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पीएम मोदी के खिलाफ नामांकन से लेकर मैदान छोड़ने तक, जानिए अतीक अहमद की पूरी कहानी

News18 Uttar Pradesh
Updated: May 13, 2019, 11:55 AM IST
पीएम मोदी के खिलाफ नामांकन से लेकर मैदान छोड़ने तक, जानिए अतीक अहमद की पूरी कहानी
पूर्व सांसद अतीक अहमद (फाइल फोटो)

वाराणसी संसदीय सीट पर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के खिलाफ निर्दलीय चुनाव मैदान में उतरे पूर्व सांसद बाहुबली अतीक अहमद ने मैदान से हटने का ऐलान किया है. फिलहाल अतीक प्रयागराज के नैनी जेल में बंद हैं.

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देश की सियासत में कई ऐसे नेता हैं, जिन्होंने जुर्म की दुनिया से निकलकर राजनीति की गलियों में कदम रखा. ऐसा ही एक नाम अतीक अहमद का है. वाराणसी संसदीय सीट पर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के खिलाफ निर्दलीय चुनाव मैदान में उतरे पूर्व सांसद बाहुबली अतीक अहमद ने अब मैदान से हटने का ऐलान कर दिया है. मीडिया को भेजे गए पत्र में अतीक ने परोल न मिलने को चुनाव से हटने का कारण बताया है. साथ ही कहा है कि वह किसी भी प्रत्याशी का समर्थन नहीं करेंगे. फिलहाल अतीक प्रयागराज के नैनी जेल में बंद हैं.

कब क्या हुआ

अतीक ने निर्दलीय नामांकन करने के बाद चुनाव प्रचार करने के लिए परोल की अर्जी दी थी. इसके बाद एमपी-एमएलए स्पेशल कोर्ट ने 29 अप्रैल को अतीक अहमद की अर्जी खारिज कर दी. अतीक अहमद ने चुनाव प्रचार करने के लिए कोर्ट में तीन हफ्ते की शॉर्ट टर्म बेल के लिए अर्जी दाखिल की थी. जैसे ही कोर्ट ने अतीक कि पैरोल की अर्जी खारिज की वैसे ही अतीक के प्रतिनिधि शाहनवाज ने उनकी तरफ से निर्दलीय उम्मीदवार के तौर पर पर्चा भर दिया था.

कौन हैं अतीक अहमद

अतीक अहमद का जन्म 10 अगस्त 1962 को हुआ था. मूलत वह उत्तर प्रदेश के श्रावस्ती जनपद के रहने वाले है. पढ़ाई लिखाई में उनकी कोई खास रूचि नहीं थी. इसलिये उन्होंने हाई स्कूल में फेल हो जाने के बाद पढ़ाई छोड़ दी थी.

17 साल की उम्र में पहला मुकदमा

जवानी की दहलीज पर कदम रखते ही अतीक अहमद के खिलाफ पहला मामला दर्ज हुआ था. साल 1979 में अतीक अहमद पर कत्ल का इल्जाम लगा था. उसके बाद अतीक ने पीछे मुड़कर नहीं देखा. साल दर साल उनके जुर्म की किताब के पन्ने भरते जा रहे थे.
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अतीक के खिलाफ दर्ज हैं 44 मामले

1992 में इलाहाबाद पुलिस ने अतीक अहमद का कच्चा चिट्ठा जारी किया था. जिसमें बताया गया था कि अतीक अहमद के खिलाफ उत्तर प्रदेश के लखनऊ, कौशाम्बी, चित्रकूट, इलाहाबाद ही नहीं बल्कि बिहार राज्य में भी हत्या, अपहरण, जबरन वसूली आदि के मामले दर्ज हैं. अतीक के खिलाफ सबसे ज्यादा मामले इलाहाबाद जिले में ही दर्ज हुए. उपलब्ध आकड़ों के अनुसार वर्ष 1986 से 2007 तक ही उसके खिलाफ एक दर्जन से ज्यादा मामले केवल गैंगस्टर एक्ट के तहत दर्ज किए गए.

राजनीति में पहला कदम
अपराध की दुनिया में नाम कमा चुके अतीक अहमद को समझ आ चुका था कि सत्ता की ताकत कितनी अहम होती है. इसके बाद अतीक ने राजनीति का रुख कर लिया. वर्ष 1989 में पहली बार इलाहाबाद (पश्चिमी) विधानसभा सीट से विधायक बने अतीक अहमद ने 1991 और 1993 का चुनाव निर्दलीय प्रत्याशी के रूप में लड़ा और विधायक भी बने. 1996 में इसी सीट पर अतीक को समाजवादी पार्टी ने टिकट दिया और वह फिर से विधायक चुने गए.

दल बदलते रहे अतीक

अतीक अहमद ने 1999 में अपना दल का दामन थाम लिया. वह प्रतापगढ़ से चुनाव लड़े पर हार गए. और 2002 में इसी पार्टी से वह फिर विधायक बन गए. 2003 में जब यूपी में सपा सरकार बनी तो अतीक ने फिर से मुलायम सिंह का हाथ पकड़ लिया. 2004 के लोकसभा चुनाव में समाजवादी पार्टी ने अतीक को फूलपुर संसदीय क्षेत्र से टिकट दिया और वह सांसद बन गए.

बसपा विधायक राजू पाल की हत्या का आरोप

साल 2004 के आम चुनाव में फूलपुर से सपा के टिकट पर अतीक अहमद सांसद बन गए थे. इसके बाद इलाहाबाद पश्चिम विधानसभा सीट खाली हो गई थी. इस सीट पर उपचुनाव हुआ. सपा ने अतीक के छोटे भाई अशरफ को टिकट दिया था. मगर बसपा ने उसके सामने राजू पाल को खड़ा किया. और राजू ने अशरफ को हरा दिया. उपचुनाव में जीत दर्ज कर पहली बार विधायक बने राजू पाल की कुछ महीने बाद 25 जनवरी, 2005 को दिनदहाड़े गोली मारकर हत्या कर दी गई थी. इस हत्याकांड में सीधे तौर पर सांसद अतीक अहमद और उनके भाई अशरफ को आरोपी बनाया गया था.

बसपा विधायक राजू पाल की हत्या में नामजद आरोपी होने के बाद भी अतीक अहमद को मुलायम सिंह ने दिसम्बर 2007 में पार्टी से बाहर कर दिया. इसके बाद 2007 में सत्ता में मायावती आई. अतीक अहमद के हौसलें पस्त होने लगे. उनके खिलाफ एक के बाद एक मुकदमे दर्ज हो रहे थे. इसी दौरान अतीक अहमद भूमिगत हो गए.

2004 के बाद नहीं जीते कोई चुनाव

2004 के लोकसभा चुनाव में अतीक अहमद फूलपुर लोकसभा सीट पर चुनाव लड़ने पहुंचे जहां उन्होंने जीत हासिल की. और यही वो आखिरी चुनाव था जब अतीक जीते. उसके बाद करीब पिछले 15 सालों से अतीक चुनाव में जीत के लिए तरस रहे हैं.

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First published: May 13, 2019, 11:30 AM IST
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