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काशी में महादेव का चमत्कारिक धाम, अकाल मृत्यु से मिलती है मुक्ति, यमराज भी हुए थे पराजित

काशी में महादेव का चमत्कारिक धाम,अकाल मृत्यु से मिलती है मुक्ति,यमराज भी हुए थे पराजित

काशी में महादेव का चमत्कारिक धाम,अकाल मृत्यु से मिलती है मुक्ति,यमराज भी हुए थे पराजित

बाबा विश्वनाथ की नगरी काशी त्रिशूल पर बसी है. त्रिलोक से न्यारी इस काशी के कण-कण में शंकर विराजमान है. इसी काशी में भोले का ऐसा चमत्कारिक मंदिर है, जहां दर्शन मात्र से अकाल मृत्यु के भय से मुक्ति मिलती है

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    नाथों के नाथ बाबा विश्वनाथ की नगरी काशी त्रिशूल पर बसी है. त्रिलोक से न्यारी इस काशी के कण-कण में शंकर विराजमान है. इसी काशी में भोले का ऐसा चमत्कारिक मंदिर है, जहां दर्शन मात्र से अकाल मृत्यु के भय से मुक्ति मिलती है. गंगा-गोमती के तट पर बसे इस शिव के चमत्कारिक धाम में सावन के महीनें में बाबा के दर्शन को दूर-दूर से भक्त आते हैं.

    वाराणसी से करीब 30 किलोमीटर दूर वाराणसी-गाजीपुर मार्ग के कैथी गांव में मार्कण्डेय महादेव का मंदिर है. मान्यता है यहां दर्शन से न सिर्फ भक्तों की मुराद पूरी होती हैं बल्कि अकाल मृत्यु का भय भी दूर होता है. इसके अलावा बेलपत्र पर चंदन से राम का नाम लिखकर भगवान शंकर को अपर्ण करने से पुत्र की प्राप्ति भी होती है. यही वजह है कि महाशिवरात्रि के साथ ही सावनभर यहां भक्तों की कतार लगी होती हैं.

    मार्कंडेय पुराण में है उल्लेख
    काशी के गंगा गोमती तट बसे भगवान शंकर के चमत्कारिक धाम का उल्लेख मार्कंडेय पुराण में भी है.मार्कंडेय पुराण में इसे द्वादश ज्योतिर्लिंगों समकक्ष बताया गया है. काशी में शिव का ये धाम उत्तर प्रदेश के प्रमुख शिवालयों में से एक है.

    ऋषि मार्कंडेय ने की थी तपस्या
    काशी के इस धाम में मार्कण्डेय ऋषि ने भगवान शंकर का तप कर मृत्यु पर विजय हासिल की थी. मान्यता है कि ऋषि मृकण्ड के पुत्र मार्कण्डेय को जन्म से ही आयु दोष था. उनकी उम्र महज 14 वर्ष की थी. विद्वानों के सलाह पर उन्होंने गंगा गोमती के तट पर भगवान शंकर की तपस्या शुरू की.ऋषि पुत्र मार्कण्डेय भगवान शंकर की तपस्या में इस तरह लीन हुए की उन्हें वर्ष का पता नहीं लगा.

    यमराज को किया था पराजित
    14 वर्ष की आयु पूर्ण होने पर यमराज उन्हें प्राणों के हरण के लिए आए तो भगवान शंकर ने उनका रास्ता रोक दिया. इसके बाद भगवान शंकर और यमराज के बीच युद्ध हुआ. युद्ध मे यमराज पराजित हुए और मार्कंडेय के प्राणों के बिना ही उन्हें वापस लौटना पड़ा. भगवान शंकर ने ऋषि पुत्र मार्कंडेय की तपस्या से प्रसन्न होकर उन्हें अमरता का वरदान दिया. इसके साथ ही ये भी कहा कि जो भी भक्त यहां मार्केंडेय ऋषि के दर्शन के बाद उनका दर्शन करेगा उसे अकाल मृत्यु से मुक्ति मिलेगी.

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