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लोकसभा चुनाव 2019 : तीसरे चरण में जयाप्रदा-आजम खान समेत इन दिग्गजों के बीच है टक्कर

लोकसभा चुनाव 2019 : तीसरे चरण में जयाप्रदा-आजम खान समेत इन दिग्गजों के बीच है टक्कर

कल है तीसरे चरण का मतदान

कल है तीसरे चरण का मतदान

लोकसभा चुनाव 2019 के तीसरे चरण में यूपी की 10 लोकसभा सीटों पर 23 अप्रैल को वोट डाले जाएंगे. इसमें मुरादाबाद, रामपुर, संभल, फिरोजाबाद, मैनपुरी, एटा, बदायूं, आंवला, बरेली और पीलीभीत सीट पर मतदान होगा.

    लोकसभा चुनाव 2019 के तीसरे चरण में 23 अप्रैल को यूपी की 10 लोकसभा सीटों पर वोट डाले जाएंगे. इस चरण में ज्यादातर सीटें समाजवादी पार्टी के गढ़ में हैं. इस चरण की हाई प्रोफाइल सीटों की बात करें तो मैनपुरी, रामपुर और पीलीभीत जैसी कई सीटें हैं. लेकिन सबसे रोचक मुकाबला फिरोजाबाद में है, जबकि राजनीतिक पारा रामपुर का भी चढ़ा हुआ है. इस चरण में जो चर्चित चेहरे हैं उनमें मुलायम सिंह यादव, वरुण गांधी, संतोष गंगवार, जयाप्रदा, आजम खान और धर्मेंद्र यादव प्रमुख हैं.

    मैनपुरी 
    मैनपुरी लोकसभा सीट से मुलायम सिंह यादव इस बार चुनाव मैदान में हैं. मैनपुरी को वोट गणित के हिसाब से देखें तो 17.3 लाख वोटरों में करीब 6 लाख से ज्यादा यादव हैं. दूसरे नंबर पर लोध वोटर हैं. इनकी संख्या करीब 5 लाख है और बीजेपी ने इसी पर दांव लगाया है. बीजेपी ने पिछले चुनाव में शिकस्त खाए प्रेम सिंह शाक्य को मैदान में उतारा है. पार्टी को उम्मीद है कि शाक्य वोटरों के साथ-साथ यादव छोड़ अन्य पिछड़े वर्ग के वोटर बीजेपी के पंरपरागत सवर्ण वोटर के साथ आते हैं तो मुलायम सिंह यादव को उनके गढ़ में चुनौती दी जा सकती है. लेकिन फिलहाल इस सीट पर बीजेपी उम्मीदवार मुलायम सिंह यादव को चुनौती देते नज़र नहीं आ रहे हैं.

    बरेली
    तीसरे फेज की हाई प्रोफाइल सीटों में बरेली भी है. बरेली बीजेपी की पंरपरागत सीट है. 2009 के लोकसभा चुनावों को छोड़ दें तो संतोष गंगवार 1989 से यहां से लगातार सांसद चुने गए हैं.  16 लाख से ज्यादा मतदाताओं वाली इस सीट पर 40 फीसदी से ज्यादा ओबीसी वोटर हैं, जबकि 21 फीसदी आबादी एससी मतदाता की है. इस सीट पर मुस्लिम और सवर्ण वोटर करीब 20-20 फीसदी हैं. इस सीट का जाति गणित और शहरी फैक्टर संतोष गंगवार के पक्ष में जाता है. लेकिन एसपी ने भगवत शरण गंगवार को उतारकर ओबीसी दलित और मुस्लिम वोटों के बहाने संतोष गंगवार को कड़ी चुनौती पेश की है. जबकि कांग्रेस प्रवीण सिंह ऐरन के बहाने 2009 का इतिहास दोहराने की कोशिश में लगी है.

    पीलीभीत 
    गांधी परिवार के दूसरे हिस्से की विरासत को यह सीट 1989 से संभाल रही है. 1991 के लोकसभा चुनाव को छोड़ दें तो 1989 से अब तक यह सीट मेनका गांधी या वरुण गांधी के पास ही रही. 1991 के चुनाव में मेनका गांधी बीजेपी उम्मीदवार से हार गई थीं. बात करें इस लोकसभा के जातीय समीकरण की तो इस इलाके में हिंदू वोटरों के साथ-साथ मुस्लिमों का भी ख़ासा प्रभाव है. इसलिए अक्सर यहां ध्रुवीकरण वाले बयान आते रहते हैं. करीब 17 लाख मतदाताओं वाली इस सीट पर 30 फीसदी मुस्लिम मतदाता हैं. इस सीट पर इस बार सीधा मुकाबला वरुण गांधी और एसपी के हेमराज वर्मा के बीच है.

    एटा 
    कहने को यह सीट मुलायम सिंह यादव के गढ़ में आती है. लेकिन पिछले दो चुनावों में इस सीट पर कल्याण सिंह परिवार का कब्जा रहा है. 2009 में बीजेपी से नाराज कल्याण सिंह अपनी पार्टी बनाकर इस सीट से लोकसभा पहुंचे थे तो 2014 में उनके बेटे राजवीर बीजेपी के टिकट पर यहां से सांसद चुने गए. 2019 के लोकसभा चुनाव में इस सीट पर मुख्य मुकाबला बीजेपी के राजवीर सिंह और एसपी के देवेंद्र सिंह यादव में है. करीब 16 लाख मतदाताओं वाली इस सीट पर सबसे ज्यादा ढाई लाख वोटर लोध राजपूत हैं और करीब इतने ही शाक्य मतदाता हैं. कल्याण सिंह का यही बेस वोट बैंक है. जबकि ढाई लाख मतदाता यादव जाति के हैं. जिसके दम पर एसपी यहां लगातार दो लोकसभा चुनाव जीती थी.

    फिरोजाबाद
    तीसरे चरण का सबसे दिलचस्प मुकाबला फिरोजाबाद में देखने को मिल रहा है. यहां चाचा शिवपाल यादव का मुकाबला भतीजे अक्षय यादव से है. दोनों के लिए यह सीट प्रतिष्ठा का सवाल बनी हुई है और बीजेपी यादव परिवार की आपसी लड़ाई के बहाने इस सीट पर कब्जा जमाने की कोशिश में है. बीजेपी ने इस बार लोध राजपूत जाति के चंद्रसेन को उम्मीदवार बनाया है. इस सीट का जातिगत गणित देखें तो 16 लाख से ज्यादा मतदाताओं वाली इस सीट पर 5 लाख के करीब यादव वोटर हैं, जबकि करीब तीन लाख लोध वोटर हैं. यानि करीब आधे वोटर इन दो जातियों से हैं. ऐसे में अगर यादव वोट चाचा-भीतेजे में बंटता है तो बीजेपी को जरूर इसका फायदा मिलेगा.

    बदायूं 
    तीसरे चरण में मुलायम परिवार का गढ़ समझी जाने वाली बदायूं सीट पर एसपी के कद्दावर नेता धर्मेंद्र यादव का मुकाबला राज्य सरकार के ताकतवर मंत्री स्वामी प्रसाद मौर्या की बेटी संघप्रिया से है. करीब 18 लाख से ज्यादा मतदाताओं वाली इस सीट पर यादव और मुस्लिम मतों का वर्चस्व है. यादव और मुस्लिम दोनों की आबादी करीब-करीब 15-15 फीसदी है. इन दोनों को मिलाकर करीब साढ़े पांच लाख वोट होते हैं. यही वोटर एसपी की ताकत भी हैं. संघमित्रा 2014 में बीएसपी के टिकट पर मुलायम सिंह यादव के खिलाफ चुनाव लड़ी थीं और उनके खिलाफ विवादास्पद बयान देकर चर्चा में आई थीं.

    मुरादाबाद
    मशहूर शायर इमरान प्रतापगढ़ी को उतारकर कांग्रेस ने मुरादाबाद की लड़ाई को भी दिलचस्प बना दिया है. इस सीट पर 2014 की मोदी लहर में भारतीय जनता पार्टी का पहली बार खाता खुला था. बीजेपी के सर्वेश सिंह ने एसपी के एसटी हसन को करीब 87 हजार वोटों से हराया था. बीएसपी के हाजी मोहम्मद याकूब को 1 लाख, 60 हजार से ज्यादा वोट मिले थे.  45 फीसदी मुस्लिम मतदाताओं वाली सीट पर बीजेपी इस बार भी इन वोटों में बिखराव के सहारे जीत का रास्ता लाश रही है. बीजेपी ने इस सीट पर सांसद सर्वेश सिंह को दोबारा मैदान में उतारा है तो एसपी से एसटी हसन मैदान में हैं.

    रामपुर
    रामपुर का रण भी इस बार दिलचस्प है. यहां कभी एसपी का चेहरा रहीं जयाप्रदा बीजेपी की उम्मीदवार हैं. वहीं, उनका मुकबला एसपी के सबसे विवादित नेता आजम खान से है. संजय कपूर इस सीट से कांग्रेस के उम्मीदवार हैं, लेकिन मुख्य मुकाबला आजम खान बनाम जयाप्रदा है. 16 लाख से ज्यादा मतदाताओं वाली इस सीट पर 50 फीसदी से ज्यादा मुस्लिम वोटर हैं. इस सीट का इतिहास देखें तो एसपी यहां मजबूत दिखती है. 2014 की मोदी लहर में भी बीजेपी सिर्फ 23 हजार वोटों से जीत पाई थी. जबकि कांग्रेस के नबाब नाजि़म अली को डेढ़ लाख से ज्यादा वोट मिले थे. बीएसपी के अकबर हुसैन को 81 हजार वोट मिले थे. ऐसे में किसी दूसरी बड़ी पार्टी से मुस्लिम उम्मीदवार का ना होना जयाप्रदा की लड़ाई को और  मुश्किल बना रहा है.

    संभल
    संभल लोकसभा सीट भी यादव परिवार का गढ़ मानी जाती है. इस सीट से मुलायम सिंह यादव दो बार सांसद चुने गए, जबकि उनके भाई राम गोपाल यादव भी एक बार यहां से सांसद रहे. 2014 की मोदी लहर में बीजेपी यह सीट 5 हजार से कुछ ज्यादा वोटों से जीत गई थी. 2014 से पहले इस सीट पर बीजेपी कभी भी चुनाव नहीं जीत पाई है. बात करें इस सीट के जातीय गणित की तो करीब 20 लाख वोटरों में 9 लाख के आसपास मुस्लिम और 4 लाख दलित वोटरों के साथ इस सीट पर एसपी-बीएसपी गठबंधन का पलड़ा भारी दिख रहा है. इस सीट से एसपी के शफीकुर्रहमान वर्क का मुकाबला बीजेपी के परमेश्वर लाल सोनी से है. बीजेपी की नजर कांग्रेस के फजले मसूद के बहाने मुस्लिम वोटों के बिखराव पर है. पिछली जीत भी बीजेपी को एसपी-बीएसपी के बीच मुस्लिम वोटों के बिखराव से ही मिली थी.

    आंवला
    आंवला लोकसभा सीट 2009 में सबसे ज्यादा चर्चा में रही थी. तब इस सीट पर मेनका गांधी बीजेपी के टिकट पर लोकसभा के लिए चुनी गई थीं. जबकि 2014 में बीजेपी के धर्मेंद्र कुमार ने इस सीट से एसपी के कुंवर सर्वराज सिंह को 2 लाख, 38 हजार से ज्यादा वोटों से हराया. इस बार बीजेपी ने फिर सांसद धर्मेंद्र कुमार पर दांव लगाया हैं, जबकि बीएसपी से रुचि वर्मा उम्मीदवार हैं. पाला बदलकर कांग्रेस में आए सर्वराज सिंह यहां की लड़ाई को त्रिकोणीय बना रहे हैं.

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