'इंकलाब जिंदाबाद' का नारा देने वाले मौलाना हसरत ने भी अनुच्छेद 370 का किया था विरोध

ये वही मौलाना हसरत मोहानी हैं, जिन्होंने जंग-ए-आज़ादी के दौरान 'इंक़लाब जिंदाबाद' का मशहूर नारा दिया था. पूरी आज़ादी की लड़ाई में इस नारे की धूम रही.

News18 Uttar Pradesh
Updated: August 6, 2019, 9:47 AM IST
'इंकलाब जिंदाबाद' का नारा देने वाले मौलाना हसरत ने भी अनुच्छेद 370 का किया था विरोध
मौलाना ने भी किया था विरोध
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Updated: August 6, 2019, 9:47 AM IST
मोदी सरकार ने बीजेपी के मूल एजेंडे को अमलीजामा पहनाते हुए संविधान के अनुच्छेद 370 को बेअसर कर के इसके तहत जम्मू-कश्मीर को मिला विशेष दर्जा खत्म कर दिया है. इतना ही नहीं राज्य को दो हिस्सों में बांट कर पूर्ण राज्य का दर्जा ख़त्म करके दो नए केंद्र शासित प्रदेश बना दिए हैं. गृहमंत्री अमित शाह ने इस बाबत राष्ट्रपति रामनाथ कोविंद की तरफ से जारी की गई अधिसूचना को राज्यसभा में पढ़कर सुनाया. विपक्ष की तरफ से उनका विरोध हुआ. मोदी सरकार के इस फ़ैसले को कहीं न कहीं हिंदू-मुस्लिम के के चश्मे से भी देखा जा रहा है, लेकिन बहुत कम लोग यह बात जानते हैं कि संविधान सभा में अनुच्छेद 370 संविधान में जोड़े जाते वक़्त मशहूर शायर, दार्शनिक, इस्लामी विद्वान और आज़ादी की लड़ाई के मज़बूत सिपाही मौलाना हसरत मोहानी ने इसका पुरज़ोर विरोध किया था. उनके विरोध ने पंडित नेहरू की सरकार में कश्मीर मामले देख रहे गोपालस्वामी अय्यंगर की बोलती बंद कर दी थी.

मौलाना हसरत ने जंग-ए-आज़ादी के दौरान 'इंक़लाब जिंदाबाद' का मशहूर नारा दिया था
जी हां, ये वही मौलाना हसरत मोहानी हैं, जिन्होंने जंग-ए-आज़ादी के दौरान 'इंक़लाब जिंदाबाद' का मशहूर नारा दिया था. पूरी आज़ादी की लड़ाई में इस नारे की धूम रही. बल्कि आज भी लोगों के सिर चढ़कर बोलता है. आज भी सत्ता विरोधी प्रदर्शनों में यही नारा लगाया जाता है. हसरत मोहानी संविधान सभा में संयुक्त प्रदेश यानी आज के उत्तर प्रदेश का प्रतिनिधित्व कर रहे थे. संविधान के कई अनुच्छेदों पर उनकी राय को बहुत गंभीरता से लिया गया. जब कश्मीर को विशेष दर्जा देने के लिए अनुच्छेद 370 पर संविधान सभा में विचार-विमर्श शुरू हुआ तो उस वक्त इस अनुच्छेद का विरोध करने वाले मौलाना हसरत मोहानी अकेले थे. यह अलग बात है कि सरकार की तरफ से इस अनुच्छेद को जोड़े जाने की ज़िद के बाद मौलाना तीखा विरोध जताकर ख़ामोश हो गए थे.

पंडित नेहरू ने शेख अब्दुल्ला को इस विषय पर बात करने के लिए डॉक्टर अंबेडकर के पास भेजा

17 अक्टूबर 1949 को कश्मीर मामले देख रहे नेहरू सरकार के मंत्री गोपालस्वामी आयंगर ने भारत की संविधान सभा में अनुच्छेद 306(ए) वर्तमान अनुच्छेद 370 प्रस्तुत किया था. ग़ौरतलब है कि डॉ. बी आर अंबेडकर की अध्यक्षता में गठित की गई समिति ने संविधान का जो मूल ड्राफ्ट संविधान सभा में पेश किया था उसमें यह अनुच्छेद 306(ए) शामिल नहीं था. डॉक्टर अंबेडकर ने इस अनुच्छेद के बारे में संविधान सभा में हुई बहस में एक शब्द भी नहीं बोला. लेकिन जब पंडित नेहरू ने शेख अब्दुल्ला को इस विषय पर बात करने के लिए डॉक्टर अंबेडकर के पास भेजा तो डॉक्टर अंबेडकर ने साफ तौर पर शेख अब्दुल्ला से कहा, 'आप यह चाहते हैं कि भारत कश्मीर की रक्षा करे, कश्मीरियों को पूरे भारत में समान अधिकार हो, पर भारत और भारतीयों को आप कश्मीर में कोई अधिकार नहीं देना चाहते. मैं भारत के कानून मंत्री की हैसियत से अपने देश के साथ इस प्रकार की धोखाधड़ी और विश्वासघात में शामिल नहीं हो सकता.'

महावीर त्यागी ने तीन संशोधन ज़रूर प्रस्तावित किए थे
संविधान सभा में इस अनुच्छेद पर हुई बहस में गोपाल स्वामी आयंगर और मौलाना हसरत मोहानी के अलावा किसी और ने हिस्सा नहीं लिया था. यहां तक कि जम्मू कश्मीर से चुने गए 4 सदस्य वहां मौजूद होते हुए भी खामोश रहे थे. संयुक्त प्रांत यानी मौजूदा उत्तर प्रदेश की तरफ से एक और सदस्य महावीर त्यागी ने तीन संशोधन ज़रूर प्रस्तावित किए थे. लेकिन बाद में उन्हें वापस ले लिया था. जब गोपाल स्वामी आयंगर ने इस अनुच्छेद को संविधान में शामिल करने का प्रस्ताव किया तो मौलाना हसरत मोहानी उन्हें तुरंत खड़े होकर टोकते हुए पूछा,  'यह भेदभाव वाला अनुच्छेद क्यों संविधान में जोड़ा जा रहा है.' हसरत मोहानी के एक लाइन के इस ऐतराज़ के जवाब में स्वामी आयंगर को लंबी चौड़ी सफाई पेश करनी पड़ी.
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बाक़ी नेताओं ने चुप करा दिया था
संविधान सभा में इस अनुच्छेद को पेश करने से कुछ ही दिन पहले हुई कांग्रेस कार्यसमिति की बैठक में भी गोपाल अयंगर गोपाल स्वामी आयंगर इस मुद्दे पर अकेले पड़ गए थे. उस वक़्त मौलाना अबुल कलाम आज़ाद उनके एकमात्र समर्थक थे. उन्हें भी बाक़ी नेताओं ने चुप करा दिया था. ऐसा माना माना जाता है कि पंडित नेहरू को अपनी ही पार्टी के वरिष्ठ नेताओं में इस अनुच्छेद को लेकर अंदर ही अंदर पनप रहे आक्रोश का अंदाजा नहीं था. शायद इसीलिए वो कार्यसमिति की बैठक में इस पर बहस से पहले ही विदेश चले गए थे. बाद में पंडित नेहरू का सम्मान रखने के लिए सरदार वल्लभभाई पटेल अयंगर के समर्थन में आए.  कांग्रेस ने पंडित नेहरू की इच्छा का सम्मान करते हुए इस अनुच्छेद को संविधान में शामिल करने का फैसला किया.

संविधान सभा में मौलाना हसरत मोहानी के अचानक एतराज देने से गोपाल स्वामी आयंगर के चेहरे की पेशानी पर बल पड़ गए थे. दरअसल हसरत मोहानी थे ही इस मिजाज के जो भी कहना है साफ कहना है मौका और जगह कोई भी हो. उनके इसी मिजाज को रेखांकित करता हुआ उनका यह शेर बहुत मशहूर है.

हसरत मोहानी 1 जनवरी 1875 को उत्तर प्रदेश के उन्नाव जिले के मोहन क़स्बे में पैदा हुए थे
'इंकलाब जिंदाबाद' का नारा देने वाले मौलाना हसरत मोहानी क नाम आज़ादी के दीवानों में बड़े फख्र और इज्ज़त से लिया जाता है. 1 जनवरी 1875 को उत्तर प्रदेश के उन्नाव जिले के मोहन क़स्बे में पैदा हुए हसरत मोहानी का पूरा नाम सैयद फज़लुल हसन था. लेकिन बतौर शायर 'हसरत' उन्होंने अपना तखल्लुस रखा था और अपने पैदाइश के शहर 'मोहान' का नाम उसमें जोड़ लिया था. इस तरह वो 'हसरत मोहानी' हो गए थे. बचपन से ही पढ़ाई में ख़ास दिलचस्पी रखने वाले हसरत ने शुरुआती तालिम तो घर पर ही हासिल की. लेकिन जब स्कूल गए तो उस ज़माने में राज्य स्तर की परीक्षा में टॉप किया था. आगे की पढ़ाई पूरी करने के लिए अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी चले गए और कॉलेज के दौर से ही आजादी की लड़ाई में हिस्सा लेने लगे.

अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय के छात्र दो गुटों में बंटे हुए थे
उस वक्त अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय के छात्र दो गुटों में बंटे हुए थे. एक गुट तो अपने आप में मस्त रहने वाला था और दूसरा देशप्रेमियों  का ग्रुप था. देश प्रेम के जज़्बे से लबालब हसरत मोहानी भी इसी गुट में शामिल हो गए और आज़ादी की लड़ाई में हिस्सा लेने लगे. इसके चलते उन्हें कई बार यूनिवर्सिटी से निष्कासित भी किया गया. लेकिन आज़ादी को लेकर उनकी दीवानगी कम नहीं हुई. 1903 में इसी वजह से उन्हें जेल में डाल दिया गया. यहीं से हसरत आज़ादी के नायक के रूप में पहले उभर चुके मौलाना मोहम्मद अली जौहर और मौलाना शौक़त अली के भी संपर्क में आए.

1907 में हसरत मोहानी को एक बार फिर जेल जाना पड़ा
1903 में अलीगढ़ से बीए की डिग्री हासिल करने के बाद मौलाना हसरत मोहानी ने उर्दू-ए-मुअल्ला पत्रिका निकाली शुरू की. इस पत्रिका में उन्होंने अंग्रेजों की नीतियों का जमकर विरोध किया. अंग्रेजो के ख़िलाफ़ खुलकर लिखते थे. इसी के चलते उन्हें 1907 में एक बार फिर जेल जाना पड़ा. इस बीच हसरत 1904 में कांग्रेस से भी जुड़ गए थे. लेकिन अपने इंकलाबी मिज़ाज की वजह से वो ज्यादा दिन कांग्रेस में टिके नहीं रह सके. 1907 में कांग्रेस के सूरत अधिवेशन तक वह पार्टी में रहे. इसी साल जब कांग्रेस में नरम दल और गरम दल का झगड़ा शुरू हुआ तो वो कांग्रेस का दामन छोड़ बाल गंगाधर तिलक के साथ हो लिए. हजरत भारत के पूर्व आजादी के समर्थक थे और मुस्लिम लीग की तरह कांग्रेस से भी सख़्त नफ़रत करने लगे थे.

हसरत मोहानी बेजोड़ शायर भी थे
पत्रकार और आज़ादी के दीवाने होने के साथ-साथ हसरत मोहानी बेजोड़ शायर भी थे. उनकी गज़लों का संग्रह कुल्ललियात-ए-हसरत के नाम से मशहूर है. अपनी शायरी में हसरत ने रोमानिया के साथ-साथ समाज इतिहास और सत्ता के बारे में काफी कुछ लिखा है. उनकी शायरी में जिंदगी की खूबसूरती के साथ-साथ आजादी के जज्बे की एक अलग झलक मिलती है. उन्हें उन्नति गजलों का अगुआ माना जाता है. हसरत अपनी पूरी ज़िदगी शायरी और देश सेवा में गुजारी. 31 मई 1951 को कानपुर में हसरत मोहानी ने इस दुनिया-ए-फ़ानी को अलविदा कहा.

हजरत ने 1921 में 'इंकलाब जिंदाबाद' का नारा दिया. भगत सिंह और अशफाक़ उल्ला खान जैसे क्रांतिकारियों की जुबान पर यह नारा चढ़ने के बाद देश भर में मशहूर हो गया. आज भी जन आंदोलनों में यह नारा बढ़-चढ़कर लगाया जाता है. जातक रोमानी शायरी की बात है तो उनकी एक ग़ज़ल बेहद मशहूर है जिसे पाकिस्तान के मशहूर गजल गायक गुलाम अली ने गाया है और निकाह फिल्म में इस आसन को इस्तेमाल किया गया किया गया है. अपने बेहतरीन शायरी और इंकलाबी नारे के साथ साथ अब संविधान सभा के अनुच्छेद 370 का विरोध करने वाले एकमात्र स्वतंत्रता सेनानी के रूप में भी हसरत मोहनी को याद किया जाएगा.

रिपोर्ट- यूसुफ़ अंसारी

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First published: August 6, 2019, 9:40 AM IST
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