इटावा: यादवों के गढ़ में 'गीता' के जरिए सेंधमारी की कोशिश में BJP!

राज्यसभा की निविर्रोध सदस्य निर्वाचित हुई गीता शाक्य औरैया की जिलाध्यक्ष रही हैं.
राज्यसभा की निविर्रोध सदस्य निर्वाचित हुई गीता शाक्य औरैया की जिलाध्यक्ष रही हैं.

राज्यसभा सदस्य निर्वाचित होने के बाद गीता शाक्य (Geeta Shakya) ने न्यूज 18 को बताया कि असल मे भारतीय जनता पार्टी सबका साथ सबका विकास सबका विश्वास के एंजेंड पर काम कर रही है.

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दिनेश शाक्य 

इटावा. उत्तर प्रदेश में समाजवादियों के गढ़ इटावा की बहू गीता शाक्य (Geeta Shakya) को राज्यसभा भेजने के भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) के फैसले के निहितार्थ निकाले जाने लगे है. सोमवार को गीता शाक्य को निविर्रोघ निर्वाचन का प्रणाम पत्र मिलने के बाद शाक्य बाहुल्य इलाको में खुशी का माहौल देखा जा रहा है. गीता के राज्यसभा के निविर्रोघ घोषित किए जाने के बाद खुशी का माहौल है. राज्यसभा सदस्य निर्वाचित होने के बाद गीता शाक्य ने न्यूज 18 को बताया कि असल मे भारतीय जनता पार्टी सबका साथ सबका विकास सबका विश्वास के एंजेंड पर काम कर रही है. इसी के तहत ही उनको राज्यसभा भेज कर सम्मान दिया गया है. जहां नीतिनिर्धारण के रास्ते तय होते हो वहां तक पहुंचना भी किसी आश्चर्य से कम नहीं है.

सरपंच से राज्यसभा तक का सफर



राज्यसभा की निविर्रोध सदस्य निर्वाचित हुई गीता शाक्य औरैया की जिलाध्यक्ष रही हैं. औरैया जिले के बिधूना के हमीरपुर गांव में मायका और भरथना के रमपुरा सिंहुआ गांव उनकी ससुराल है. वह 2000 से 2010 तक प्रधान रहीं हैं और उनके पति मुकुट सिंह भी प्रधान रह चुके हैं. गीता वर्ष 2009 में उपचुनाव में सपा की टिकट पर बिधूना विधानसभा क्षेत्र से चुनाव भी लड़ चुकी हैं. बिधूना में शाक्य वोटों को प्रभावित करने के लिए सपा ने उन्हें टिकट दिया था. हालांकि वह सपा छोड़कर भाजपा में शामिल हो गई थीं और दो साल तक जिलाध्यक्ष पद पर रह चुकी हैं. साल 2012 में भाजपा की टिकट पर चुनाव लड़ीं और तीसरे पायदान पर रही थीं. उन्हें उप मुख्यमंत्री केशव प्रसाद का करीबी माना जाता है. सपा में रहते हुए उन्हें शिवपाल का करीबी माना जाता था.
गीता के पति मुकुट सिंह शाक्य अपनी पत्नी गीता के भाजपा से राज्यसभा के लिए निर्वाचित होने को एक बड़े तोहफे की तरह से देख गदगद नजर आ रहे है. वो कहते है कि भाजपा की उनके जैसे कार्यकर्ता की भी अहमियत समझ कर उनको राज्यसभा के रास्ते भेजा है. यह उनके लिए किसी करिश्मे से कम नहीं है.

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क्या बीजेपी को मिलेगा फायदा?

दरअसल, कानपुर और आगरा मंडल के कानपुर देहात, औरैया, फर्रुखाबाद,कन्नौज ,मैनपुरी, एटा,इटावा,आगरा और फिरोजाबाद आदि जिले की विधानसभा सीटों पर शाक्य मतदाताओं की भूमिका निर्णायक तौर पर देखी जाती रही है जिसका फायदा सत्तारूढ़ भाजपा के बजाय समाजवादियों को मिलता रहा है. राजनीतिक पंडित मानते हैं कि इसी आंकड़े को दृष्टिगत रखते हुए भाजपा ने इस दफा ऐसा कदम उठाया है जिससे सत्ता के साथ-साथ में विपक्ष के नेता भी हैरत में दिखाई दे रहे हैं. वैसे समाजवादी के गढ़ इटावा से 1980, 1989,1996 में राम सिंह शाक्य तो 1999, 2004 में लगातार रघुराज सिंह शाक्य अपनी जाति के बल पर इटावा संसदीय सीट जीतते रहे है. चूंकि 2009 से इस सीट का मिजाज आरक्षित हो गया है, इसलिए अब इस जाति से ताल्लुक रखने वाले लोग मनचाही जगह वोटिंग करते हैं. सिर्फ इतना ही नही इटावा विधानसभा सीट पर पर भी रघुराज सिंह शाक्य एमएलए के तौर पर अवनी विजय पताका फहरा चुके है जबकि मैनपुरी जिले की भौगांव विधान सभा से रामऔतार शाक्य लंबे समय तक एमएलए रहे है उसके बाद उनके बेटे आलोक शाक्य भी रहे है.
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