क्या 2019 चुनाव में कांग्रेस गठबंधन को मिलेगा 'रावण' का साथ?

सहारनपुर जेल से भीम सेना के अध्यक्ष की रिहाई के बाद शुक्रवार को आया बयान काफी दिलचस्प था. जिसमें उनका बीजेपी विरोध साफ तौर पर झलकता दिखा.

News18.com
Updated: September 15, 2018, 8:31 PM IST
क्या 2019 चुनाव में कांग्रेस गठबंधन को मिलेगा 'रावण' का साथ?
उम्मीद जताई जा रही है कि पश्चिमी यूपी में कांग्रेस को आजाद का साथ मिल सकता है
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Updated: September 15, 2018, 8:31 PM IST
प्रांशु मिश्रा

उत्तर प्रदेश की राजनीतिक बिसात पर भीम आर्मी अध्यक्ष चंद्रशेखर आजाद 'रावण' की रिहाई ने नए समीकरणों की जमीन तैयार कर दी है. यह युवा नेता केवल बीजेपी के लिए ही नहीं, बल्कि अन्य विपक्षी दलों के लिए भी खतरा है. फिलहाल ऐसा लग रहा है कि बीएसपी और एसपी के गढ़ में रावण की राजनीतिक पैंतरेबाजी का फायदा कांग्रेस को मिल सकता है. सहारनपुर जेल से भीम आर्मी के अध्यक्ष की रिहाई के बाद शुक्रवार को आया बयान काफी दिलचस्प था. जिसमें उनका बीजेपी विरोध साफ तौर पर दिखा.

न्यूज18 के पास एक वीडियो है जिसमें आजाद पश्चिमी उत्तर प्रदेश में कांग्रेस के कद्दावर नेता इमरान मसूद के साथ नजर आ रहे हैं. मसूद यूपी कांग्रेस के उपाध्यक्ष भी हैं. उन्होंने आजाद की रिहाई के तुरंत बाद पार्टी के विधायकों मसूद अख्तर और नरेश सैनी के साथ सहारनपुर के एक गांव में उनसे मुलाकात की थी. इन नेताओं की मुलाकात की खबर पार्टी अध्यक्ष राहुल गांधी समेत कई शीर्ष नेताओं को जरूर होगी.

वीडियो में आजाद कहते हैं, 'इमरान मेरे भाई की तरह है. मैं उसके लिए अपना जीवन त्याग सकता हूं. वह जिस पार्टी में रहेंगे मैं उनके साथ रहूंगा. उन्होंने जो बलिदान दिए हैं उन्हें भुलाया नहीं जा सकता है. आज के समय में SC-मुस्लिम एकता की सख्त जरूरत है. हम इसके लिए प्रयास करेंगे.'

इस पर राजनीतिक विशेषज्ञों का कहना है कि यह बैठक इस बात की गवाही है कि 'रावण' शीर्ष कांग्रेस नेतृत्व के संपर्क में हैं. जब वह जेल में थे, तब भी उन्होंने कांग्रेस को बसपा से बेहतर बताया था. सभी को मालूम है कि 2019 लोकसभा चुनाव में सीट बंटवारे को लेकर कांग्रेस और बीएसपी के बीच बातचीत चल रही है.

दरअसल, हाल ही में 10 सितंबर के भारत बंद के दौरान बसपा और सपा ने कांग्रेस का खुलकर समर्थन नहीं किया था. जबकि दोनों पक्ष दिल्ली में राहुल गांधी के नेतृत्व वाले विरोध में शामिल होने से भी बचते दिखे. जबकि मायावती ने ईंधन की कीमतों में वृद्धि के मुद्दे पर बोलते हुए मोदी सरकार और मनमोहन सिंह की अगुवाई वाली यूपीए-2 की सरकार को एक समान करार दिया.
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भीम सेना प्रमुख ने गैर-बीजेपी दलों से 2019 के चुनावों से पहले गठबंधन में शामिल होने की अपील की है. इससे ऐसा लगता है कि यह युवा नेता प्रस्तावित मोर्चे में एक स्वतंत्र भूमिका निभाने का इरादा रखते हैं. जाति विशेष को ध्यान में रखते हुए वह बसपा के खिलाफ खड़े होने की स्थिति में नहीं हैं, लेकिन गठबंधन में शामिल होकर वह राजनीतिक भूमिका निभा सकते हैं.
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इसमें कोई संदेह नहीं है कि रावण की राजनीतिक आक्रामकता बीएसपी के लिए चिंता का कारण होगा. भीम सेना पश्चिम यूपी में सक्रिय है, मायावती उसे अनदेखा नहीं कर सकती हैं. क्योंकि वह उसी उप जाति से हैं, जिससे मायावती संबंध रखती हैं. इसलिए मायावती कांग्रेस के साथ गठबंधन की डोर बहुत मजबूत नहीं रखेगीं.

वहीं समाजवादी पार्टी के लिए भी आजाद का SC-मुस्लिम एकता पर बहुत अधिक जोर, चिंता का कारण होगा. अगर आजाद वास्तव में मजबूत होते हैं, तो समाजवादी पार्टी के अल्पसंख्यक समर्थन के राजनीतिक विश्वास को भी आघात पहुंच सकता है. कैराना में एससी-मुस्लिम एकता इसका जीता जागता उदाहरण है.


कैराना लोकसभा के उपचुनाव में भाजपा के खिलाफ पहला मुस्लिम उम्मीदवार जीता था. इस चुनाव में भीम आर्मी ने आक्रामक रूप से जमीनी स्तर पर काम किया था और आरएलडी, एसपी और बसपा के संयुक्त उम्मीदवार का समर्थन किया था.

पश्चिम उत्तर प्रदेश के कई जिलों में, अनुसूचित जाति और मुसलमान एक मजबूत वोट प्रतिशत में हैं. सहारनपुर, बिजनौर, अलीगढ़, बुलंदशहर और आगरा में अनुसूचित जाति का वोट प्रतिशत 22% और मुस्लिम वोट प्रतिशत लगभग 20% फीसदी है. इसी तरह, मुजफ्फरनगर, मेरठ, बागपत, गाजियाबाद और गौतमबुद्ध नगर समेत आस पास के अन्य क्षेत्रों में भी अनुसूचित जाति-मुस्लिम वोट प्रतिशत निर्णायक है.

जहां तक बीजेपी की बात है तो आजाद के अनुसूचित जाति-मुस्लिम एकता पर जोर से उसे मदद मिल सकती है. हालांकि यह कहना अभी जल्‍दबाजी होगी लेकिन बीजेपी नेताओं का मानना है कि आजाद के चलते उच्‍च जातियों के वोटर लामबंद हो सकते हैं, विशेष तौर पर पश्चिमी यूपी में. एससी-एसटी एक्‍ट में संशोधन के चलते सवर्ण बीजेपी से नाराज हैं.
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