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काशी विश्वनाथ-ज्ञानवापी केस: एक बीघा 9 बिस्वा जमीन का होगा पुरातात्विक सर्वेक्षण, अपील से दलील तक जानें पूरा मामला

काशी विश्वनाथ मंदिर और ज्ञानवापी मस्जिद मामले में कोर्ट ने बड़ा फैसला सुनाया है.

काशी विश्वनाथ मंदिर और ज्ञानवापी मस्जिद मामले में कोर्ट ने बड़ा फैसला सुनाया है.

Varanasi News: श्री काशी विश्वनाथ मंदिर बनाम ज्ञानवापी मस्जिद केस 1991 से वाराणसी (Varanasi) की अदालत में लंबित था. इस पुराने मुकदमे में वाद मित्र और अधिवक्ता विजय शंकर रस्तोगी ने आवेदन के जरिए पुरातात्विक सर्वेक्षण की मांग की थी.

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वाराणसी. उत्तर प्रदेश के वाराणसी में श्री काशी विश्वनाथ मंदिर (Kashi Vishwanath Temple) बनाम ज्ञानवापी मस्जिद (Gyanvapi Mosque) केस में गुरुवार का दिन काफी अहम रहा. मंदिर के पक्ष में कोर्ट ने फैसला देते हुए पुरातात्विक सर्वेक्षण (Archaeological Survey) की राह साफ कर दी है. पुरातात्विक सर्वेक्षण की मंजूरी मिलने के बाद अब 5 सदस्यीय पुरातत्व टीम का चयन होगा. बता दें कि साल 1991 से वाराणसी की अदालत में यह केस लंबित था. इस पुराने मुकदमे में वाद मित्र और अधिवक्ता विजय शंकर रस्तोगी ने आवेदन किया था. आवेदन के जरिए विजय शंकर रस्तोगी ने पुरातात्विक सर्वेक्षण की मांग की थी.

आवेदन में विजय शंकर रस्तोगी ने बताया था कि ज्ञानवापी परिसर के आराजी नंबर 9130, 9131 और 9132 रकबा का सर्वेक्षण कराया जाए. एक बीघे 9 बिस्वा जमीन का पुरातात्विक सर्वेक्षण रडार तकनीक से करके यह पता लगाने की कोशिश की जाए, जो जमीन है वह मंदिर का अवशेष है या नहीं? इसके अलावा विवादित ढांचे का फ़र्श तोड़कर देखा जाए कि उसके अंदर क्या 100 फीट ऊंचा ज्योतिर्लिंग स्वयंभू विश्वनाथ मौजूद हैं या नहीं? मस्जिद की दीवारें प्राचीन मंदिर की हैं या नहीं?

'रडार तकनीक से सर्वेक्षण से जमीन का धार्मिक स्वरूप पता चलेगा'
विजय शंकर रस्तोगी का तर्क था कि रडार तकनीक से पुरातात्विक सर्वेक्षण में एक बीघा 9 बिस्वा जमीन के धार्मिक स्वरूप का पता चल जाएगा. उनकी दलील थी कि चौथी शताब्दी के मंदिर में प्रथम तल में ढांचा और भूतल में तहखाना था, जिसमें 100 फीट ऊंचा शिवलिंग है. पुरातात्विक खुदाई से ये बात साफ हो जाएगी. मंदिर हजारों साल पहले 2050 विक्रम संवत में राजा विक्रमादित्य ने बनवाया था और फिर सतयुग में राजा हरिश्चंद्र और बाद में 1788 में इंदौर की महारानी अहिल्याबाई होल्कर ने इसका जीर्णोद्धार कराया था.
मस्जिद पक्ष की ये थी दलील


मस्जिद पक्ष की ओर से सेंट्रल सुन्नी वक्फ बोर्ड के वकील ने कहा कि दावे के अनुसार जब मंदिर तोड़ा गया, तब ज्योतिर्लिंग उसी स्थान पर मौजूद था, जहां इस वक्त है. उसी दौरान अकबर के वित्त मंत्री टोडरमल ने नारायण भट्ट से मंदिर बनवाया था, जो उसी ज्योतिर्लिंग पर बना है. ऐसे विवादित ढांचा के नीचे दूसरा शिवलिंग कैसे आ सकता है? इसलिए खुदाई नहीं होनी चाहिए. अयोध्या राम जन्मभूमि की तरह विश्वनाथ मंदिर की पुरातात्विक रिपोर्ट मंगाई जाने पर आपत्ति जताते हुए मस्जिद पक्ष के वकील ने कहा की हालात विपरीत हैं. वहां बयान होने के बाद विरोधाभास की स्थिति में कोर्ट ने रिपोर्ट मंगाई थी जबकि यहां मामले में अभी तक किसी का भी साक्ष्य नहीं हुआ है.

जज ने दोनों पक्षों की दलील सुनने के बाद सर्वेक्षण की दी मंजूरी
मस्जिद पक्ष के वकील अभय नाथ यादव ने कहा कि साक्ष्य जमा करने के लिए रिपोर्ट नहीं मंगाई जा सकती. उन्होंने शांति भंग की भी आशंका जताई. कुछ ऐसी ही दलीलें अंजुमन इंतजाम कमेटी की ओर से भी दी गईं. सभी दस्‍तावेज का अवलोकन करने के बाद सिविल जज (सीनियर डिवीजन फास्ट ट्रैक कोर्ट) आशुतोष तिवारी ने मंदिर पक्ष के वाद मित्र विजय शंकर रस्तोगी के आवेदन को स्वीकार करते हुए पुरातात्विक सर्वेक्षण की मंजूरी दे दी.
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