होंने बाक़ायदा जनता पार्टी का दामन थाम लिया. ज़िला स्तर की राजनीति से होते हुए प्रदेश की सियासत की सीढ़ियां चढ़ी और लोकसभा में अपनी पार्टी की नुमाइंदगी कर रहे हैं.

5 साल के अंदर चुनाव जीतकर विधानसभा पहुंचे
सक्रिय राजनीति में उतरने के 5 साल के अंदर ही आज़म ख़ान विधानसभा में पहुंच गए थे. 1980 में उन्होंने रामपुर सीट से जनता पार्टी (सेकुलर) के टिकट पर चुनाव लड़ा और जीत दर्ज करने में कामयाब रहे. इस बीच जनता पार्टी एक के बाद एक ही टोटके की वजह से भी करती रही बिखरती रही, लेकिन आज़म ख़ान की जीत का सिलसिला नहीं रुका. 1985 में वह लोकदल के टिकट पर, 1989 में जनता दल के टिकट पर और 1991 में जनता पार्टी के टिकट पर चुनाव जीतते रहे.

शुरू हुआ मुलायम से दोस्ती का सिलसिला
1992 में जब मुलायम सिंह यादव ने समाजवादी पार्टी बनाई तो आजम खान इसके संस्थापक सदस्य के तौर पर पार्टी में शामिल हो गए. 1993 में हुए उत्तर प्रदेश के विधानसभा चुनाव में आज़म ख़ान सपा के टिकट फर रामपुर से जीत दर्ज की. हालांकि 1996 में उन्हें कांग्रेस के अफ़रोज अली खान के मुकाबले रामपुर में ही हार का सामना करना पड़ा. इस बीच 1996 से लेकर 2002 तक आज़म ख़ान राज्यसभा के सदस्य भी रहे. इस बीच धीरे-धीरे वे समाजवादी पार्टी का 'मुस्लिम चेहरा' बन गए. आज़म ख़ान की क़द्दावर शख्सियत का अंदाजा इसी से लगाया जा सकता है कि वो अबतक कुल 9 बार विधायक और 5 बार यूपी सरकार में मंत्री रह चुके हैं.

अमर सिंह से वर्चस्व की जंग
आज़म ख़ान लंबे समय तक मुलायम सिंह के सबसे क़रीबी और सबसे भरोसेमंद साथी रहे. लेकिन 1996 में पार्टी पर अमर सिंह के आने के बाद उनका वर्चस्व और जलवा कम होना शुरू हो गया था. अमर सिंह मुलायम सिंह यादव के दाहिने हाथ बन गए थे और उन्होंने एक-एक करके मुलायम के पुराने भरोसेमंद साथियों को किनारे लगा दिया था. अमर सिंह ने पार्टी में ऐसे हालात पैदा कर दिए थे कि आज़म खान को भी पार्टी छोड़नी पड़ी थी. हालांकि अमर सिंह के पार्टी छोड़ने के बाद वो पार्टी में वापस आ गए थे.



राजनीति गलियारों में यह चर्चा आम है कि लंबे समय तक विधायक और मंत्री रहने की वजह से आजम खान का मिज़ाज सख्त हो गया है. उनका लहज़ा भले ही नर्म रहता हो मगर वो बातें तीखी ही करते हैं. कई बार तो ऐसा लगता है कि वह बयान ही विवाद पैदा करने या विवाद को तूल देने के लिए देते हैं. हाल ही में उनके कुछ बयानों को इसी नज़रिए से देखा जाता है. लोकसभा चुनाव के दौरान जयाप्रदा के बारे में जो कुछ लोगों ने कहा था उसका मक़सद सांप्रदायिक ध्रुवीकरण करके अपनी जीत सुनिश्चित करना था.

हलाल चिकन से लेकर मॉब लिंचिंग मसले पर जुड़े विवाद
हाल ही में एक इंटरव्यू के दौरान आज़म ख़ान ने यह कहकर नए विवाद को जन्म दे दिया कि मॉब लिंचिंग के जरिए मुस्लिम नौजवानों को उनके पूर्वजों के पाकिस्तान नहीं जाने की सज़ा दी जा रही है. 1998 में आजम खान ने राज्यसभा में एक सवाल पूछ कर बड़ा बखेड़ा खड़ा कर दिया था. उन्होंने तब रेल मंत्री रहे नीतीश कुमार से लिखित सवाल के ज़रिए पूछा था की रेलवे की कैंटीन में परोसा जाने वाला मटन हलाल होता है या झटके का? इसके जवाब में जब नीतीश कुमार ने बताया कि रेलवे की सभी कैंटीन में 1925 के होटल अधिनियम के तहत हलाल मटन परोसा जाता है. इस पर एसएस आहलूवालिया ने तीखी प्रतिक्रिया करते हुए ज़ोरदार हंगामा किया था.

अहलूवालिया ने नीतीश पर आरोप लगाया था कि वह सिखों को उनकी धार्मिक भावनाओं के ख़िलाफ़ हलाल मटन खिला रहे हैं जबकि सिख धर्म की परंपरा के अनुसार वो झटके का मटन खाते हैं. इस पर नीतीश ने कहा था कि माननीय सदस्यों को सवाल पूछते वक्त लोगों की धार्मिक भावनाओं का ख्याल रखना चाहिए.

इसी तरह उनके एक बयान पर कई दिन बहस छिड़ी थी. उन्होंने कहा था कि करगिल की फतेह सेना के मुस्लिम जवानों की बदौलत हुई थी और मुसलमानों को इस देश में ग़द्दार ठहराया जाता है. आज़म ख़ान के ये कुछ ऐसे बयान हैं, जो उन्हें विवादित बयानों का बेताज बादशाह घोषित करने के लिए काफी हैं.

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First published: July 25, 2019, 9:12 PM IST
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