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काशी में आज होगी भव्य देव दिवाली, महादेव की नगरी में उतरेंगे 33 करोड़ देव

काशी में आज होगी भव्य देव दिवाली (Pixabay)
काशी में आज होगी भव्य देव दिवाली (Pixabay)

काशी में देव दिवाली की परंपरा शुरू होने के पीछे कई पौराणिक कथाएं, जनश्रुतियां हैं. इस साल पहला मौका है, जब देश के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी (PM Narendra Modi) स्वयं देव दिवाली को यादगार बनाने काशी में हैं.

  • News18Hindi
  • Last Updated: November 30, 2020, 12:23 PM IST
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वाराणसी. लंका के राजा रावण पर अयोध्या के राजा राम की विजय और उसके बाद उनके अयोध्या लौटने की खुशी में मनाई जाने वाली दिवाली की परंपरा से सभी परिचित हैं. लेकिन देव दिवाली (Dev Diwali) क्यों मनाई जाती है, इस बारे में कम ही लोगों को पता है. देव दिवाली शब्द से ही साफ हो जाता है देवों की दिवाली. यानी यह दिवाली देवता लोग मनाते हैं. देव दिवाली का जिक्र पुराणों में है, 'निर्णय सिंधु' और 'स्मृति कौस्तुभी' में है. ऐसी मान्यता है कि 33 करोड़ देवता स्वर्ग से उतर कर काशी (Kashi) आए थे और उन्होंने कार्तिक पूर्णिमा के दिन गंगा किनारे दीपदान किया था. तभी से काशी में देव दिवाली की परंपरा शुरू हुई है.

काशी में लगेगा देवताओं का जमावड़ा
मान्यता यह भी है कि देवता लोग अभी भी हर साल कार्तिक पूर्णिमा को काशी आते हैं. देवताओं के स्वागत में ही काशीवासी गंगा तट पर दीप जलाते हैं. देव दिवाली पहले काशीवासियों के आस्था का उत्सव था, लेकिन अब इसमें अर्थ भी जुड़ गया है. अर्थ जुड़ने के साथ इसकी भव्यता बढ़ती गई है. देव दिवाली गंगा तट से आगे निकल कर शहर के सभी मंदिरों, कुंडों, तालाबों, ऐतिहासिक इमारतों तक पहुंच गई है, और इसकी रोशनी पूरी दुनिया में. इसका परिणाम है कि देव दिवाली पर दुनियाभर से पर्यटक काशी आने लगे हैं.

इस साल 15 लाख दिये जलाए जाएंगे
कोरोना वायरस महामारी के कारण जब इस साल विश्व प्रसिद्ध काशी की रामलीला नहीं हुई तो काशीवासियों को लगा था कि देव दिवाली भी नहीं होगी, या होगी भी तो औपचारिकता ही निभाई जाएगी. लेकिन इस साल की दिवाली पिछले साल से भी कहीं अधिक भव्य तरीके से आयोजित हो रही है. पिछले साल गंगा तट पर 10 लाख मिट्टी के दिए जलाए गए थे, लेकिन इस साल 15 लाख दिये जलाए जा रहे हैं. शहर में मंदिरों, कुंडों, तालाबों और इमारतों पर जलाए जाने वाले दियों की संख्या जोड़ ली जाए तो यह संख्या 25 लाख से अधिक हो सकती है. इस बार गंगा पार रेती पर भी दिये जलाए जा रहे हैं.



यादगार बनाने काशी आएंगे पीएम मोदी
काशी विश्वनाथ काॅरिडोर की आकृति दियों के जरिए बनाई जा रही है. यही नहीं गंगा की लहरों पर लेजर शो और प्रोजेक्टर के जरिए शिव महिमा और गंगा अवतरण की कहानी भी प्रदर्शित की जा रही है. इस साल पहला मौका है, जब देश के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी स्वयं देव दिवाली को यादगार बनाने काशी में हैं. वह नौका में बैठकर गंगा की लहरों से तट पर तारों की तरह टिमटिमाते लाखों दियों की भव्य छंटा को निहारेंगे. इस दौरान उनके साथ राज्यपाल आनंदी बेन पटेल और मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ भी रहेंगे. वाराणसी प्रधानमंत्री मोदी का संसदीय क्षेत्र है, लिहाजा देव दिवाली में शामिल होने के अलावा शहर में उनके और भी कई कार्यक्रम हैं.

देव दिवाली का इतिहास
काशी में देव दिवाली की परंपरा शुरू होने के पीछे कई पौराणिक कथाएं, जनश्रुतियां हैं. एक कथा में कह गया है कि भगवान विष्णु चार महीने की निंद्रा के बाद कार्तिक शुक्ल एकादशी के दिन जागते हैं और सृष्टि का कार्यभार वापस अपने हाथ में लेते हैं. इसीलिए इसे देव उठनी एकादशी भी कहते हैं. इस दौरान भगवान विष्णु का वास पंचनद तीर्थ यानी पंचगंगा घाट पर रहता है. भगवान विष्णु के जागने की खुशी में देवता लोग स्वर्ग से पंचगंगा घाट पर आकर कार्तिक पूर्णिमा को दीपदान करते हैं. कहा जाता है कि इस मौके पर सभी तीर्थों के साथ तीर्थराज प्रयाग और सभी देवों के साथ महादेव भी मौजूद रहते हैं. कार्तिक पूर्णिमा की शाम को भगवान विष्णु का पहला अवतार यानी मत्स्यावतार भी हुआ था.

दिवोदास की कथा
देव दिवाली की एक दूसरी कहानी है. यह कहानी बाबा विश्वनाथ की बसाई नगरी काशी के पहले राजा दिवोदास और देवताओं से जुड़ी हुई है. कहानी के अनुसार, दिवोदास बहुत अहंकारी था. उसने काशी में देवताओं का प्रवेश प्रतिबंधित कर दिया था. इसकी जानकारी जब भगवान शिव को हुई तो वह कार्तिक पूर्णिमा के दिन भेष बदलकर पंचगंगा घाट पहुंचे और वहां स्नान करने के बाद उन्होंने ध्यान किया. दिवोदास को जब इसकी जानकारी हुई तो उसे अपने किए पर बहुत पछतावा हुआ और उसने तत्काल देवताओं के प्रवेश पर लगा प्रतिबंध हटा लिया. इसके बाद देवताओं ने काशी में प्रवेश किया और प्रतिबंध हटने की खुशी में उन्होंने गंगा तट पर दीपदान किया और महादेव की महाआरती की.

त्रिपुरासुर की कहानी
देव दिवाली की तीसरी सबसे प्रचलित कहानी त्रिपुरासुर के बध से जुड़ी हुई है. काशी से कोई 120 किलोमीटर दूर प्रयागराज में त्रिपुर नामक राक्षस ने ब्रह्मा को प्रसन्न करने के लिए एक लाख वर्षों तक तपस्या की. तपस्या के पीछे उसकी मंशा तीनों लोक पर नियंत्रण स्थापित करने की थी. त्रिपुर की तपस्या से देवता परेशान हो उठे. उन्होंने उसकी तपस्या भंग करने की कई कोशिशें की. लेकिन कामयाबी नहीं मिली. अंत में ब्रह्मा ने त्रिपुर को आकर दर्शन दिया. उन्होंने त्रिपुर से वरदान मांगने को कहा. त्रिपुर ने कहा, ’’मुझे ऐसा वरदान दीजिए कि न तो देवता मार सकें न राक्षस, न स्त्री मार सके न पुरुष, न पक्षी न जीव-जंतु.’’ ब्रह्मा से यह वरदान मिलने के बाद त्रिपुर एक तरह से अमर हो गया. उसने सबसे पहले स्वर्ग पर चढ़ाई कर दी. देवता दौड़ कर ब्रह्मा के पास पहुंचे, त्रिपुर से बचने का उपाय पूछा. ब्रह्मा ने भगवान शिव के पास जाने के लिए कहा. देवताओं ने महादेव से रक्षा की गुहार लगाई. देवताओं की प्रार्थना पर भगवान शिव ने अर्द्धनारीश्वर का रूप धारण कर त्रिपुर का वध किया. त्रिपुर के वध के बाद से ही शिव को त्रिपुरारी भी कहा जाने लगा. त्रिपुर के मारे जाने के बाद देवता लोग खुशी से झूम उठे और उन्होंने काशी आकर महादेव की महाआरती की और गंगा तट पर दीपदान किया. इस उत्सव को इसीलिए त्रिपुरोत्सव भी कहा जाता है. मान्यता है कि आज भी देवता कार्तिक पूर्णिमा को दिवाली मनाने काशी आते हैं. देवताओं के स्वागत में काशीवासी गंगा तट, मंदिरों, कुंडों, तालाबों, इमारतों पर दिया जलाते हैं, सजाते हैं.

देवताओं को स्वर्ग से धरती पर उतरते समय रास्ते में उजाला रहे, इसके लिए गंगा तट पर आकाश दीप भी जलाए जाते हैं. गंगा तट पर टिमटिमाते लाखों दीपों और आकाश दीपों की परछाई जब गंगा की लहरों पर पड़ती है, तोे एक अलौकिक दुर्लभ दृश्य बनता है. इसी दृश्य को देखने दुनिया काशी में उमड़ पड़ती है.

बदला स्वरूप
काशी में हालांकि पहले देव दिवाली का स्वरूप ऐसा नहीं था. लोग व्यक्तिगत रूप से श्रद्धा भाव से गंगा तट पर दिया जला देते थे. लेकिन समय के साथ इसका स्वरूप बदलता गया, भव्य होता गया. काशी में देव दिवाली के आधुनिक स्वरूप की शुरुआत 1915 में पंचगंगा घाट से बताई जाती है. उस समय हजारों की संख्या में दिये जलाए गए थे. बाद में इंदौर की महारानी अहिल्याबाई होलकर जब काशी विश्वनाथ मंदिर का निर्माण करा रही थीं, तब उन्होंने देव दिवाली के महत्व को समझते हुए पंचगंगा घाट पर पत्थर के दो विशाल हजारा दीप स्तंभ बनवाए, जिनपर 1001 की संख्या में दिये जलते हैं. काशी नरेश विभूति नारायण सिंह (अब दिवंगत) ने भी अपने समय में देव दिवाली को बढ़ावा दिया. इसके बाद 1985 में मंगला गौरी मंदिर के महंत नारायण गुरु ने देव दिवाली के विस्तार की मुहिम शुरू की. गली, चैराहों, दुकानों पर कनस्तर रखे गए और लोगों से तेल, घी दान करने का आग्रह किया गया. सप्ताह भर में एक कनस्तर घी और 11 कनस्तर तेल जमा हो गए थे. बालाजी घाट से लेकर दुर्गा घाट तक पांच घाटों पर देव दिवाली मनाई गई थी. पंचगंगा घाट पर हजारा दीप स्तंभ के साथ कुल 25 हजार दिये जलाए गए थे. इसके बाद 1986 में वागीशदत्त मिश्र की अध्यक्षता में केंद्रीय देव दिवाली महासमिति का गठन हुआ. काशी क्षेत्र में आने वाले कुल 84 घाटों पर देव दिवाली मनाए जाने की मुहिम चलाई गई. हर घाट के लिए अलग-अलग समितियां बनाई गईं. यही समितियां आज देव दिवाली का आयोजन करती हैं. देव दिवाली में पर्यटन के महत्व को समझते हुए कई सालों से इसमें प्रशासन भी बड़े पैमाने पर हिस्सेदारी करने लगा है.

वर्ष 1992 से 2000 के बीच इस उत्सव का स्वरूप इतना भव्य हो गया कि दुुनिया में इसकी चर्चा होने लगी. देव दिवाली का मनोहर दृष्य अपनी आंखों में भर लेने के लिए दुनिया भर से लोग काशी आने लगे. लोग महीनों पहले से देव दिवाली के लिए नौका और होटल की बुकिंग करा लेते हैं. वाराणसी में देव दिवाली के मौके पर नौका औैर होटल के किराये कई गुना बढ़ जाते हैं. कई सारे लोगों को फिर भी निराशा हाथ लगती है. घाटों पर इतनी भीड़ जमा हो जाती है कि अब इस उत्सव को लाखा मेलेे में शुमार किया जाने लगा है. लेकिन इस साल विदेशी पर्यटकों के अकाल के कारण नौका चालक निषाद समुदाय से लेकर होटल कारोबारियों तक सब उदास हैं. नगर निगम ने 1,000 नावों को संचालन का लाइसेंस तो जारी कर दिया है, लेकिन बुकिंग मात्र 30 प्रतिशत नावों की ही हो पाई है.

निषाद समाज के नेता वीरेंद्र निषाद का कहना है कि इसके पीछे एक कारण कोरोना है, दूसरा कारण प्रधानमंत्री की सुरक्षा के मद्देनजर कालका घाट से राजघाट तक शाम साढ़े सात बजे तक नौका संचालन लगाया गया प्रतिबंध है, क्योंकि कई बुकिंग सिर्फ इसी कारण रद्द हो गई है. वीरेंद्र हालांकि इस साल की देव दिवाली की भव्यता से आशान्वित हैं. उनका मानना है कि देव दिवाली बाद पर्यटक काशी आने लगेंगे और देव दिवाली पर हुए नुकसान की भरपाई हो जाएगी, क्योंकि प्रशासन ने 150 देशों में देव दिवाली के जीवंत प्रसारण का बंदोबस्त कर रखा है. होटलों की बुकिंग की स्थिति भी लगभग यही है. लेकिन प्रशासन ने उत्सव को भव्य बनाने के लिए पूरा जोर लगा रखा है, ताकि कम से कम स्थानीय पर्यटकों को आकर्षित किया जा सके.
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