UP: बनारसी साड़ी के कारोबार पर Corona का साया, 20 जुलाई से 6 अगस्त तक व्यापार पर लगा ब्रेक
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UP: बनारसी साड़ी के कारोबार पर Corona का साया, 20 जुलाई से 6 अगस्त तक व्यापार पर लगा ब्रेक
बनारसी साड़ी के कारोबार पर Corona का साया (फाइल फोटो)

साड़ी कारोबारी शाहबाज हुसैन (Shahbaz Hussain) कहते हैं कि साड़ी कारोबारी के चेहरे मुरझा चुके है. क्योंकि एक तरफ कोरोना काल (Corona Epidemic) में साड़ियों की बिक्री न के बराबर रह गयी है.

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  • Last Updated: July 18, 2020, 12:05 PM IST
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वाराणसी. देश के बड़े हस्तकला लघु-कुटीर उद्योगों में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी (PM Narendra Modi) के संसदीय क्षेत्र वाराणसी (Varanasi) की 'बनारसी साड़ी' बनाने वाले उद्योग भी शामिल हैं. इन पर 6 लाख बुनकर और उनका परिवार आश्रित है. लाखों साड़ी व्यापारी और उनका परिवार भी इसी उद्योग पर निर्भर रहता है, लेकिन लॉकडाउन ने सुस्त पड़े बनारसी साड़ी कारोबार को खत्म कर दिया है. कोरोना के बढ़ते मामलों को देखते हुए बनारसी वस्त्र उद्योग एसोसिएशन ने बनारसी साड़ी से सभी कारोबार 20 जुलाई से 6 अगस्त तक बंद रखने का निर्णय लिया है. एक तरफ पहले लॉकडाउन के कारण बनारसी साड़ी उद्योग की कमर टूट गयी है.

व्यापार 25 प्रतिशत तक रह गया है तो दूसरी तरफ कोरोना की चेन को तोड़ने के लिए बनारसी साड़ी व्यवसाय को 15 दिन की बंदी जरूरी बताया जा रहा है. बनारसी साड़ी पूरी दुनिया में अलग चमक बिखेरती है. इस पर भी चीन के कोरोना वायरस का ग्रहण लग गया है. जानकारी के मुताबिक 1200 करोड़ से अधिक का बनारसी वस्त्र उद्योग का कारोबार इस समय प्रभावित है. कारोबारियों को विदेशों से आर्डर मिलने बंद हो गए हैं.

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60 प्रतिशत से अधिक ऑर्डर कैंसिल हो गये है. साड़ी का व्यापार 25 प्रतिशत तक रह गया है, तो वहीं कोरोना वायरस का कहर बढ़ता ही जा रहा है इसलिए वाराणसी वस्त्र उद्योग संघ ने 20 जुलाई से छह अगस्त तक बंद कारोबार पूरी तरह से बंद रखने का निर्णय लिया है. रेशम इंडिया के मालिक और राष्ट्रीय पुरस्कार से सम्मानित निर्यातक मकबूल हसन ने बताया कि कोरोना संक्रमण बढ़ने के कारण ये निर्णय लेना पड़ा.


बुनकरों की हालत बदतर

साड़ी कारोबारी शाहबाज हुसैन कहते हैं कि साड़ी कारोबारी के चेहरे मुरझा चुके है. क्योंकि एक तरफ कोरोना काल में साड़ियों की बिक्री न के बराबर रह गयी है. तो फिर से एक बार व्यापार बंद हो चुका है. तो वहीं सबसे ज्यादा निराश बुनकर है उनके करघे जो हमेशा चलते थे आज वो थम से गये है. करघों में सन्नटा है उन्हें कम नहीं मिल रहा है वो सरकार से मदद की गुहार लगा रहे है.
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