वाराणसी में क्या पीएम मोदी को टक्कर दे पाएंगी प्रियंका? जानें सारा समीकरण

काफी दिनों से चर्चा चल रही है कि कांग्रेस महासचिव प्रियंका गांधी प्रधानमंत्री मोदी के खिलाफ वाराणसी से चुनाव लड़ सकती हैं. अगर ऐसा होता है तो यह भारतीय चुनाव इतिहास का सबसे बड़ा मुकाबला होगा, जिसमें देश के पीएम के खिलाफ गांधी परिवार का कोई सदस्य मैदान में होगा.

News18 Uttar Pradesh
Updated: April 22, 2019, 2:45 PM IST
वाराणसी में क्या पीएम मोदी को टक्कर दे पाएंगी प्रियंका? जानें सारा समीकरण
नरेंद्र मोदी और प्रियंका गांधी (फाइल फोटो)
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Updated: April 22, 2019, 2:45 PM IST
पिछले काफी दिनों से चर्चा चल रही है कि कांग्रेस महासचिव प्रियंका गांधी वाराणसी से प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के खिलाफ लोकसभा का चुनाव लड़ सकती हैं. हाल ही प्रियंका ने भी इस मामले पर कहा था कि अगर कांग्रेस अध्यक्ष और उनके भाई राहुल गांधी कहते हैं तो वह प्रधानमंत्री मोदी के खिलाफ चुनाव लड़ने को तैयार हैं.

वायनाड में राहुल गांधी के लिए प्रचार करते हुए प्रियंका गांधी ने कहा था, 'अगर राहुल गांधी कहेंगे तो मैं चुनाव लड़ने के लिए तैयार हूं और मैं वाराणसी से लड़ूंगी.' बता दें कि कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी अमेठी के अलावा केरल की वायनाड सीट से भी चुनाव लड़ रहे हैं.

इसमें कोई शक नहीं कि अगर कांग्रेस महासचिव प्रियंका गांधी प्रधानमंत्री मोदी के खिलाफ चुनाव लड़ती हैं तो यह भारत के चुनावी इतिहास का सबसे बड़ा मुकाबला होगा. एक तरफ देश के प्रधानमंत्री होंगे तो दूसरी तरफ गांधी परिवार का कोई सदस्य.

कांग्रेस के लिए ट्रंप कार्ड मानी जा रहीं प्रियंका गांधी के वाराणसी से चुनाव लड़ने पर पार्टी को आसपास की सीटों पर जरूर फायदा हो सकता है. पिछले लोकसभा चुनाव में बीजेपी ने भी पूर्वांचल की सीटों को ध्यान में रखकर प्रधानमंत्री मोदी को वाराणसी से अपना उम्मीदवार बनाया था. उस समय मोदी और बीजेपी की लहर भी थी. लेकिन प्रियंका के लिए इस सीट से प्रधानमंत्री को सीधे चुनौती देना क्या इतना आसान है?

क्या है बनारस का जातीय समीकरण?
बात करें बनारस के जातीय समीकरण की तो यहां पर सबसे ज्यादा बनिया मतादाता हैं, जिनकी संख्या करीब 3.25 लाख हैं. इसके बाद करीब तीन लाख मुस्लिम, ढ़ाई लाख ब्राह्मण, दो लाख पटेल, डेढ़ लाख यादव, सवा लाख भूमिहार, एक लाख राजपूत, 80 हजार चौरसिया, 80 हजार दलित और करीब 70 हजार अन्य पिछड़ी जातियों के मतदाता हैं.

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी (फाइल फोटो)

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ब्राह्मण और बनिया को बीजेपी का परंपरागत वोटर माना जाता है. लेकिन नोटबंदी और जीएसटी के बाद की नाराजगी को कांग्रेस भुनाने में कामयाब होती है तो बनिया वोट कांग्रेस के पाले में आ सकता है. वहीं एससी/एसटी एक्ट को लेकर ब्राह्मणों में नाराजगी है. इसके साथ ही विश्वनाथ कॉरीडोर बनने के कारण इसी जाति के लोगों के घर सबसे ज्यादा टूटे हैं. अगर इन दोनों बातों को लेकर इनके बीच की नाराजगी मतदान पर असर डालती है तो कांग्रेस को लाभ मिल सकता है.

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इसके अलावा मुस्लिम मतदाताओं का वोट भी काफी मायने रखता है. माना जाता है कि मुस्लिम वोटर उसी को वोट देते हैं जिनमें बीजेपी को हरा देने की ताकत हो. ऐसे में प्रियंका की उम्मीदवारी से ये वोट कांग्रेस के पक्ष में जा सकते हैं.

बाकी अन्य जातियों के वोट इधर-उधर होते हैं तो इसका लाभ भी कांग्रेस को मिलेगा. इसके साथ ही कांग्रेस चुनाव में उतरने से पहले जातीय समीकरणों को साधने का काम भी करेगी. जिससे प्रियंका को मजबूती प्रदान की जा सके.

क्या रहा था पिछले चुनाव का अंक गणित?
पिछले लोकसभा चुनाव और इस लोकसभा चुनाव में काफी अंतर है. उस समय देश में मोदी और बीजेपी की लहर थी. इस समय वैसा मामला नहीं है, लेकिन पिछले चुनाव में किस पार्टी को कितने वोट मिले थे, ये आंकड़े भी मायने रखते हैं.

कांग्रेस महासचिव प्रियंका गांधी (फाइल फोटो)


2014 लोकसभा चुनाव में नरेंद्र मोदी को कुल 5,81,022 वोट मिले थे. दूसरे नंबर पर रहे अरविंद केजरीवाल को 2,09,238 वोट मिले थे. प्रधानमंत्री मोदी के निकटतम प्रतिद्वंदी केजरीवाल थे. मोदी को केजरीवाल से 3 लाख, 77 हजार वोट ज्यादा मिले थे. जबकि कांग्रेस के अजय राय को 75,614 वोट, बीएसपी को तकरीबन 60 हजार 579 वोट, सपा को 45291 वोट मिले थे.

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आंकड़े बता रहे हैं कि पीएम मोदी के अलावा अन्य दलों को जो वोट प्राप्त हुए, वे भी उनको मिले वोट से काफी कम थे. अब अगर प्रियंका गांधी के चुनाव लड़ने पर गठबंधन अपना उम्मीदवार नहीं खड़ा करता है, तब भी वो आंकड़े के खेल में पीछे ही नजर आती हैं. हालांकि हर बार का चुनाव अलग मुद्दे पर होता है.

ये तो रहा आंकड़ों का खेल. इन सबके अलावा प्रधानमंत्री मोदी द्वारा बनारस में किया गया विकास कार्य भी मतदाताओं के दिमाग में रहेगा. इन सबके साथ ही प्रियंका अगर उम्मीदवार बनती हैं तो प्रधानमंत्री के लिए पूरी बीजेपी अपनी ताकत लगा देगी.

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