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Republic Day 2021 Special: जानिए कहां है भारत माता का एकलौता मंदिर, जहां नक्शे में पाकिस्तान भी है देश का हिस्सा

ये मंदिर कैंट रेलवे स्टेशन से काशी विद्यापीठ रोड पर मौजूद है.

ये मंदिर कैंट रेलवे स्टेशन से काशी विद्यापीठ रोड पर मौजूद है.

Republic Day 2021: गुलाबी पत्थरों से बने इस मंदिर में संगमरमर पर तराशा गया अखंड भारत मां का नक्शा ही इसकी खासियत है. मकराना संगमरमर पर अफगानिस्तान, बलूचिस्तान, पाकिस्तान, बांग्लादेश, म्यांमार और श्रीलंका इसका हिस्सा हैं.

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वाराणसी. धर्मनगरी काशी में एक ऐसा अनोखा भारत माता का मंदिर है, जहां कोई देव विग्रह, मूर्ति नहीं है बल्कि यहां गर्भ गृह में अखंड भारत का नक्शा मौजूद है. यहां अखंड भारत की मूर्ती की आराधना होती है. तस्वीर में आपको जमीन पर उकेरा गया भारत वर्ष का मानचित्र दिख रहा होगा, यही इस मंदिर की देवी यानी भारत मां की मूर्ति है. ये मंदिर कैंट रेलवे स्टेशन से काशी विद्यापीठ रोड पर मौजूद है. गुलाबी पत्थरों से निर्मित मंदिर के चमकते स्तंभ इसकी ऐतिहासिकता को बयान करते हैं.

दो मंजिला इस मंदिर के गर्भगृह में कुंडाकार प्लेटफार्म पर मकराना मार्बल पत्थर पर यूं ही ये मानचित्र नहीं उकेरा गया बल्कि इसके पीछे गणितीय सूत्र आधार हैं. जब सीमाएं पाकिस्तान पार अफगानिस्तान और पूरब में पश्चिम बंगाल के आगे फैली हुईं थी, यहां तब के नक्शे को दिखाया गया है. इसमें पहाड़ों, नदियों को थ्री डी की तरह उकेरा गया है.

गुलाबी पत्थरों से बने इस मंदिर में संगमरमर पर तराशा गया अखंड भारत मां का नक्शा ही इसकी खासियत है. मकराना संगमरमर पर अफगानिस्तान, बलूचिस्तान, पाकिस्तान, बांग्लादेश, म्यांमार और श्रीलंका इसका हिस्सा है. साल 1917 के मान्य मानचित्र के आधार पर इस मंदिर में भूचित्र को पूरी तरह गणितीय सूत्रों के आधार पर उकेरा गया. जिसमें इसकी धरातल भूमि एक इंच में 2000 फीट दिखाई गई है. जबकि समुद्र की गहराई भी इसी हिसाब से दर्शाई गई है.



शिल्प में नदी, पहाड़, झील और फिर समुद्र को उनकी ऊंचाई-गहराई के सापेक्ष ही बनाया गया है. यही नहीं, जहां जहां समुद्र है, वहां नीले रंग का पानी भरा जाता है. मंदिर की दीवारों पर दर्ज नक्शे इस मंदिर की भव्यता को बढ़ाते हैं. मंदिर की एक और खासियत है कि यहां मंदिर को बनाने वाले शिल्पकारों को भी पूरा सम्मान एक शिलालेख के जरिए दिया गया है. शिलालेख के मुताबिक, उस वक्त के कला विशारद बाबू दुर्गा प्रसाद खत्री के नेतृत्व में मिस्त्री सुखदेव प्रसाद व शिवप्रसाद ने 25 अन्य बनारसी शिल्पकारों के साथ मिलकर करीब छह सालों में ये मंदिर बनाकर तैयार किया.
राष्ट्रपिता महात्मा गांधी ने 1936 में काशी प्रवास के दौरान इस धरोहर को राष्ट्र को समर्पित किया था. खास बात है कि इस मंदिर में अन्य देवालयों की तरह रोज पूजा नहीं होती. इसलिए यहां कोई पुजारी नियुक्त भी नहीं है. केयरटेकर के रूप में राजेश समेत अन्य कुछ लोग काम करते हैं. राजेश ने इस मंदिर की ऐतिहासिकता और खासियत को विस्तार से बताया.

केयरटेकर राजेश ने बताया कि मंदिर में करीब 450 पर्वत श्रृंखलाओं और चोटियों, मैदानों, जलाशयों, नदियों, महासागरों और पठारों समेत कई भौगोलिक ढांचों को उनकी लंबाई चौड़ाई और गहराई के साथ दिखाया गया है. हर साल की तरह इस बार भी गणतंत्र दिवस के मौके पर इस नक्शे में दिखाए गए जलाशयों में पानी भरा गया है. मैदानी इलाकों को फूलों से सजाया जाएगा. राष्ट्रकवि मैथिली शरण गुप्त ने इस मंदिर के उद्घाटन पर एक कविता लिखी थी. इस रचना को भी मंदिर में एक बोर्ड पर लिखकर लगाया गया है.

हर रोज यहां भक्त आते हैं और मां भारती को वंदेमातरम गीत से अपने श्रद्दासुमन अर्पित करते हैं. दर्शन करने पहुंची रोनी मालवीया, रेखा यादव और शालिनी सिंह ने बताया कि यहां आकर अखंड भारत के नक्शे को देखकर मन गर्व से भर जाता है. यहां किसी जाति और धर्म की बंदिश नहीं है. भारत माता के दर्शन पाकर जीवन धन्य हो जाता है. पूरी दुनिया में अकेला इस तरीके का ये अनोखा मंदिर अखंड भारत के सपने को चरितार्थ करता है.
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