लोकसभा सत्र के पहले दिन दिखा मोदी का आंबेडकर कनेक्शन
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संविधान सभा की बैठकों में इस पर भी काफ़ी चर्चा हुई थी कि भारत में अमेरिका की तरह सीधे राष्ट्रपति का चुनाव हो या फिर ब्रिटेन की तरह, जहाँ जनता सांसद चुनती है और चुने गए सांसद जिसे नेता चुनते हैं, वो सरकार का मुखिया यानी प्रधानमंत्री बनता है.

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संसद के नए सत्र में बतौर सांसद शपथ लेने से पहले PM मोदी ने सांसदों को पक्ष या विपक्ष में रहने की बजाय निष्पक्ष रहने का मंत्र दिया. दिलचस्प है कि यही बात ठीक 73 साल पहले डॉक्टर भीमराव आंबेडकर ने कही थी. 17 जून 1947 को संविधान सभा की बैठक में डॉ आंबेडकर ने कहा था कि लोकतंत्र, बहुमत और नारों से नहीं, बल्कि जनता के प्रति जवाबदेही से मजबूत होगा. देश में संसदीय लोकतंत्र का तरीका तय करते वक़्त सबको एक ही चिंता थी कि सांसद जनता की बजाय पार्टी के होकर ना रह जाएं.

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संविधान सभा की बैठकों में इस पर भी काफ़ी चर्चा हुई थी कि भारत में अमेरिका की तरह सीधे राष्ट्रपति का चुनाव हो या फिर ब्रिटेन की तरह, जहाँ जनता सांसद चुनती है और चुने गए सांसद जिसे नेता चुनते हैं, वो सरकार का मुखिया यानी प्रधानमंत्री बनता है. सरदार वल्लभ भाई पटेल और डॉक्टर भीम राव आंबेडकर चाहते थे कि देश में अमेरिका की तरह संसदीय लोक तंत्र हो. जनता ही सांसद चुने और जनता ही सीधे राष्ट्रपति का चुनाव भी करे, लेकिन जवाहर लाल नेहरू इससे सहमत नहीं थे और आखिरकार नेहरू की बात ही मानी गई, जिन्हें उम्मीद थी कि सांसद अपने क्षेत्र की जनता के प्रति जवाबदेह रहेंगे.



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संविधान बनाते समय यही माना गया कि सांसद सिर्फ़ सरकार के लिए बहुमत जुटाने या सरकार गिराने की संख्या बनकर नहीं रहेंगे. वो अपने इलाक़े की जनता की आवाज़ बनेंगे और ज़रूरत पड़ने पर सरकार की आचोलना भी करेंगे, जिसे प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने भी लोकतंत्र की मजबूती के लिए ज़रूरी बताया. इस ही सोच की वजह से डॉक्टर आंबेडकर बहुमत वाली पार्टी की सरकार बनाने की संसदीय प्रणाली के लिए तैयार हुए थे.
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