सोनभद्र हत्याकांड: मौत से कम तकलीफदेह नहीं हैं घायलों को लगे छर्रे

दिलो दिमाग में तो खौफ बरकरार है ही, शरीर पर लगे जख्मों का भी ठीक से नहीं हो पा रहा है इलाज

RajKumar Pandey | News18 Uttar Pradesh
Updated: July 19, 2019, 10:49 AM IST
सोनभद्र हत्याकांड: मौत से कम तकलीफदेह नहीं हैं घायलों को लगे छर्रे
सोनभद्र हत्याकांड: आज भी बहुत सी बुनियादी सुविधाओं से वंचित ज्यादातर लोगों के पास खेती और मजदूरी ही दो जून की रोटी का जरिया है
RajKumar Pandey | News18 Uttar Pradesh
Updated: July 19, 2019, 10:49 AM IST
सोनभद्र को मिर्जापुर से अलग कर जिला तो बना दिया गया है, लेकिन इस पूरे इलाके में जिंदगी पहाड़ों जैसी कठिन है. बुनियादी सुविधाएं तकरीबन नहीं के बराबर हैं. अस्पताल बन गए तो डॉक्टर नहीं हैं. अगर गाहे-बगाहे डॉक्टर आ जाते हैं तो उनके पास वो टेक्निकल सुविधाएं नहीं है जो गंभीर हादसों के वक्त किसी की जान बचाने के लिए जरूरी होती हैं.

तकनीकी सुविधाओं का घोर अभाव
इसका सुबूत बुधवार को उस वक्त भी मिला जब घोरावल इलाके के उम्भा गांव में जमीन के मामले में गोलियों से घायल लोगों को जिला अस्पताल ले जाया गया. अस्पताल में जरूरी सुविधाएं न होने के कारण 5 को तुरंत बनारस रेफर कर दिया गया, जिसमें एक की मौत हो गई. बाकी 21 को अस्पताल में इलाज के लिए रखा तो गया है लेकिन अभी भी उन्हें पर्याप्त इलाज नहीं मिल सका. जानकार बताते हैं कि दरअसल यहां के जिला अस्पताल में डॉक्टर समेत टेक्निकल सुविधाओं का घोर अभाव है.

इस अभाव के कारण गुरुवार शाम तक बहुत से घायलों के शरीर से छर्रे तक नहीं निकाले जा सके थे. सोनभद्र के पत्रकार शांतनु मुखर्जी के मुताबिक जिला अस्पताल की जो दशा है उसमें लोग जल्दी इलाज के लिए वहां जाना नहीं चाहते. अगर किसी मजबूरी में जाना भी पड़ गया तो लोगों को पर्याप्त इलाज नहीं मिल पाता.

करना पड़ा वाराणसी रेफर
इस कारण जब किसी को दुर्घटना के बाद जिला अस्पताल ले जाया जाता है तो वहां से प्राथमिक उपचार करके लोगों को बनारस के लिए ही रेफर किया जाता है. इस मामले में भी 5 लोगों को बनारस के ट्रॉमा सेंटर रेफर किया गया. वहां तक जाते-जाते एक व्यक्ति की मृत्यु हो गई. चार का वहां इलाज चल रहा है.

कुदरत ने इस इलाके को पत्थरों और दूसरे खनिजों का उपहार दिया है. उसका उपयोग करने के लिए यहां कुछ फैक्टरियां भी लगाई गईं. जैसे चुर्क में सिमेंट फैक्टरी है. सोनभद्र का जिक्र आता है एनटीपीसी की भी चर्चा बड़े ही गर्व से की जाती है. लेकिन इन फैक्टरियों से यहां आस-पास के लोगों के जीवन में सीधा कोई बदलाव नहीं आया.
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यहां के पिछड़ेपन को रेखांकित करते हुए शांतनु कहते हैं, 'इतनी बड़ी संख्या में गाड़ियों का आना-जाना भी गांव के लोगों ने शायद इस दुखद हादसे के बाद ही देखा हो. या फिर चुनावों के दौरान नेताओं की गाड़ियों के काफिले को देखा होगा.'

प्राइमरी के आगे स्कूल नहीं
जिले के संवाददाता अनूप कुमार बताते हैं, 'जिस गांव उम्भा में ये घटना हुई है, वो राबर्ट्सगंज यानी जिला मुख्यालय से 70 किलोमीटर दूर है. वहां एक प्राइमरी स्कूल तो हैं लेकिन उससे आगे पढ़ना हो तो 20 किलोमीटर दूर किसी कस्बे तक जाना पड़ता है.' ज्यादातर लोग खेती-बाड़ी के जरिए अपना जीवन यापन करते हैं या फिर कहीं जाकर मजदूरी. अगर कोई बारहवीं के आगे पढ़ना चाहता है तो उसे सरकारी कॉलेज के लिए तकरीबन 100 किलोमीटर जाना पड़ेगा.

इस तरह के पिछड़े किसी गांव में जमीन खरीदना एक अधिकारी के लिए तो बहुत ही आसान रहा होगा. जबकि उसी जमीन से दो जून की रोटी का जुगाड़ करने वालों के लिए अपना हक छोड़ना उतना ही कठिन रहा होगा. इसी का नतीजा है कि गांव के दस लोगों की जाने चली गईं. पथरीले सोनांचल के इन गांवों के बहुत से परिवारों के जीवन की राह और पथरीली हो गई.
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First published: July 18, 2019, 5:58 PM IST
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