हार के बाद दोबारा उठ खड़े होने वाली शख्सियत हैं जम्मू-कश्मीर के LG मनोज सिन्हा, BHU में बिखरी पड़ी हैं यादें
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हार के बाद दोबारा उठ खड़े होने वाली शख्सियत हैं जम्मू-कश्मीर के LG मनोज सिन्हा, BHU में बिखरी पड़ी हैं यादें
आईआईटी बीएचयू से पढ़े मनोज सिन्हा की छवि काफी साफ सुथरी है.

गंगा वैज्ञानिक प्रोफेसर यूके चौधरी भी मनोज सिन्हा (Manoj Sinha) के गुरु रहे. प्रोफेसर चौधरी बताते हैं कि छात्र जीवन से ही वह बहुत होनहार थे. बीएचयू (BHU) से छात्र राजनीति का ककहरा सीखकर मनोज सिन्हा ने राजनीतिक जीवन में फिर पीछे मुड़कर नहीं देखा.

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वाराणसी. गिरीश चंद्र मुर्मू के इस्तीफे के बाद जम्मू-कश्मीर (Jammu Kashmir) के नए उप राज्यपाल बनाए गए मनोज सिन्हा (Manoj Sinha) ने बनारस हिंदू विश्वविदयालय (BHU) से राजनीति का ककहरा सीखा. मोदी सरकार के पहले कार्यकाल में रेल राज्य मंत्री रहे मनोज सिन्हा 1980 से 1983 के बीच में छात्र राजनीति में पूरी तरह से सक्रिय रहे और महज 23 साल की उम्र में बनारस हिंदू विश्वविदयालय के छात्र संघ अध्यक्ष बने. केवल छात्र राजनीति ही नहीं, मनोज सिन्हा एक होनहार छात्र भी थे.

बीएचयू से अच्छे नंबरों से पास हुए

उन दिनों बनारस हिंदू विश्वविदयालय के भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थान (IIT) में बहुत होनहार स्टूडेंट्स को ही जगह मिल पाती थी. मनोज सिन्हा ने न केवल एडमिशन लिया बल्कि बहुत अच्छे अंको के साथ 1982 में उन्होंने आईआईटी बीएचयू से सिविल इंजीनियरिंग में डिग्री ली. मनोज सिन्हा बीएचयू के बिरला हास्टल में रहते थे.



पहली चुनावी हार के बाद दोबारा उठ खड़े हुए मनोज सिन्हा
बीएचयू के पूर्व छात्र नेता और भाजपा के प्रदेश प्रवक्ता अशोक पांडे बताते हैं कि पहला चुनाव मनोज सिन्हा हार गए थे लेकिन इसके बाद भी वो निराश नहीं हुए और पढ़ाई के साथ चुनावी तैयारी भी करते रहे. उनका बेबाक अंदाज बीएचयू के छात्र राजनीति में हमेशा चर्चा में रहता था. उसके बाद अगले चुनाव में वो अध्यक्ष बने. वो दौर बीएचयू की छात्र राजनीति का सबसे चरम काल था.

गुरु भी फक्र से करते हैं याद

उन दिनों बीएचयू के कई छात्र नेता देश की राजनीति में अहम पदों तक पहुंचे. जिस साल मनोज सिन्हा अध्यक्ष बने, उस साल उपाध्यक्ष पद पर राजेश मिश्रा जीते, जो कि कांग्रेस की टिकट पर वाराणसी के सांसद बने. गंगा वैज्ञानिक प्रोफेसर यूके चौधरी भी मनोज सिन्हा के गुरु थे. प्रोफेसर चौधरी बताते हैं कि छात्र जीवन से ही मनोज सिन्हा बहुत होनहार थे. बीएचयू से छात्र राजनीति का ककहरा सीखकर मनोज सिन्हा ने राजनीतिक जीवन में फिर पीछे मुड़कर नहीं देखा.

मोदी सरकार में रहे रेल राज्यमंत्री

जानकारी के अनुसार पहली बार साल 1996 के लोकसभा चुनाव में वे गाजीपुर से सांसद बने. तब वे करीब एक लाख वोटों से जीते. दूसरी बार साल 1999 के चुनाव में मनोज सिन्हा ने करीब 11 हजार वोटों से जीत दर्ज की. मोदी सरकार के पहले कार्यकाल 2014 के चुनाव में मनोज सिन्हा ने करीब 32 हजार वोटों से जीत का झंडा गाड़ा. इस बार मोदी सरकार ने उन्हें रेल राज्य मंत्री और संचार राज्य मंत्री की जिम्मेदारी सौंपी.

यूपी के मुख्यमंत्री की रेस में भी दौड़ा नाम

वे प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और गृहमंत्री अमित शाह के बेहद करीबी माने जाते हैं. साल 2017 के यूपी चुनाव में जब भाजपा की सरकारी बनी तो उनका नाम मुख्यमंत्री की रेस मे सबसे आगे रहा. दिल्ली से वाराणसी दर्शन करने पहुंचे मनोज सिन्हा के सीएम बनने की चर्चा जोर पकड़ गई लेकिन ऐसा नहीं हुआ. हालांकि खुद मनोज सिन्हा ने इस चर्चा को हमेशा नकारते रहे.

गाजीपुर से वाराणसी तक खुशी का माहौल

साल 2019 का चुनाव मनोज सिन्हा के लिए बेहतर नहीं रहा. बाहुबली मुख्तार अंसारी के भाई अफजाल अंसारी के हाथों में उन्हें इस चुनाव में शिकस्त मिली. इसके बाद से मनोज सिन्हा के सियासी भविष्य को लेकर तमाम अटकलें लगाई जा रही थीं. इसी बीच उन्हें जम्मू-कश्मीर का उप राज्यपाल बनाए जाने से उनके जिले गाजीपुर और उनके कर्मक्षेत्र वाराणसी में खुशी का माहौल है. 1 जुलाई, 1959 को जन्मे मनोज सिन्हा की शादी 1 मई 1977 को सुल्तानगंज, भागलपुर की नीलम सिन्हा से हुई. उनकी एक बेटी है, जिसकी शादी हो चुकी है. बेटा एक प्राइवेट कंपनी में जॉब करता है.
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