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रामपुर उपचुनाव में बीजेपी के लिए जीत और हार के ये होंगे मायने!

Manish Kumar | News18 Uttar Pradesh
Updated: October 22, 2019, 1:45 PM IST
रामपुर उपचुनाव में बीजेपी के लिए जीत और हार के ये होंगे मायने!
रामपुर सीट पर योगी आदित्यनाथ और अजं खान दोनों की प्रतिष्ठा दांव पर है

रामपुर (Rampur) में बीजेपी (BJP) को जीत मिले या हर बार की तरह हार, दोनों ही मामलों में ये नतीजा राष्ट्रीय स्तर पर सुर्खियां बटोरेगा.

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लखनऊ. प्रदेश में 11 सीटों पर उपचुनाव (By Election) के लिए 21 अक्टूबर को मतदान शांतिपूर्ण ढंग से संपन्न हो गया. अब इन्तजार है 24 अक्टूबर को आने वाले नतीजों का. लेकिन सबकी जुबान पर एक ही सवाल है कि रामपुर (Rampur) में क्या होगा? क्या इस बार आजम खान (Azam Khan) का किला ध्वस्त हो पायेगा, जिसपर पिछले तीन दशकों से उनका कब्जा रहा है. बीजेपी (BJP) के लिए 11 में से हर सीट अहम है लेकिन, रामपुर में बीजेपी को जीत मिले या हर बार की तरह हार, दोनों ही मामलों में ये नतीजा राष्ट्रीय स्तर पर सुर्खियां बटोरेगा.

बता दें कि रामपुर में 65 फीसदी आबादी मुस्लिमों की है और इस सीट से कभी कोई हिन्दू कैंडिडेट जीत नहीं पाया. बीजेपी ने भारत भूषण गुप्ता को चुनाव लड़ाया है. ऐसे में गुप्ता की जीत को बीजेपी हिंदू-मुस्लिम भाईचारे को नये तरीके से परिभाषित कर सकेगी.

बीजेपी जीती तो मुस्लिम मतदाताओं के बीच के रिश्तों पर होगी नई बहस

रामपुर में यदि बीजेपी जीत गयी तो पार्टी ये और भी मजबूत तरीके से राष्ट्रीय स्तर पर बोल सकेगी कि मुस्लिमों और बीजेपी के रिश्ते पर जो डिबेट देश में चलती रहती है वो निराधार है. बीजेपी इस बात को नेशनल लेवेल पर प्रचारित कर सकेगी कि अब वो ज़माना लद गया जब मुस्लिम मतदाता बीजेपी को दुश्मन नंबर एक मानता था. खासकर यूपी में.

छद्म धर्मनिरपेक्षता का चेहरा बेनकाब होगा

बीजेपी हमेशा से ये कहती रही है कि जो पार्टियां अपने आप को मुस्लिमों का खैरख्वाह बताती हैं, दरअसल वे सिर्फ वोट बैंक के तौर पर उनका इस्तेमाल करती रही हैं. रामपुर में जीतने के बाद पार्टी अपने इस स्टैंड को और भी मजबूती से कहना शुरु करेगी. उसके पास ये कहने का पुख्ता आधार होगा कि मुस्लिम बाहुल्य सीट पर उसकी जीत ये बताती है कि बाकी पार्टियों का चरित्र छद्म निरपेक्ष वाला फिर से साबित हो गया है.

बीजेपी के प्रवक्ता मनीष शुक्ला ने कहा कि रामपुर में हमारी जीत साम्प्रदायिक राजनीति के मुंह पर जोर का तमाचा होगी. इससे ये साफ हो जायेगा कि साम्प्रदायिकता के सहारे अब यूपी में भी जीत नहीं मिलेगी.
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ट्रिपल तलाक एक्ट को कानूनी के साथ सामाजिक मंजूरी भी

ट्रिपल तलाक के खिलाफ कानून को बीजेपी मुस्लिम महिलाओं के उद्धार का द्वार बताती है लेकिन, मुस्लिम समुदाय में इसका विरोध होता रहा है. यदि बीजेपी रामपुर की सीट जीत गयी तो उसके पास ये कहने का आधार होगा कि ट्रिपल तलाक से मुस्लिम समुदाय में बीजेपी के प्रति सोच किस हद तक बदल गई है. रामपुर में मिली जीत इसका प्रत्यक्ष प्रमाण होगा.

लेकिन, यदि रामपुर की सीट बीजेपी हार गयी तो

नतीजे के तुरंत बाद सबसे पहले यही बात कही कि भले ही आज़म खान के खिलाफ मुकदमा वहीं के बाशिन्दों ने दर्ज कराया हो लेकिन, इसके पीछे योगी सरकार ही रही है. दूसरी तरफ समाजवादी पार्टी और खुद आजम खान को ये कहने का मौका मिल जायेगा कि यूपी की जनता अब अन्याय को सहने के लिए तैयार नहीं है.

आज़म खान का राष्ट्रीय स्तर पर बढ़ेगा कद

बीजेपी की हार में ही इस बार आज़म खान की सबसे बड़ी जीत छुपी है. उनके लिए ऐसा चक्रव्यूह भी तो पहली बार ही रचा गया है. सिर्फ राजनीतिक नहीं बल्कि सामाजिक तौर पर भी आज़म को जबरदस्त फायदा पहुंचेगा. आज़म खान को ये सही साबित करने का एक बड़ा मौका मिल जायेगा कि वे पाक - साफ हैं और योगी सरकार ने उन्हें निशाना बनाकर मुस्लिमों को डराने का प्रयास किया लेकिन, वे डरने वाले नहीं क्योंकि जनता उनके साथ है. सांसद होने के चलते वे जरूर संसद में अपने भाषणों के दौरान इसे बोलते सुने जायेंगे.

यूपी की राजनीति ध्रुवीकरण से संचालित होने का दावा

बीजेपी की रामपुर में हार हो गई तो इसका आरोप फिर से यूपी की जातीय और साम्प्रदायिक राजनीति के सिर मढ़ा जा सकेगा. ये कहा जा सकेगा कि अमेठी में राहुल गांधी को हराना संभव है, लेकिन साम्प्रदायिक राजनीति के कारण रामपुर में ये संभव नहीं हुआ. रामपुर की अब तक की राजनीति इसे पुष्ट भी करती है. यहां से कभी कोई गैर मुस्लिम विधायक नहीं बन सका है.

साकेत डिग्री कॉलेज में प्रोफेसर अनिल सिंह ने कहा कि रामपुर में बीजेपी की जीत हो या हार पार्टी इसे अपने ही पक्ष में भुनाने की कोशिश करेगी. यदि पार्टी की जीत होगी तो वो कह सकेगी कि अब प्रदेश में साम्प्रदायिक राजनीति नहीं चलेगी लेकिन, यदि हार गई तो उसे ये कहने का मौका मिलेगा कि साम्प्रदायिक राजनीति से उपर उठना अभी बाकी है. यानी बीजेपी के दोनों ही हाथों में लड्डू हैं.

12 परसेंट कम वोट पड़े

बता दें कि रामपुर में इस उपचुनाव में 2017 के विधानसभा चुनाव के मुकाबले 12 परसेंट कम वोट पड़े हैं. इसकी कई तरह से समीक्षा की जा रही होगी लेकिन, ये सच है कि रामपुर में वोटिंग कम हो या ज्यादा जीत आज़म खान की होती रही है. यही वजह है कि बीजेपी के लिए रामपुर की सीट सबसे बड़ी चुनौती है.

वैसे रामपुर में मिली हार को भी बीजेपी अपनी जीत के तौर पर ही प्रचारित करेगी. इसका पुख्ता कारण है उसके पास. 2017 के विधानसभा चुनाव को छोड़ दें तो इस विधानसभा सीट पर बीजेपी हमेशा तीसरे, चौथे या पांचवें पोजिशन पर रही है. 2017 के चुनाव में करिश्मा दिखाते हुए पार्टी ने सेकेंड पोल किया. वो भी तब जब उसके कैंडिडेट के सामने आजम खान खुद चुनाव मैदान में थे. इस बार तो उनकी पत्नी तज़ीन फात्मा हैं. दूसरी तरफ अमेठी में राहुल गांधी को हराने के बाद अब उसे तनिक भी ये नहीं महसूस होता कि अमूक सीट नहीं जीती जा सकती. इससे उसके हौसले बुलंद हैं. बीजेपी के लिए उम्मीद की एक और किरण दिखाई दे रही है. रामपुर में सपा, बसपा और कांग्रेस ने मुस्लिम उम्मीद्वार उतारे हैं. एकलौती बीजेपी ऐसी पार्टी है जिसने गैर मुस्लिम उम्मीद्वार उतारा है. ऐसे में उसे उम्मीद है कि हिन्दू वोट तो उसे 100 परसेन्ट मिलेगा ही. यदि मुस्लिम वोटों में थोड़ी भी सेंधमारी हो गयी तो किला फतह. दूसरी ओर पार्टी को लगता है कि मुस्लिम वोटों के कई पार्टियों में डिवीजन से भी उसे फायदा मिलेगा.

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First published: October 22, 2019, 1:45 PM IST
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