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Opinion: आरोपियों के कब्‍जे से बड़ी धनराशि जब्‍त होने के बाद भी विपक्षी लगा रहे केंद्र सरकार पर आरोप

Opinion: आरोपियों के कब्‍जे से बड़ी धनराशि जब्‍त होने के बाद भी विपक्षी लगा रहे केंद्र सरकार पर आरोप

चुनाव के वक्‍त केंद्रीय जांच एजेंसियों की कार्रवाई के खिलाफ विपक्षी पार्टियां मुखर रही हैं. पंजाब मुख्‍यमंत्री के एक रिश्‍तेदार के खिलाफ ईडी की कार्रवाई और उत्‍तर प्रदेश में इत्र व्‍यवसा‍रियों के खिलाफ आयकर विभाग कार्रवाई के बाद विपक्षी पार्टियां केंद्रीय जांच एजेंसियां को निशाने पर ले रही हैं.

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देश में विधानसभा चुनाव हो या लोकसभा चुनाव, विपक्षी पार्टियां चुनाव के वक्त अक्सर सत्ता पक्ष पर केंद्रीय जांच एजेंसियों के दुरुपयोग पर सवाल उठाती रहती है. पिछले दिनों कुछ ऐसे ही सवाल उत्तरप्रदेश में इत्र कारोबारी पुष्पराज जैन और पीयूष जैन के खिलाफ कार्रवाई इनकम टैक्स (Income tax ) और जीएसटी की कार्रवाई के बाद उठे. अब, पंजाब में रेत माफिया मामले में आरोपी मुख्‍यमंत्री के एक रिश्‍तेदार (Relative of CM Punjab) के खिलाफ कार्रवाई के बाद विपक्ष ने केंद्रीय जांच एजेंसियों पर सवाल खड़ा करने शुरू कर दिए हैं.

ऐसे मामलों की गंभीरता को अगर देखें तो जांच एजेंसी पर सवाल उठाना बहुत ज्यादा तार्किक या उचित नहीं कहा जा सकता है. क्योंकि, किसी भी आरोपी के खिलाफ रातों-रात मामला दर्ज कर अचानक छापेमारी या गिरफ्तारी की कार्रवाई नहीं होती है, बल्कि उसके लिए कई दिनों-महीनों का वक्त लगता है. पर्याप्‍त सबूतों, दस्तावेजों और बयानों को इकठ्ठा किया जाता है, उसके बाद ही कोई छापेमारी जैसे प्रक्रिया को अंजाम दिया जाता है. रिश्‍वत की लेनदेन और कालाधन से जुडे मामलों में तत्काल प्रभाव से छापेमारी जैसी प्रक्रिया को अंजाम दिया जाता है, बाकी अन्य मामलों में काफी जांचने परखने के बाद ही उचित कार्रवाई की जाती है.

‘बिना आग लगे धुंआ नहीं उठता’
जबभी किसी राजनीतिक संरक्षण प्राप्त आरोपी या किसी राजनेता के खिलाफ कार्रवाई की जाती है, तो ये जरूर कहा जाता है कि ये जानबूझकर और परेशान करने की नियति से कार्रवाई की जा रही है, जबकि छापेमारी के दौरान उसी आरोपी के आवास से बड़ी मात्रा में नकदी, ज्वेलरी, प्रॉपर्टी के दस्तावेज, करोड़ों रूपये के संदिग्ध लेनदेन के दस्तावेज, अवैध तरीके से प्राप्त सरकारी दस्तावेज की कॉपी, कई बैंक लॉकर की जानकारी प्राप्त होती है, तब ये कहना तो बनता है कि बिना आग लगे धुंआ नहीं उठता है.

कुछ तो लोग कहेंगे, लोगों का काम है कहना…
केंद्रीय जांच एजेंसी के एक बड़े स्तर के अधिकारी से जब इस मसले पर पूछा गया कि जांच एजेंसी पर अक्सर ये आरोप लगता है कि आप गलत टाइम पर सर्च क्यों करते हैं, जैसे कभी आप छापेमारी करने अवकाश वाले दिन सुबह-सुबह पहुंच जाते हैं, तो कभी शादी के वक्त ही पहुंच जाते हैं, कभी आप चुनाव के पहले किसी नेताजी या उनके रिश्तेदार के यहां पहुंच जाते हैं, क्या ये सही है? तब अधिकारी का कहना था कि – ‘कुछ तो लोग कहेंगे, लोगों का काम है कहना…’

जांच एजेंसियों की अगर बात करें तो सीबीआई (CBI ), प्रवर्तन निदेशालय ( ED), इनकम टैक्स (Income tax), जीएसटी (GST ) की अगर बात करें तो इन जांच एजेंसियों पर दो तरह के आरोप अक्सर लगते रहे हैं. पहला की देश की जांच एजेंसी काम नहीं करती और अगर करती है तो ये सत्ता पक्ष या राजनीतिक पार्टी के इशारे पर करती हैं, जबकि इससे ज्यादा परेशानी जांच एजेंसी के तफ़्तीशकर्ताओं को होती है. किसी भी भ्रष्ट्राचार (Curruption) से जुड़े मसले पर कार्रवाई कब और कैसे करना है या हमें तफ़्तीश या छापेमारी कैसे करना है और कब पूछताछ करने के लिए नोटिस भेजना है? क्या यह आरोपियों से पूछकर उसके आदेशानुसार करना चाहिए या कोई ज्योतिष गणना करवाकर उसके मुताबिक हमें छापेमारी करना चाहिए.

दरअसल ये मसला बेबुनियादी है. जांच एजेंसी पर ऐसे सवाल उठाने का कोई ठोस और उचित मुद्दा नहीं है. क्योंकि, ये जांच एजेंसी तफ़्तीश करने के बाद जब आरोपी को तथ्यों के आधार पर अदालत के समक्ष पेश करती हैं. सबूतों और बयानों के आधार पर किसी भी आरोपी की गिरफ्तारी, छापेमारी या जमानत जैसे मामलों को अदालत के समक्ष पेश करना पड़ता है. नहीं तो, सरेआम अदालत तफ़्तीश करने वाले अधिकारियों को जमकर खिंचाई भी कर सकती है. इसलिए ये अधिकारी बहुत ही सतर्कता के साथ जांच पड़ताल करते हैं.

कुछ मामलों पर अगर ध्यान से अगर देखते हैं तो हमें साफ तौर पर जांच एजेंसियों की कार्रवाई के बाद लगे आरोप और उसके बाद कोर्ट में पेश किए गए सबूतों के आधार पर आरोपियों के खिलाफ आरोपपत्र दायर किया गया और उसी के आधार पर कोर्ट ने आरोपी को सजा भी सुनाई है. जैसे प्रमुख कुछ मामले इस प्रकार से हैं…

1. पंजाब में रेत माफियाओं के खिलाफ हुई कार्रवाई

पंजाब में पिछले कुछ दिनों पहले जब केंद्रीय जांच एजेंसी ईडी के द्वारा कई आरोपियों के खिलाफ छापेमारी की गई, तब कुछ नेताओं के द्वारा ये आरोप लगाया गया कि एक साजिश के तहत कुछ लोगों को परेशान करने के लिए छापेमारी की जा रही है. जबकि सच्चाई ये है कि रेत माफियाओं के खिलाफ ईडी से पहले 2018 में पंजाब पुलिस( Punjab Police ) द्वारा ये मामला दर्ज किया गया था.

उस वक्त भी यह रेत खनन का मामला तब सुर्खियों में आया था, जब पंजाब में उस वक्त के तत्कालीन मुख्यमंत्री कैप्टन अमरिंदर सिंह (Captain Amrinder Singh ) ने खुद एक ट्वीट करके अवैध रेत खनन से जुड़े माफियाओं के कनेक्शन का पर्दाफाश किया था. उसके बाद, आनन फानन में पुलिस ने आनन फानन करीब 2,000 से ज्यादा मामले दर्ज किए थे. पंजाब पुलिस द्वारा 7 मई 2018 को दर्ज मामले के बाद पंजाब में एक संयुक्त कमेटी भी बनाई गई थी, जिसने इस मामले में एक रिपोर्ट भी तैयार की थी.

इसके साथ ही, इस मामले पर पंजाब हाई कोर्ट (Punjab High Court)  में भी इस अवैध रेत माफिया से जुड़े मसले पर सुनवाई के दौरान कड़ी टिप्पणी की गई थी. पंजाब की सरकार द्वारा नियुक्त संयुक्त कमेटी की रिपोर्ट के मुताबिक, कई ऐसे मामले भी देखने को मिले थे, जिसमें कई वैध माइंस से अवैध तरीके से रेत खनन करवाया जा रहा था. ये मामला बेहद पुराना है, इस मामले में पुलिस की अबतक हुई कार्रवाई के बाद ही जांच एजेंसी ईडी ने पिछले साल नवंबर महीने में पंजाब पुलिस के द्वारा दर्ज मामले को आधार बनाते हुए ही उस केस को टेकओवर किया था.

इस लिहाज से जांच एजेंसी पर सवाल उठाना उचित नहीं कहा जा सकता है. एक सवाल और उठा कि अभी पंजाब में चुनाव हो रहे हैं तो ऐसे वक्त में छापेमारी क्यों? इस मसले पर जांच एजेंसी के सूत्र बताते हैं कि हमलोग किसी राजनीतिक दल या नेता के खिलाफ कार्रवाई नहीं कर रहे हैं, न ही ये सोचकर करते हैं. हमलोग हमेशा कानूनी तरीके से दर्ज मामलों में आरोपी के खिलाफ कार्रवाई करते हैं. इस मामले में अगर आरोपी किसी राजनेता का रिश्तेदार है, तो ऐसा नहीं कर सकते हैं कि उसी आधार पर हम उसे छोड़ दें या उसे राहत दे दें. हमलोग कानून से बंधे होते हैं, कानून और सबूतों के आधार पर जांच एजेंसी कार्य करती है, किसी आरोप या कहने पर कार्य नहीं करती है.

2. उत्तरप्रदेश के इत्र कारोबारियों के खिलाफ कार्रवाई का मामला 

उत्तर प्रदेश के कन्नौज में रहने वाले दो कारोबारियों के यहां हुई छापेमारी ने देश में काफी सुर्खियां बटोरी. केंद्रीय जांच एजेंसी जीएसटी इंटेलिजेंस (GST intelligence  ) ने इत्र कारोबारी पीयूष जैन के आवास पर छापेमारी कर करीब 200 करोड़ रुपये नकद, करीब 64 किलोग्राम सोना (Gold ), करीब 250 किलोग्राम चांदी (Silver ) बरामद किया. इस बरामदगी को देखने के बाद हर आम-ओ-खास शख्‍स की आंखें खुली रह जाएगी. जांच एजेंसी द्वारा की गई छापेमारी पर सवाल उठने लगे कि यह छापेमारी क्यों कि गई, जबकि छापेमारी के दौरान हुई बरामदगी के मसले पर कोई मुद्दा नहीं बनाना चाहता है. जांच एजेंसी पर सवाल उठाना बेहद आसान है, लेकिन छापेमारी के बाद मिली बड़ी नकदी अपने आप में बहुत बड़ा मसला है.

छापेमारी (Search Operation) के दौरान उसके घर से मिले विदेशी गोल्ड बिस्किट पर दुबई और ऑस्ट्रेलिया की मोहर है. पीयूष जैन के पास ये विदेशी गोल्ड कहां से आया, ये सवाल भी बेहद महत्वपूर्ण है. इसके साथ ही, कन्नौज के ही रहने वाले और समाजवादी पार्टी (Samajwadi Party) नेता और एक अन्य दूसरे इत्र कारोबारी पुष्पराज जैन( Pushpraj Jain ) की अगर बात करें तो इनके यहां भी इनकम टैक्स की छापेमारी हुई थी. छापेमारी के दौरान तकरीबन ढाई करोड़ रुपये नकद, करीब 60 लाख रुपये की चांदी , करीब 30 लाख रुपये का सोना (Gold ) मिला था. इसके साथ ही कई शहरों में इनके शेल कंपनियों (Shail Company )  यानी मुखौटा कंपनियों के द्वारा तकरीबन 10 करोड़ रुपये के लेनदेन का मामला बेहद संदिग्ध है.

लिहाजा कहा जा सकता है कि इनके यहां हुई छापेमारी के मसले पर भी खूब राजनीतिक बयानबाजी हुई थी, लेकिन जिस तरह से इनके ठिकानों पर छापेमारी के दौरान करोड़ो की संदिग्ध नकदी सहित अन्य संपत्तियों के दस्तावेज समेत अन्य सबूतों को पाया गया है , उसे देखकर तो यही लगता है कि बिना आग लगे धुंआ नहीं उठता है.

3. कोयला घोटाला का खेल और जांच एजेंसी का ‘ऑपरेशन खेला होबे’
पश्चिम बंगाल चुनाव के पहले जांच एजेंसी सीबीआई द्वारा कोलकाता स्थित अदालत के निर्देश पर कोयला घोटाला ( Coal Scam) से जुड़े मामले को दर्ज किया गया था, जिसके तहत कई आरोपियों की गिरफ्तारी भी हुई थी. उसी केस को आधार बनाते हुए बाद में ईडी ने उस केस को टेकओवर किया और छापेमारी के दौरान करोड़ो रूपये के खेल को बेनकाब कर दिया. पश्चिम बंगाल चुनाव के दौरान इस मामले की चर्चा क्यों हुई ये जानना भी बेहद आवश्यक है.

दरअसल काले हीरे की नगरी के उपनाम से मशहूर आसनसोल और रानीगंज इलाके में राजनीतिक संरक्षण और स्थानीय कुछ पुलिस वालों के सहयोग से यह काला धंधा पिछले कई सालों से चला आ रहा है. इस इलाके में तकरीबन 3500 अवैध खदानों से रोजाना करीब 200 करोड़ का काले रुपये का खेल चलता है. इस धंधे का मास्टरमाइंड अनूप मांझी उर्फ लाला था, जिसका कनेक्शन खंलागने में कई बड़े राजनेताओं, पुलिस अधिकारियों सहित प्रतिष्ठित सफेदपोश लोगों के तक जा पहुंचा.

लिहाजा, इस मामले को राजनीतिक तूल दिया गया, कार्रवाई करने वाली जांच एजेंसी के खिलाफ खूब बयानबाजी हुई. लेकिन सवाल उठता है कि अगर जांच एजेंसी गलत थी तब करोड़ो रूपये के साम्राज्य और सबूतों को कैसे झुठलाया जा सकता है ,जिन सबूतों को कोर्ट ने भी सही माना. उसके बाद कई आरोपियों के करीब 200 करोड़ रुपये की अवैध प्रोपर्टी को अटेचमेंट किया जा चुका है और फिलहाल तफ़्तीश इस मामले में जारी है.

(डिस्क्लेमर: ये लेखक के निजी विचार हैं. लेख में दी गई किसी भी जानकारी की सत्यता/सटीकता के प्रति लेखक स्वयं जवाबदेह है. इसके लिए News18Hindi किसी भी तरह से उत्तरदायी नहीं है)

Tags: 2022 Uttar Pradesh Assembly Elections, Congress, Income tax department, Punjab Assembly Election 2022

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