क्‍या 17 पिछड़ी जातियों को SC में शामिल करने पर 'यू-टर्न' लेगी योगी सरकार?

उत्‍तर प्रदेश में इससे पहले साल 2005 में तत्कालीन मुलायम सरकार ने ओबीसी की कई जातियों को एससी कैटेगरी में शामिल करने का फैसला लिया था, जिसपर हाईकोर्ट ने रोक लगा दी थी.

News18 Uttar Pradesh
Updated: July 2, 2019, 12:50 PM IST
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Updated: July 2, 2019, 12:50 PM IST
उत्‍तर प्रदेश की योगी सरकार ने पिछड़े वर्ग की जिन 17 जातियों को अनुसूचित जाति में शामिल करने का फैसला लिया है, उसे विपक्षी दल चुनावी हथकंडा बता रहे हैं. हालांकि, इन जातियों को अनुसूचित जाति में शामिल कराने की राह आसान नजर नहीं आ रही है, क्‍योंकि इसमें तमाम कानूनी पेंच हैं. अगर कानून और संविधान के जानकारों की मानें तो योगी सरकार या किसी भी राज्य अथवा केंद्र की सरकार को एससी कैटेगरी में किसी जाति को जोड़ने या निकालने का अधिकार ही नहीं है. इस तरह के बदलाव सिर्फ संसद के दोनों सदनों से प्रस्ताव पास होने के बाद राष्ट्रपति की मंजूरी मिलने के बाद ही हो सकते हैं.

कोर्ट में टिक पाएगा सरकार का फैसला?
वैसे यूपी में सियासी फायदे के लिए ओबीसी जातियों को एससी में शामिल कराने की कोशिश का यह कोई पहला मामला नहीं है, बल्कि इससे पहले भी कई बार राज्‍‍‍य सरकारें इस तरह की कोशिशें कर चुकी हैं. हर बार का नोटिफिकेशन हाईकोर्ट में चुनौती दिए जाने पर स्टे कर दिया जाता रहा है. क़ानून के जानकारों के मुताबिक़ योगी सरकार का ताजा फैसला भी हाईकोर्ट की दहलीज पर आकर ठहर जाएगा और वह अमल में नहीं आ पाएगा.

फेल हुए हैं पहले भी प्रयास

उत्‍तर प्रदेश में इससे पहले साल 2005 में तत्कालीन मुलायम सरकार ने ओबीसी की कई जातियों को एससी कैटेगरी में शामिल करने का फैसला लिया था, जिस फैसले पर हाईकोर्ट ने रोक लगा दी थी. इसके बाद साल 2013 में शिल्पकार और धनगड़ जातियों में कुछ उपजातियों को जोड़कर उन्हें एससी कैटेगरी में शामिल करने की कोशिश की गई थी, लेकिन तत्कालीन सरकार का यह फैसला भी हाईकोर्ट में टिक नहीं सका.

अखिलेश सरकार ने पिछले विधानसभा चुनाव से ठीक पहले दिसम्बर 2016 में 17 ओबीसी जातियों को एससी में शामिल करने का फैसला किया, लेकिन वह भी हाईकोर्ट से स्टे हो गया.

यूपी में सियासी फायदे के लिए ओबीसी जातियों को एससी में शामिल कराने की कोशिश का यह कोई पहला मामला नहीं है.

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क्‍या योगी सरकार भी लेगी 'यू टर्न'?
योगी सरकार ने धनगर को धनगड़ बताकर इस साल फिर से एससी कैटेगरी में ट्रांसफर करने का नोटिफिकेशन जारी किया. उसी आधार पर पूर्व कैबिनेट मंत्री एसपी सिंह बघेल ने आगरा की रिजर्व सीट से लोकसभा का चुनाव लड़ा. वह फैसला भी 19 अप्रैल को हाईकोर्ट से स्टे हो गया है. सभी फैसलों में यही आधार था कि जिस जीओ के जरिये ओबीसी जातियों को एससी में शामिल किया गया, यूपी सरकार को उस तरह का फैसला लेने का कोई अधिकार ही नहीं है. नियम के मुताबिक कोई भी सरकार किसी भी जाति को एससी कैटेगरी में न तो शामिल कर सकती है और न ही उसे बाहर कर सकती है.

संसद कर सकती है फैसला
ओबीसी जातियों को एससी में शामिल करने या बाहर निकालने का अधिकार सिर्फ संसद में कानून बनाकर ही किया जा सकता है. इस तरह के मामलों के जानकार और इलाहाबाद हाईकोर्ट के वकील राकेश कुमार गुप्ता का कहना है कि इस बारे में सुप्रीम कोर्ट भी स्थिति साफ कर चुका है. कोर्ट ने तो इसी तरह के एक मामले में टिप्पणी करते हुए यह भी कहा है कि ज़्यादा वोट या सीटें पाकर सरकारें जनप्रिय तो हो सकती हैं, लेकिन इसके बावजूद उन्हें काम नियम-क़ानून व संविधान के मुताबिक़ ही करने का अधिकार है.

20 साल की कवायद है बेकार
आपको बता दें कि बीते दो दशक से 17 अति पिछड़ी जातियों- कहार, कश्यप, केवट, मल्लाह, निषाद, कुम्हार, प्रजापति, धीवर, बिंद, भर, राजभर, धीमर, बाथम, तुरहा, गोडिया, मांझी और मछुआ को अनुसूचित जाति में शामिल करने की कोशिशें जारी हैं, लेकिन अब तक किसी भी सरकार को सफलता नहीं मिली है. इससे पहले सपा और बसपा सरकार में इसे चुनावी फायदे के लिए अनुसूचित जाति में शामिल तो किया गया पर उनका यह फैसला परवान नहीं चढ़ पाया. जबकि कानून के जानकार मौजूदा सरकार की असफलता भी साफ साफ देख रहे हैं.

(रिपोर्ट-सर्वेश दुबे, प्रयागराज)

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First published: July 2, 2019, 11:12 AM IST
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